अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस पर उमंग सिंघार का लेख: प्रतीकात्मक सम्मान नहीं, चाहिए संवैधानिक अधिकार

Team Atal Hind8 August 20262 min read61 viewsलेख
अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस पर उमंग सिंघार का लेख: प्रतीकात्मक सम्मान नहीं, चाहिए संवैधानिक अधिकार

अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस (9 अगस्त) के अवसर पर उमंग सिंघार ने अपने लेख में कहा है कि यह दिन सिर्फ एक तारीख नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में हमारे अस्तित्व, हमारी जीवंत संस्कृति और हमारे पुरखों के संघर्ष को याद करने का दिन है। हम आदिवासी केवल प्रकृति के बीच रहते नहीं हैं, बल्कि प्रकृति को जीते हैं। प्रकृति ही हमारा ईश्वर और सह-अस्तित्व ही हमारा धर्म है, क्योंकि वन, पर्वत और नदियाँ केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि हमारे पूज्य देव और पूर्वज हैं।

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सामुदायिकता और संस्कृति की ताकत

हमारे यहाँ 'मैं' नहीं, हमेशा 'हम' की भावना होती है। व्यक्तिगत लाभ के ऊपर पूरे कुनबे और समाज की भलाई को आगे रखना हमारा मूल स्वभाव है। हमारी संस्कृति किसी जाति-पांति, ऊंच-नीच या गैर-बराबरी को नहीं मानती और माताओं-बहनों को सर्वोच्च स्थान मिला है। मांदल की थाप पर हमारे लोकनृत्य और गीत ब्रह्मांड, बारिश, मिट्टी और फसलों के साथ हमारा सीधा संवाद होते हैं

मध्यप्रदेश में आदिवासियों की ज़मीनी हकीकत

मध्यप्रदेश, जो देश में सबसे अधिक आदिवासी आबादी वाला प्रदेश है, वहां की भाजपा सरकार की नीतियां हमारे समुदाय के खिलाफ खड़ी हैं। सरकार बड़े-बड़े मंचों से 'आदिवासी गौरव' के दावे करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हमारे जल, जंगल और जमीन को कॉर्पोरेट घरानों के हाथों बेचा जा रहा है। वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के तहत आदिवासियों को अपने ही जंगल से बेदखल किया जा रहा है और पट्टों के नाम पर सिर्फ झुनझुना थमाया जाकर लाखों आवेदन खारिज कर दिए गए हैं।

पेसा कानून और सुरक्षा पर हमला

कागज़ों पर 'पेसा कानून' लागू कर दिया गया, लेकिन ग्राम सभाओं के वास्तविक अधिकार छीनकर नौकरशाही के हवाले कर दिए गए हैं। मध्यप्रदेश में आदिवासी युवाओं और बहनों पर अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और ज़मीन छीनने का विरोध करने पर हमारे लोगों को आपराधिक मामलों में फँसाया जाता है।

आदिवासी धर्म कोड की मांग

हमारा समाज हजारों वर्षों से अपनी अलग पहचान, संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति से जुड़े जीवन मूल्यों के साथ जीता आया है। साल 2027 में होने वाली 16वीं जनगणना में आदिवासी धर्म कोड का अलग कॉलम सुनिश्चित किया जाए, क्योंकि लंबे अरसे से आदिवासी समाज इसकी मांग कर रहा है।

माटी का हक़ और संकल्प

हमारी संस्कृति का इस्तेमाल सिर्फ वोटों की राजनीति और सरकारी उत्सवों के प्रचार तक सीमित कर दिया गया है। हमें प्रतीकात्मक सम्मान नहीं बल्कि ज़मीन का मालिकाना हक़, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोज़गार और संवैधानिक अधिकार चाहिए। टंट्या मामा, बिरसा मुंडा और रानी दुर्गावती का स्वाभिमान हमारी रगों में दौड़ रहा है। अपनी पहचान और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए एक जुट हो जाइए, हम अपनी माटी का सौदा नहीं होने देंगे। *(लेखक मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं)* *(विनायक फीचर्स)*

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