अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस विशेष: जानिए लोकतंत्र का इतिहास, भारत की स्थिति और वैश्विक चुनौतियां

अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस विशेष: जानिए लोकतंत्र का इतिहास, भारत की स्थिति और वैश्विक चुनौतियां

लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं अपितु यह एक जीवन पद्धति, संस्कार और सतत साधना है।

लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं अपितु यह एक जीवन पद्धति, संस्कार और सतत साधना है। सुनील कुमार वाजपेयी शिवम् द्वारा अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस के अवसर पर यह विशेष आलेख प्रस्तुत किया गया है। 15 सितम्बर को पूरी दुनिया अन्तर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाती है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2007 में इस दिवस की घोषणा की थी, और 2008 से यह लगातार मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य है कि विश्व भर में लोकतंत्र के सिद्धान्तों को बढ़ावा दिया जाए, लोकतांत्रिक मूल्यों की समीक्षा की जाए और लोकतंत्र के सामने आने वाली चुनौतियों पर मंथन किया जाए।

लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं है। यह एक जीवन पद्धति है, एक संस्कार है और एक सतत साधना है। अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन कहा था। पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में लोकतंत्र उससे भी बड़ा है। यह सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना है और वसुधैव कुटुंबकम का विस्तार है। लोकतंत्र की जड़ें बहुत पुरानी हैं। यूनान के एथेंस में ईसा से 508 साल पहले पहली बार लोकतंत्र की अवधारणा आई थी। वहाँ प्रत्यक्ष लोकतंत्र था, जहाँ सभी नागरिक एक जगह इकट्ठा होकर निर्णय लेते थे। पर वह अधूरा लोकतंत्र था, क्योंकि महिलाओं और दासों को नागरिक नहीं माना जाता था।

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भारत में लोकतंत्र का प्राचीन इतिहास और आधुनिक यात्रा

भारत में लोकतंत्र का इतिहास तो और भी प्राचीन है। वैदिक काल में सभा और समिति का उल्लेख मिलता है। लिच्छवि, वैशाली और शाक्य जैसे गणराज्य ईसा पूर्व छठी शताब्दी में फल-फूल रहे थे। भगवान बुद्ध के समय में ही वैशाली दुनिया का पहला गणराज्य था। यह इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र पश्चिम की देन नहीं है, बल्कि यह भारत की मिट्टी में भी रचा-बसा है। आधुनिक लोकतंत्र की यात्रा 1215 के मैग्नाकार्टा से शुरू होती है। इसके बाद 1688 की गौरवशाली क्रांति, 1776 की अमेरिकी स्वतंत्रता और 1789 की फ्रांसीसी क्रांति ने इसे नई धार दी। बीसवीं सदी में उपनिवेशवाद के अंत के साथ दुनिया के अधिकांश देशों ने लोकतंत्र को अपनाया।

संयुक्त राष्ट्र ने इस दिवस के लिए कुछ मुख्य उद्देश्य तय किए हैं। इनमें लोकतंत्र के सिद्धान्तों का सम्मान करना शामिल है। मानवाधिकारों की रक्षा करना इसका अहम हिस्सा है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का समर्थन करना जरूरी है। कानून के शासन को मजबूत करना आवश्यक है। नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना भी इसका मुख्य उद्देश्य है।

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और भारत की मजबूती

भारत को लोकतंत्र की जननी कहा जाता है। यह 140 करोड़ लोगों का देश है जहाँ 22 आधिकारिक भाषाएँ, 9 बड़े धर्म और हजारों जातियाँ हैं। इसके बावजूद यह देश एक वोट और एक मूल्य पर टिके लोकतंत्र का उदाहरण है। यह दुनिया के लिए एक आश्चर्य है। भारत में लोकतंत्र की मजबूती के चार प्रमुख स्तंभ हैं। ये स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया हैं। इनके साथ ही पाँचवाँ स्तंभ भारत का मतदाता है। भारत का मतदाता दुनिया का सबसे जागरूक मतदाता है। 1951 में जहाँ 44 प्रतिशत मतदान होता था, आज 67 प्रतिशत से अधिक मतदान होता है। महिलाएँ, युवा और पहली बार वोट देने वाले सभी लोग इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण है। 1977 में जब इंदिरा गांधी चुनाव हारीं, तो उन्होंने सत्ता छोड़ दी थी। 2004, 2014 और 2019 में भी सत्ता बदली, पर देश सुचारू रूप से चलता रहा। यह परिपक्वता दुनिया के बहुत कम देशों में देखने को मिलती है। पंचायती राज ने लोकतंत्र को गाँव-गाँव तक पहुँचाया है। आज देश में 32 लाख निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधि हैं, जिनमें 14 लाख से अधिक महिलाएँ शामिल हैं। दुनिया में कहीं भी इतनी बड़ी संख्या में महिलाएँ लोकतंत्र में भाग नहीं लेती हैं।

वर्तमान वैश्विक लोकतंत्र के सामने आने वाली बड़ी चुनौतियां

जब हम वर्तमान वैश्विक लोकतंत्र की स्थिति को देखते और समझते हैं, तो लोकतंत्र संकट में नजर आता है। स्वीडन की वी-डेम संस्था और फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में लोकतंत्र सिकुड़ रहा है। 2006 में दुनिया के 49 प्रतिशत देश लोकतांत्रिक थे, जो 2024 में घटकर मात्र 32 प्रतिशत रह गए हैं। इसके पीछे कई प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं। पहला कारण सत्तावादी प्रवृत्तियों का उदय है। कई देशों में नेता चुनाव तो जीत जाते हैं, पर चुनाव जीतने के बाद संस्थाओं को कमजोर करने लगते हैं। मीडिया पर अंकुश लगाना, न्यायपालिका पर दबाव बनाना और विपक्ष को खत्म करना यह नया मॉडल बन गया है।

दूसरा बड़ा कारण धन और अपराध का गठजोड़ है। चुनाव बहुत महंगे हो गए हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में 14 अरब डॉलर खर्च होते हैं। भारत में भी चुनावी खर्च लगातार बढ़ रहा है। जब धन हावी होता है, तो सामान्य नागरिक पीछे छूट जाता है। तीसरा कारण फेक न्यूज और सोशल मीडिया है। लोकतंत्र संवाद से चलता है, पर जब संवाद ही झूठ पर आधारित हो तो क्या होगा। डीपफेक, एल्गोरिदम और इको चैंबर ने लोकतंत्र को नई चुनौती दी है। एआई से बनाई गई फर्जी वीडियो चुनावों को प्रभावित कर रही हैं। चौथा कारण नागरिक उदासीनता है। कई विकसित देशों में मतदान प्रतिशत घट रहा है। लोग सोचते हैं कि मेरे एक वोट से क्या होगा। यह उदासीनता लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक है। पाँचवाँ कारण बढ़ती असमानता है। जब आर्थिक असमानता बढ़ती है तो लोकतंत्र कमजोर होता है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के 1 प्रतिशत लोगों के पास 45 प्रतिशत संपत्ति है। ऐसे में समान वोट की अवधारणा खोखली लगती है।

भारतीय लोकतंत्र की आंतरिक चुनौतियां और सुधार की आवश्यकता

भारत का लोकतंत्र मजबूत है, पर यहाँ चुनौतियाँ भी बहुत बड़ी हैं। जातिवाद, सांप्रदायिक और क्षेत्रवाद लोकतंत्र के बड़े दुश्मन हैं। वोट बैंक की राजनीति ने विकास को पीछे धकेला है। परिवारवाद ने कई पार्टियों को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना दिया है। चुनावी सुधार आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। एक साथ चुनाव कराना, राज्यसभा में सुधार करना, चुनावी बॉन्ड में पारदर्शिता लाना और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं पर रोक लगाना इन सभी मुद्दों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। न्यायपालिका में लंबित 5 करोड़ केस लोकतंत्र में लोगों के भरोसे को कम करते हैं। न्याय में देरी, न्याय से इनकार के समान है।

लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जरूरी उपाय

लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए कुछ उपाय करने भी बेहद जरूरी हैं। पहला उपाय नागरिक शिक्षा है। स्कूलों में संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की पढ़ाई अनिवार्य होनी चाहिए ताकि बच्चे जान सकें कि वोट क्या है और अधिकार क्या हैं। दूसरा उपाय मीडिया की स्वतंत्रता है। स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र का प्राण है। हमें फेक न्यूज से लड़ना होगा, पर मीडिया पर किसी भी प्रकार का सरकारी नियंत्रण नहीं होना चाहिए। तीसरा उपाय स्थानीय लोकतंत्र को बढ़ावा देना है। पंचायतों और नगरपालिकाओं को अधिक अधिकार और पैसा देना होगा। लोकतंत्र दिल्ली से नहीं बल्कि गली से मजबूत होता है।

चौथा उपाय युवाओं की भागीदारी बढ़ाना है। देश की 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम उम्र की है। युवाओं को केवल वोटर नहीं बल्कि नीति-निर्माता बनाना होगा। पाँचवा उपाय तकनीक का सही उपयोग करना है। एआई और ब्लॉकचेन से चुनाव को अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है। ई-वोटिंग पर सुरक्षा के साथ पायलट प्रोजेक्ट शुरू होने चाहिए। छठा और अंतिम उपाय संवाद है। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान होना बहुत जरूरी है। भले ही हम सहमत न हों, लेकिन हम एक देश के नागरिक हैं, यह भावना विकसित करनी होगी।

निष्कर्ष: लोकतंत्र एक सतत जिम्मेदारी और प्रहरी का कार्य

उपरोक्त मंतव्य का अंतिम निष्कर्ष यह है कि विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि लोकतंत्र सबसे खराब शासन प्रणाली है, उन सभी प्रणालियों को छोड़कर जो अब तक आजमाई गई हैं। यह कथन आज भी पूरी तरह सत्य है। तानाशाही में ट्रेन समय पर चल सकती है, पर उस ट्रेन में जाने की स्वतंत्रता नहीं होती। लोकतंत्र में ट्रेन लेट हो सकती है, पर आप उसमें चढ़ने या न चढ़ने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। अन्तर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र कोई उपहार नहीं है, इसे रोज कमाना पड़ता है। यह पाँच साल में एक बार केवल बटन दबाने का नाम नहीं है, यह रोज सवाल पूछने का नाम है। अपने पंच से, प्रधान से, पार्षद से, विधायक से, सांसद से और अधिकारी से सवाल पूछना ही असल लोकतंत्र है। भारत ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि इतनी विविधता के बावजूद लोकतंत्र चल सकता है। अब भारत को यह भी दिखाना है कि लोकतंत्र के जरिए विकास और न्याय भी मिल सकता है। आइए, इस लोकतंत्र दिवस पर हम सब यह प्रण लें कि हम केवल लोकतंत्र के लाभार्थी नहीं, बल्कि उसके सच्चे प्रहरी बनेंगे। क्योंकि लोकतंत्र तब खतरे में नहीं पड़ता जब बुरे लोग बुरा करते हैं, बल्कि लोकतंत्र तब खतरे में पड़ता है जब अच्छे लोग चुप रहते हैं।

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