अंतर्राष्ट्रीय अंगदान दिवस 13 अगस्त विशेष लेख: मृत्यु के पश्चात भी जीवन का अमर उपहार है अंगदान

लेखक : डॉ. अशोक कुमार वर्मा
पुलिस बल के सर्वोच्च रक्तदाता
"मानव जीवन का सर्वोच्च आदर्श केवल स्वयं जीवित रहना नहीं, अपितु अपने जीवन और अपने शरीर के माध्यम से अन्य लोगों के जीवन में भी प्रकाश, आशा और नवजीवन का संचार करना है। अंगदान ऐसा ही महादान है, जो मृत्यु के पश्चात् भी जीवन की ज्योति प्रज्वलित रखता है।" प्रतिवर्ष अंतर्राष्ट्रीय अंगदान दिवस का आयोजन समाज में अंगदान के प्रति जनजागरण उत्पन्न करने तथा प्रत्येक नागरिक को इस महान मानवीय संकल्प के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से किया जाता है।
यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य की महानता उसके धन, पद अथवा वैभव से नहीं, बल्कि उसके परोपकार, करुणा और मानवता के प्रति समर्पण से मापी जाती है। यदि किसी व्यक्ति के शरीर के अंग उसके देहावसान के पश्चात् किसी अन्य पीड़ित व्यक्ति को नया जीवन प्रदान कर सकें, तो इससे बड़ा लोककल्याण और कोई नहीं हो सकता।
भारतीय संस्कृति में दान को सर्वोच्च पुण्य माना गया है। अन्नदान, विद्यादान, जलदान और रक्तदान की परंपरा हमारे समाज में प्राचीन काल से विद्यमान रही है। इन्हीं महान दानों में अंगदान भी एक ऐसा महादान है, जो किसी परिवार के बुझते हुए दीपक को पुनः प्रज्वलित कर सकता है। किसी अंधकारमय जीवन को दृष्टि प्रदान करना, किसी असाध्य रोग से पीड़ित व्यक्ति को नया जीवन देना तथा किसी परिवार की समाप्त होती आशा को पुनर्जीवित करना निस्संदेह महानतम मानवीय सेवा है।
आज विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में हुई प्रगति ने यह सिद्ध कर दिया है कि मृत्यु के उपरांत भी अनेक अंग और ऊतक अन्य रोगियों के जीवन को सुरक्षित कर सकते हैं। नेत्रदान से दृष्टिहीन व्यक्ति को प्रकाश मिल सकता है। यकृत, वृक्क, हृदय, फेफड़े तथा अन्य अंग अनेक रोगियों के जीवन की रक्षा कर सकते हैं। एक अंगदाता अनेक व्यक्तियों के जीवन में आशा का संचार कर सकता है। यही कारण है कि विकसित राष्ट्रों में अंगदान को जन आंदोलन का स्वरूप प्राप्त हो चुका है।
दुर्भाग्यवश हमारे देश में आज भी अंगदान के विषय में अनेक भ्रांतियां, संकोच और धार्मिक भ्रम विद्यमान हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि अंगदान से धार्मिक परंपराओं का उल्लंघन होता है, जबकि वस्तुतः लगभग सभी प्रमुख धार्मिक परंपराएँ परोपकार, दया और मानव सेवा को सर्वोच्च धर्म मानती हैं। किसी पीड़ित मनुष्य को जीवन प्रदान करना ही वास्तविक धर्म है। अतः अंगदान के प्रति व्याप्त भ्रांतियों का वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टि से निराकरण करना समय की आवश्यकता है।
विशेष रूप से नेत्रदान अत्यंत सरल, सुरक्षित और महत्त्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति के देहावसान के कुछ घंटों के भीतर नेत्र सुरक्षित रूप से प्राप्त किए जा सकते हैं और उनके माध्यम से दो दृष्टिहीन व्यक्तियों को प्रकाश मिल सकता है। एक परिवार के लिए यह संतोष का विषय होता है कि उनके प्रियजन का जीवन भले ही समाप्त हो गया हो, किंतु उनकी आँखों के माध्यम से संसार का प्रकाश किसी अन्य व्यक्ति के जीवन में सदा के लिए जीवित रहेगा।
रक्तदान, अंगदान और देहदान मानव सेवा की एक अखंड श्रृंखला हैं। रक्तदान जीवित अवस्था में जीवन बचाता है, अंगदान मृत्यु के उपरांत नवजीवन प्रदान करता है और देहदान चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान को नई दिशा देता है। जो व्यक्ति इन तीनों महादानों के प्रति जागरूक है, वह वास्तव में मानवता की सेवा का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता है।
लेखक के रूप में मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि समाज में जन जागरण के माध्यम से अनेक परिवारों को नेत्रदान के लिए प्रेरित करने का अवसर मिला। अनेक दिवंगत व्यक्तियों के नेत्रदान की व्यवस्था कराकर उनके नेत्र दृष्टिहीन जनों तक पहुँचाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह अनुभव अत्यंत भावपूर्ण और प्रेरणादायक रहा है, क्योंकि प्रत्येक नेत्रदान के साथ किसी अंधकारमय जीवन में प्रकाश का संचार हुआ।
मेरे जीवन का एक अत्यंत भावनात्मक पक्ष यह भी है कि मैंने केवल समाज के अन्य लोगों के नेत्रदान के लिए