इस मंदिर में तीनों पहर बदलता है माता का स्वरुप, दूर-दूर से चमत्कार देखने आते हैं भक्त

इस मंदिर में तीनों पहर बदलता है माता का स्वरुप, दूर-दूर से चमत्कार देखने आते हैं भक्त

 

भारत के हर हिस्से में कई प्राचीन देवी-देवताओं के मंदिर हैं। इनमें से कई मंदिर का इतिहास हजारों साल से भी अधिक पुराना है। कहीं माता को मनसा देवी के नाम से जाना जाता है तो कहीं माता ज्वाला जी के रूप में विराजमान हैं, माता के भक्त उनके सभी रूपों की पूजा सच्चे मन और भक्तिभाव से करते हैं। आज के इस लेख में हम आपको एक बेहद चमत्कारी मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। यहाँ स्थापित माता की मूर्ति तीन पहर में अलग-अलग स्वरुप बदलती है। आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में-

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ऐसे हुआ था लहर की देवी मंदिर का निर्माण

लहर की देवी मंदिर झांसी के सीपरी में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण बुंदेलखंड के चंदेल राज के समय किया गया था। यहां के राजा का नाम परमाल देव था। राजा के दो भाई थे, जिनका नाम आल्हा-उदल था। आल्हा की पत्नी और महोबा की रानी मछला का पथरीगढ़ के राजा ज्वाला सिंह ने अपहरण कर लिया था। ऐसा कहा जाता है कि आल्हा ने ज्वाला सिंह को पराजित करने के लिए और ज्वाला सिंह से रानी को वापस लाने के लिए अपने भाई के सामने अपने पुत्र की बलि इसी मंदिर में चढ़ा दी थी। लेकिन देवी ने इस बलि को स्वीकर नहीं किया और उस बालक को जीवित कर दिया। मान्यताओं के अनुसार जिस पत्थर पर आल्हा ने अपने पुत्र की बलि दी थी, वह पत्थर आज भी इसी मंदिर में सुरक्षित है।

मनिया देवी के रूप में होती है माता की पूजा

लहर की देवी को मनिया देवी के रूप में भी जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि लहर की देवी, मां शारदा की बहन हैं। यह मंदिर 8 शिला स्तंभों पर खड़ा है। मंदिर के प्रत्येक स्तंभ पर आठ योगिनी अंकित हैं। इस प्रकार यहां 64 योगिनी मौजूद हैं। मंद‍िर परिसर में भगवान गणेश, शंकर, शीतला माता, अन्नपूर्णा माता, भगवान दत्तात्रेय, हनुमानजी और काल भैरव का भी मंद‍िर स्थित है।

हर पहर अलग-अलग स्वरूप बदलती है देवी की मूर्ति

माना जाता है कि इस मंदिर में मौजूद लहर की देवी की मूर्ति दिन में तीन बार स्वरूप बदलती है। प्रातःकाल में बाल्‍यावस्‍था में, दोपहर में युवावस्‍था में और सायंकाल में देवी मां प्रौढ़ा अवस्‍था में मां नजर आती हैं। हर पहर में देवी का अलग-अलग श्रृंगार किया जाता है। प्रचलित कथाओं के अनुसार कालांतर में पहूज नदी का पान पूरे क्षेत्र तक पहुंच जाता है। इस नदी की लहरें माता के चरणों को छूती थीं इसलिए मंदिर में स्थापित मां की मूर्ति को लहर की देवी कहा जाता है। मन्दिर में विराजमान देवी तान्त्रिक हैं इसलिए यहाँ पर अनेक तान्त्रिक क्रियाएँ भी होती हैं। नवरात्रों में माता के दर्शन के लिए यहाँ ह़जारों की संख्या में भीड़ उमड़ती है। नवरात्र में अष्टमी की रात को यहाँ भव्य आरती का आयोजन होता है।

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