जागेश्वर मंडल पुण्यतिथि विशेष: जानिए राजनीति को लोकसेवा का संकल्प मानने वाले महान नेता का जीवन

स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व मंत्री जागेश्वर मंडल की पुण्यतिथि 9 सितंबर पर विशेष रूप से उनके जीवन और योगदान को याद किया जा रहा है। आज की राजनीति में जब जनप्रतिनिधित्व का अर्थ अक्सर सत्ता, पद, चुनावी गणित, प्रचार और तात्कालिक राजनीतिक लाभ तक सिमटता दिखाई देता है, तब जागेश्वर मंडल का जीवन भारतीय सार्वजनिक जीवन की उस परंपरा की याद दिलाता है। इस परंपरा में राजनीति सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी और लोकसेवा का संकल्प हुआ करती थी। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल भागलपुर या सुल्तानगंज के एक राजनेता को स्मरण करना नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति को याद करना है जिसमें संघर्ष, सादगी, विचार, जनसरोकार और सार्वजनिक नैतिकता राजनीति के मूल आधार हुआ करते थे।
जागेश्वर मंडल का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
जागेश्वर मंडल का जन्म 1 जुलाई 1911 को भागलपुर जिले के शाहकुंड प्रखंड के भीखनपुर गांव में हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय गजाधर मंडल थे। ग्रामीण परिवेश से निकलकर उन्होंने शिक्षा, अध्यापन, स्वतंत्रता आंदोलन, सहकारिता, पंचायती राज और सक्रिय राजनीति के अनेक क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन केवल बड़े शहरों और बड़े राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं था। गांवों और कस्बों में काम करने वाले असंख्य कार्यकर्ताओं ने उसकी सामाजिक जमीन तैयार की थी। 1931 में जिला स्कूल, भागलपुर से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने आईए और बीए भी प्रथम श्रेणी में किया था। इसके बाद उन्होंने पटना ट्रेनिंग कॉलेज से बीएड और पटना लॉ कॉलेज से कानून की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने शारदा पाठशाला में गणित शिक्षक के रूप में काम किया और 1938 में कहलगांव उच्च विद्यालय के प्रधानाध्यापक बने। बाद में वे कहलगांव कॉलेज और नवगछिया कॉलेज के सचिव रहे। वे भागलपुर विश्वविद्यालय की सीनेट और सिंडिकेट के सदस्य बने तथा पंचायती राज ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के निदेशक की जिम्मेदारी भी उन्होंने संभाली। उनकी शिक्षा-दृष्टि केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित नहीं थी। वे शिक्षा को सामाजिक चेतना और समाज निर्माण का माध्यम मानते थे। शिक्षक और राजनेता उनके व्यक्तित्व में दो अलग-अलग भूमिकाएं नहीं थीं। दोनों का उद्देश्य समाज को अधिक जागरूक, संगठित और लोकतांत्रिक बनाना था।
स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और त्याग
1939 में कांग्रेस से जुड़ना उनके सार्वजनिक जीवन का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ था। 1942 में महात्मा गांधी के करो या मरो के आह्वान पर वे भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे। उन्होंने सियाराम सिंह और परशुराम सिंह जैसे क्रांतिकारियों के सहयोगी के रूप में भूमिगत जीवन बिताया और स्वतंत्रता संघर्ष के लिए अपनी सरकारी नौकरी तक छोड़ दी थी। उस दौर में सरकारी नौकरी सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार हुआ करती थी। उसे छोड़कर भूमिगत आंदोलन में जाना केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि यह व्यक्तिगत त्याग और गहरी प्रतिबद्धता का परिचायक था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था। दिसंबर 1972 में सत्याग्रह करते हुए उन्हें पटना में गिरफ्तार किया गया था और हजारीबाग जेल भेजा गया था। 1974 के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में वे मीसा बंदी बने थे। उनके साथ प्रो. रामजी सिंह, सुधा श्रीवास्तव, हरिवंश मणि सिंह, सीताराम किशोरपुरिया, विजय मित्रा, बलराम घोष, कृष्णा मित्रा और मीरा घोष सहित अनेक लोग गिरफ्तार किए गए थे। यह गिरफ्तारी भागलपुर के कंवाईड बिल्डिंग के निकट हुई थी। 1974 का आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अव्यवस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों के सवालों पर व्यापक जनआंदोलन खड़ा हुआ था। जागेश्वर मंडल की इस आंदोलन में भागीदारी यह बताती है कि स्वतंत्रता के बाद भी वे नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर उतने ही सजग थे, जितने वे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हुआ करते थे।
प्रेस की स्वतंत्रता और सत्याग्रह
1982 का बिहार प्रेस विधेयक उनके लोकतांत्रिक संघर्ष का एक और बेहद महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र की सरकार द्वारा लाए गए इस विधेयक को पत्रकार संगठनों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने प्रेस की स्वतंत्रता पर संभावित अंकुश माना था। इसके विरोध में एक व्यापक आंदोलन हुआ था और अंततः सरकार को वह विधेयक वापस लेना पड़ा था। जागेश्वर मंडल ने भी इस विधेयक के खिलाफ सत्याग्रह किया था। यह प्रसंग उनके राजनीतिक चरित्र की एक अनूठी विशेषता को सामने लाता है। जिस व्यक्ति ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया था, वही व्यक्ति स्वतंत्र भारत में भी प्रेस की स्वतंत्रता के सवाल पर सत्ता के विरुद्ध खड़ा होने में कभी नहीं हिचकिचाया। 1984 में लगभग 1400 सत्याग्रहियों के साथ भागलपुर के कैंप जेल जाना भी इसी संघर्षशील परंपरा का एक हिस्सा था। उनका राजनीतिक संसार किसी एक दल या नेता तक सीमित नहीं था। वे महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, बाबू जगजीवन राम, जयप्रकाश नारायण, के. कामराज, मोरारजी देसाई, अशोक मेहता, चौधरी चरण सिंह, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, श्रीकृष्ण सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह, वीरचंद्र पटेल, विनोदानंद झा, जननायक कर्पूरी ठाकुर, कृष्ण बल्लभ सहाय और शुभकरण चुड़ीवाला जैसे महान नेताओं के संपर्क में रहे। उन्होंने अब्दुल गफ्फार खान के साथ सांप्रदायिक सद्भाव के लिए भ्रमण किया और आचार्य विनोबा भावे के साथ सर्वोदय आंदोलन में पैदल यात्रा भी की थी।
सहकारिता आंदोलन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती
जागेश्वर मंडल की राजनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आधार सहकारिता आंदोलन भी था। उन्होंने स्वदेशी और खादी ग्रामोद्योग के निर्माण में बेहद सक्रिय भूमिका निभाई थी। उन्होंने भागलपुर बुनकर सहयोग समिति की स्थापना में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। वे भागलपुर सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के सचिव रहे थे। इसके अलावा वे बिहार स्टेट कोऑपरेटिव बैंक के निदेशक तथा बिहार कोऑपरेटिव फेडरेशन के उपाध्यक्ष और अध्यक्ष पद पर भी रहे थे। वे भूमि विकास बैंक, बिहार हाउसिंग कोऑपरेटिव फेडरेशन और भागलपुर कोऑपरेटिव मिल्क यूनियन से भी गहराई से जुड़े हुए थे। वे शुभकरण चुड़ीवाला के साथ भागलपुर कोऑपरेटिव मिल्क यूनियन के मुख्य संस्थापकों में शामिल थे। मायागंज में डेयरी के लिए जमीन खरीदने की प्रक्रिया में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही थी। यह जमीन पहले ठाकुर परिवार की हुआ करती थी। सहकारिता उनके लिए महज एक संस्थागत ढांचा नहीं था। सहकारिता उनके लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और किसान, बुनकर, मजदूर तथा छोटे उत्पादकों को सामूहिक आर्थिक शक्ति देने का एक सशक्त माध्यम था। इसी दृष्टि से उन्होंने दीप नारायण सिंह के साथ मिलकर सहकारिता आंदोलन को आगे बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनका दृढ़ विश्वास था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी पूरी तरह सार्थक हो सकता है जब समाज के कमजोर वर्गों को आर्थिक शक्ति भी प्राप्त हो।
विधायिका, पंचायती राज और मंत्री के रूप में कार्य
वे 1952 से 1964 और फिर 1966 से 1977 तक लंबे समय तक बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे थे। 2 अक्टूबर 1964 को भागलपुर जिला परिषद के गठन के बाद वे इसके प्रथम अध्यक्ष चुने गए थे। पंचायती राज उनके लिए केवल प्रशासनिक विकेंद्रीकरण का साधन नहीं था। इसका मूल उद्देश्य निर्णय प्रक्रिया में गांव और स्थानीय समाज की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित करना था। 1977 में सुल्तानगंज विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित होकर वे जननायक कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार में सहकारिता, ग्रामीण विकास और उत्पाद मंत्री बने थे। 14 जुलाई 1979 को बिहार में पूर्ण नशाबंदी लागू करने की दिशा में उन्होंने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मंत्री पद से बाहर आने के बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन लगातार सक्रिय बना रहा था। वे कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े सतत परिवर्तनशील विकास बोर्ड के अध्यक्ष रहे थे। वे बिहार भूमि आयोग के सदस्य बने थे और संथाल-पहाड़िया सेवा मंडल, देवघर के निदेशक भी रहे थे। उन्होंने भारत कृषक समाज की बिहार इकाई के अध्यक्ष, कुष्ठ निवारण केंद्र, भागलपुर के अध्यक्ष और भागलपुर लेबर असेंबली के सभापति जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण दायित्व भी निभाए थे। 1969 में वे संगठन कांग्रेस में बिहार के कोषाध्यक्ष और उपाध्यक्ष रहे थे। 1977 से 1988 के बीच उन्होंने जनता पार्टी, जनता पार्टी सेक्युलर, दलित मजदूर किसान पार्टी, जनता पार्टी और लोकदल जैसी विभिन्न राजनीतिक धाराओं में बिहार स्तर पर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली थीं। वे केवल एक आंदोलनकारी और संगठनकर्ता ही नहीं थे। वे गांव पत्रिका के संपादन से भी जुड़े रहे थे और उन्होंने बिहार राज्य पंचायत परिषद तथा सहकारिता से संबंधित पुस्तकों के संपादन में भी अपना बहुमूल्य योगदान दिया था।
जागेश्वर मंडल की जीवन यात्रा और उनकी विरासत
9 सितंबर 1988 को उनका देवलोकगमन हुआ था। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप को सामने लाना बेहद स्वाभाविक है। जागेश्वर मंडल का पूरा जीवन हमारे सामने कई असुविधाजनक सवाल छोड़ जाता है। क्या आज की राजनीति में विचार अब भी उतने ही अधिक महत्वपूर्ण हैं? क्या आज के सार्वजनिक जीवन में त्याग और निष्ठा के लिए कोई जगह बची है? क्या आज सत्ता में रहते हुए भी कोई व्यक्ति प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक असहमति के लिए खुलकर खड़े होने का जोखिम उठा सकता है? इन सभी कठिन सवालों का उत्तर जागेश्वर मंडल किसी राजनीतिक घोषणापत्र में नहीं देते हैं। उनका पूरा जीवन ही इन सभी सवालों का सबसे सटीक उत्तर है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में कड़ा संघर्ष किया था, स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए वे जेल गए थे, प्रेस की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने सत्याग्रह किया था, सहकारिता के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का अथक प्रयास किया था, पंचायती राज के जरिए उन्होंने जनभागीदारी को लगातार बढ़ावा दिया था और मंत्री पद मिलने पर उन्होंने हमेशा सामाजिक सुधार को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता दी थी। इसलिए जागेश्वर मंडल केवल भागलपुर, सुल्तानगंज या बिहार की राजनीति के एक साधारण अध्याय का नाम नहीं हैं। वे भारतीय राजनीति की उस महान पीढ़ी के सच्चे प्रतिनिधि हैं, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से ही राजनीति का असली संस्कार पाया था। उनकी सबसे बड़ी और अमूल्य विरासत शायद यही है कि उन्होंने राजनीति को हमेशा पद से बहुत बड़ा माना और सेवा को हमेशा सत्ता से भी ऊपर स्थान दिया। उन्होंने दुनिया को यह पूरी तरह दिखाया कि किसी भी जनप्रतिनिधि की असली प्रतिष्ठा उसके पद की ऊंचाई से कभी तय नहीं होती है, बल्कि जनता के बीच उसकी अटूट विश्वसनीयता से तय होती है। यही कारण है कि उनकी पुण्यतिथि केवल एक साधारण स्मरण का अवसर नहीं है, बल्कि यह आज की वर्तमान राजनीति को सही तरीके से परखने का भी एक बहुत बड़ा अवसर है। सादगी, सेवा, संघर्ष और सिद्धांत इन चार छोटे शब्दों में ही जागेश्वर मंडल के संपूर्ण सार्वजनिक जीवन की पूरी और सच्ची कहानी समाई हुई है।