जंतर-मंतर प्रदर्शन और पैलेट गन उपयोग मामला: लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और भीड़ नियंत्रण की चुनौतियां

जंतर-मंतर प्रदर्शन और पैलेट गन उपयोग मामला: लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और भीड़ नियंत्रण की चुनौतियां

लोकतंत्र की पहचान केवल नियमित चुनावों से नहीं होती है। उसकी असली कसौटी यह होती है कि वह असहमति के साथ कैसा व्यवहार करता है। धरना, प्रदर्शन, रैली और जनसभा केवल राजनीतिक गतिविधियां नहीं हैं, बल्कि ये नागरिकों और राज्य के बीच संवाद के संवैधानिक माध्यम हैं। इसलिए किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए राज्य द्वारा बल प्रयोग का प्रश्न महज कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता है। यह नागरिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार और राज्य की जवाबदेही से भी सीधा जुड़ जाता है।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए 'चलो संसद' प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के कथित इस्तेमाल और साहिल लोचब के घायल होने के मामले ने इस बहस को एक बार फिर से सामने ला दिया है। साहिल की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 118 और 125 के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। धारा 118 खतरनाक हथियार या साधन से जानबूझकर चोट अथवा गंभीर चोट पहुंचाने से संबंधित है, जबकि धारा 125 दूसरों के जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कृत्यों से जुड़ी हुई है।

राहुल गांधी का धरना और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

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एफआईआर दर्ज कराने की मांग को लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी संसद मार्ग थाने पहुंचे थे। वे वहां साहिल और उनकी मां के साथ धरने पर बैठे थे। उनका आरोप था कि साहिल के शरीर में अब तक पैलेट के छर्रे मौजूद हैं और उनकी आंख की रोशनी भी प्रभावित हुई है। राहुल गांधी ने इसे केवल एक युवक के साथ कथित अन्याय का मामला नहीं माना था। उन्होंने यह सवाल भी उठाया था कि जब राजधानी के एक पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराने में इतनी कठिनाई आ सकती है, तो दूरदराज के गांवों और छोटे शहरों में आम नागरिक की स्थिति कैसी होगी।

साहिल ने भी शिकायत दर्ज कराने में आई कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए राहुल गांधी और उनकी टीम के प्रति अपना आभार जताया था। कांग्रेस ने इस एफआईआर को न्याय की दिशा में उठाया गया पहला कदम बताया है। दूसरी ओर, भाजपा ने राहुल गांधी पर अराजकता की राजनीति करने का गंभीर आरोप लगाया है। भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था कि इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया पहले से ही चल रही है।

संविधान और भीड़ नियंत्रण की सीमाएं

इन तमाम राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग इस पूरे मामले का मूल प्रश्न यह है कि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए राज्य की शक्ति की संवैधानिक सीमा क्या होनी चाहिए। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 19(1)(ख) नागरिकों को शांतिपूर्वक तथा निःशस्त्र सभा करने का अधिकार प्रदान करता है। हालांकि ये अधिकार पूरी तरह निरपेक्ष नहीं हैं। सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा जैसे संवैधानिक आधारों पर इन पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

लेकिन किसी भी प्रतिबंध की कसौटी राज्य की सुविधा नहीं बल्कि केवल संविधान होना चाहिए। राज्य का दायित्व केवल व्यवस्था बनाए रखना भर नहीं होता है। उसे व्यवस्था की रक्षा करते हुए नागरिक स्वतंत्रताओं को अनावश्यक क्षति से भी बचाना जरूरी होता है। यही कारण है कि जंतर-मंतर की घटना को केवल पैलेट गन के इस्तेमाल के विवाद के रूप में देखना बिल्कुल पर्याप्त नहीं होगा। इसका असली प्रश्न यह है कि भारत की भीड़ नियंत्रण नीति कितनी लोकतांत्रिक, मानवीय और जवाबदेह है।

पुलिस बल प्रयोग के नियम और पैलेट गन का प्रभाव

कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के पास बल प्रयोग की शक्ति होना आवश्यक माना जाता है। यदि प्रदर्शन के दौरान हिंसा, आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या सुरक्षा बलों पर हमला होता है, तो पुलिस मूकदर्शक नहीं रह सकती है। लेकिन एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में बल प्रयोग कोई असीमित अधिकार नहीं है। उसकी वैधता हमेशा आवश्यकता, अनुपातिकता, सावधानी और जवाबदेही के आधार पर तय होनी चाहिए।

इसका मूल सिद्धांत बहुत सरल है कि राज्य उतना ही बल प्रयोग करे, जितना स्थिति को नियंत्रित करने के लिए वास्तव में आवश्यक हो। पैलेट गन को अपेक्षाकृत कम घातक भीड़ नियंत्रण साधन माना जाता है। लेकिन कम घातक होने का मतलब बिल्कुल नुकसानरहित होना नहीं है। धातु के अनेक छोटे कण एक साथ फैलते हैं और उनके शरीर के किस हिस्से पर लगने का नियंत्रण बहुत सीमित होता है। आंख, सिर, गर्दन या शरीर के अन्य संवेदनशील हिस्सों में लगने वाली चोट स्थायी नुकसान तक पहुंचा सकती है।

न्यायिक जांच और आधुनिक पुलिसिंग की आवश्यकता

भारत में पैलेट गन को लेकर सबसे गंभीर बहस जम्मू-कश्मीर में इसके इस्तेमाल के बाद सामने आई थी। आंखों की रोशनी जाने और गंभीर चोटों के अनेक मामलों ने इसके उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। जंतर-मंतर की घटना ने उसी बहस को राष्ट्रीय राजधानी में एक बार फिर सामने ला दिया है। हालांकि इस मामले में पैलेट के कथित इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। सुरक्षा बलों की ओर से धातुयुक्त पैलेट के इस्तेमाल के आरोपों का पूरी तरह खंडन किया गया है।

भीड़ नियंत्रण के संदर्भ में आधुनिक पुलिसिंग का पहला माध्यम बल नहीं बल्कि संवाद होना चाहिए। प्रशिक्षित वार्ताकार, चरणबद्ध चेतावनी, सुरक्षित निकासी मार्ग और जोखिम का वैज्ञानिक आकलन पुलिस की प्राथमिकता होनी चाहिए। दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में भीड़ प्रबंधन की रणनीतियां इसी दिशा में लगातार विकसित हुई हैं। आधुनिक पुलिसिंग की सफलता इस बात से बिल्कुल नहीं मापी जाती है कि भीड़ कितनी जल्दी तितर-बितर हुई है।

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