जेजेपी सत्ता की चाबी से कबाड़ तक का सफर

जेजेपी सत्ता की चाबी से कबाड़ तक का सफर

JJP ने 2019 में हरियाणा की सत्ता में अहम भूमिका निभाई थी। 2024 में पार्टी शून्य सीट पर सिमट गई और दुष्यंत चौटाला उचाना कलां में पांचवें स्थान पर रहे।

JJP नेम प्लेट कबाड़ में: सत्ता की चाबी अब धूल फांक रही

कभी बनी थी सत्ता की चाबी, आज कबाड़ में धूल फांक रही !

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नेम प्लेट से कबाड़ तक : JJP की सियासी तस्वीर पर बड़ा सवाल!

जननायक जनता पार्टी ने कभी हरियाणा की सत्ता में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई थी। 2019 के विधानसभा चुनाव में 10 सीटें जीतकर पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन में सरकार बनाई और सत्ता में अहम भूमिका निभाई थी लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का खाता भी नहीं खुल सका।
तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की उचाना विधानसभा से ज़मानत जब्त हो गई और वे पांचवें नंबर पर रहे।

कबाड़ की दुकान पर यह फ़ोटो देखकर काफी हैरानी हुई।

तस्वीर देखकर सवाल यही उठता है कि जिस संगठन की पहचान कभी सत्ता के गलियारों तक पहुंची, उसकी राजनीतिक पहचान की नेम प्लेट आखिर कबाड़ तक कैसे पहुंच गई ?
आखिर संगठन की नेम प्लेट संभालने वाला ही अगर उसे संभाल न पाए, तो संगठन की हालत पर सवाल क्यों न उठें ?

सियासत में वक्त बदलते देर नहीं लगती—कभी चाबी से सत्ता का ताला खुला था, आज वही सियासी पहचान कबाड़ में क्यों नजर आ रही है

राजकुमार अग्रवाल /चंडीगढ़ /25 अगस्त 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

हरियाणा की राजनीति में समय के साथ कई ऐसे मोड़ आए हैं, जिन्होंने बड़े-बड़े राजनीतिक दलों की ताकत और कमजोरी दोनों को सामने रखा है। जननायक जनता पार्टी यानी JJP की कहानी भी इसी बदलाव का एक उदाहरण है। कुछ साल पहले तक जिस पार्टी को हरियाणा की सत्ता की चाबी रखने वाली ताकत के तौर पर देखा जा रहा था, वही पार्टी 2024 के विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत सकी।

2019 के विधानसभा चुनाव में JJP ने पहली बार राज्य की विधानसभा में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई थी। पार्टी ने 90 में से 10 सीटें जीतीं और किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बाद सरकार बनाने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो गई। BJP को 40 सीटें मिली थीं, जबकि बहुमत के लिए 46 विधायक जरूरी थे। ऐसे में JJP के समर्थन ने सरकार गठन का रास्ता साफ किया।

कभी सत्ता की चाबी मानी जाने वाली जननायक जनता पार्टी की नेम प्लेट आज कबाड़ की दुकान पर नजर आ रही है। यह तस्वीर देखकर कई लोग हैरान हैं। जिस पार्टी ने 2019 में हरियाणा की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाई थी, उसकी पहचान अब धूल फांक रही है। सवाल उठना स्वाभाविक है कि संगठन की नेम प्लेट संभालने वाले अगर खुद उसे न संभाल पाएं तो पार्टी की हालत पर सवाल क्यों न उठें।

जननायक जनता पार्टी यानी जेजेपी का गठन दिसंबर 2018 में हुआ था। चौटाला परिवार के अंदरूनी मतभेदों के कारण यह पार्टी भारतीय राष्ट्रीय लोक दल यानी इनेलो से अलग होकर बनी। दुष्यंत चौटाला और उनके पिता अजय चौटाला ने इसे चौधरी देवीलाल के सिद्धांतों पर चलाने का दावा किया। पार्टी का चुनाव चिन्ह चाबी रखा गया। नाम भी जननायक जनता पार्टी रखा गया ताकि देवीलाल की विरासत जुड़ी रहे।

2019 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में जेजेपी ने अपनी पहली बड़ी सफलता हासिल की। पार्टी ने 10 सीटें जीतीं। वोट शेयर करीब 14.8 से 15 प्रतिशत रहा। भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। कांग्रेस भी आगे नहीं थी। ऐसे में जेजेपी किंगमेकर बन गई। दुष्यंत चौटाला उप मुख्यमंत्री बने। पार्टी ने करीब साढ़े चार साल तक भाजपा के साथ गठबंधन में सरकार चलाई।

उस समय उचाना कलां से दुष्यंत चौटाला ने बड़ी जीत हासिल की थी। उन्हें 92 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। पार्टी के कई विधायक बने। जुलाना जैसे क्षेत्रों में भी पार्टी की मजबूत पकड़ दिखी। जाट बहुल इलाकों में जेजेपी ने अच्छी पैठ बनाई। कई लोगों ने सोचा कि यह पार्टी हरियाणा की क्षेत्रीय राजनीति में लंबे समय तक अपनी जगह बनाए रखेगी।

समय के साथ हालात बदलने लगे। किसानों के आंदोलन के दौरान जेजेपी पर सवाल उठे। पार्टी भाजपा के साथ गठबंधन में थी। कई जाट वोटरों में नाराजगी बढ़ी। गठबंधन के फायदों के बावजूद पार्टी की छवि प्रभावित हुई। लोकसभा चुनाव 2024 में जेजेपी का प्रदर्शन बहुत कमजोर रहा। पार्टी को एक प्रतिशत से भी कम वोट मिले। ज्यादातर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।

मार्च 2024 में भाजपा ने जेजेपी से गठबंधन तोड़ दिया। इसके बाद पार्टी में विधायकों के इस्तीफे आने लगे। कई नेता भाजपा या कांग्रेस में चले गए। एक समय पर जेजेपी के पास 10 विधायक थे। बाद में संख्या तीन तक सिमट गई। इनमें दुष्यंत चौटाला, उनकी मां नैना चौटाला और अमरजीत ढांडा शामिल थे। पार्टी मां-बेटे की पार्टी जैसी दिखने लगी।

2024 के विधानसभा चुनाव में जेजेपी ने आजाद समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया। पार्टी ने 66 सीटों पर चुनाव लड़ा। नतीजे आए तो पार्टी का खाता भी नहीं खुला। वोट शेयर घटकर 0.9 प्रतिशत के आसपास रह गया। 2019 के मुकाबले भारी गिरावट हुई। ज्यादातर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। सिर्फ दिग्विजय चौटाला की जमानत बची, लेकिन वे भी हार गए।

दुष्यंत चौटाला खुद उचाना कलां से चुनाव लड़े। 2019 में जहां उन्हें 92 हजार वोट मिले थे, वहां इस बार सिर्फ करीब 7950 वोट मिले। वे पांचवें नंबर पर रहे। भाजपा के देवेंद्र अत्री ने 32 वोटों के अंतर से जीत हासिल की। कांग्रेस के बृजेंद्र सिंह दूसरे स्थान पर रहे। दो निर्दलीय उम्मीदवार भी दुष्यंत से आगे रहे। जमानत जब्त हो गई।

जुलाना से अमरजीत ढांडा को भी बहुत कम वोट मिले। कांग्रेस की विनेश फोगाट वहां जीतीं। पार्टी के पुराने गढ़ों में भी जेजेपी का वोट बैंक बिखर गया। कई सीटें कांग्रेस और भाजपा के पास चली गईं। इनेलो ने दो सीटें जीतीं, लेकिन उसका प्रदर्शन भी सीमित रहा। हरियाणा की राजनीति अब मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द सिमटती दिख रही है।

कबाड़ की दुकान पर मिली नेम प्लेट की तस्वीर इसी बदलाव को दिखाती है। जिस संगठन की पहचान सत्ता के गलियारों तक पहुंची थी, उसकी राजनीतिक पहचान की प्लेट अब कबाड़ में पड़ी है। यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं है। यह सवाल है कि संगठन की पहचान संभालने वाले अगर खुद उसे न संभाल पाएं तो पार्टी की जड़ें कैसे मजबूत रहेंगी।

सियासत में वक्त जल्दी बदल जाता है। कभी चाबी से सत्ता का ताला खुला था। आज वही सियासी पहचान कबाड़ में नजर आ रही है। चौटाला परिवार की राजनीति लंबे समय से हरियाणा में प्रभावशाली रही। देवीलाल से लेकर ओम प्रकाश चौटाला तक। परिवार में बंटवारे के बाद इनेलो और जेजेपी दोनों कमजोर पड़ीं।

2019 में जेजेपी ने नई उम्मीद जगाई थी। युवा चेहरे और चाबी के चिन्ह के साथ पार्टी आगे बढ़ी। गठबंधन सरकार में कुछ काम भी हुए। लेकिन किसानों के मुद्दों पर नाराजगी, गठबंधन टूटना और संगठनात्मक कमजोरी ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया। विधायकों के चले जाने से संगठन और कमजोर हुआ।

अब पार्टी के सामने चुनौती है कि वह अपनी जड़ें फिर से कैसे मजबूत करे। जाट बहुल क्षेत्रों में वोट बैंक बिखर चुका है। राष्ट्रीय पार्टियां मजबूत हो गई हैं। क्षेत्रीय दलों के लिए जगह कम होती दिख रही है। जेजेपी को अपनी पुरानी पहचान और सिद्धांतों पर काम करना होगा।

नेम प्लेट की तस्वीर देखकर कई कार्यकर्ता और आम लोग सवाल पूछ रहे हैं। जो संगठन कभी सत्ता की चाबी था, वह आज कबाड़ में क्यों है। क्या सिर्फ गठबंधन तोड़ने से ऐसा हुआ या लंबे समय की कमजोरियां भी जिम्मेदार हैं। ये सवाल राजनीतिक चर्चाओं में उठ रहे हैं।

हरियाणा की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। लेकिन 2024 के नतीजों ने दिखाया कि वोटर्स अब बड़े विकल्पों की तरफ जा रहे हैं। जेजेपी का वोट शेयर एक प्रतिशत से भी कम रहना इसकी मिसाल है। दुष्यंत चौटाला जैसे नेता को अपने गढ़ में पांचवें नंबर पर रहना पार्टी की मौजूदा हालत बताता है।

पार्टी के पास अब नई रणनीति की जरूरत है। संगठन को मजबूत करना, कार्यकर्ताओं को जोड़ना और जनता के मुद्दों पर फोकस करना जरूरी है। कबाड़ में पड़ी नेम प्लेट याद दिलाती है कि सत्ता की चाबी मिलना आसान हो सकता है, लेकिन उसे संभालकर रखना मुश्किल होता है।

जेजेपी की कहानी हरियाणा की राजनीति में एक सबक है। परिवार के बंटवारे, गठबंधन के उतार-चढ़ाव और वोटरों की नाराजगी ने पार्टी को प्रभावित किया। 2019 की सफलता के बाद 2024 की पूरी हार ने सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि पार्टी इन सवालों का जवाब कैसे देती है।

उचाना कलां जैसे क्षेत्रों में चौटाला परिवार की पुरानी पकड़ थी। वहां भी वोट बिखर गए। निर्दलीय उम्मीदवार आगे रहे। यह दिखाता है कि स्थानीय स्तर पर भी पार्टी की पकड़ कमजोर पड़ी। अन्य सीटों पर भी यही हाल रहा।गठबंधन सरकार के दौरान कुछ विकास कार्य हुए। लेकिन राजनीतिक संदेश सही नहीं पहुंच पाया। किसानों के आंदोलन के दौरान पार्टी की स्थिति अस्पष्ट रही। इससे जाट वोटरों में दूरी बढ़ी। बाद में गठबंधन टूटने पर भी पार्टी को फायदा नहीं मिला।

आज जब नेम प्लेट कबाड़ में दिख रही है तो याद आता है कि सियासत में पहचान बनाए रखना कितना जरूरी है। संगठन की नेम प्लेट संभालने वाले अगर उसे न संभाल पाएं तो संगठन की हालत पर सवाल उठना लाजमी है। जेजेपी के सामने अब नई शुरुआत का मौका है, लेकिन रास्ता आसान नहीं।

हाल ही में सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में वायरल हुई एक तस्वीर ने सभी का ध्यान खींचा। एक कबाड़ की दुकान में जेजेपी से जुड़े संगठन या पदाधिकारी की नेम प्लेट पड़ी दिखाई दी। जो नेम प्लेट कभी किसी कार्यालय या आवास के बाहर रुतबे का प्रतीक हुआ करती थी, उसका कबाड़ में मिलना यह दर्शाता है कि सत्ता जाते ही राजनीतिक वजूद किस तरह बिखर जाता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी संगठन का नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के भरोसे को कायम नहीं रख पाता, तो संगठन का ढांचा ढहने लगता है। नेम प्लेट का कबाड़ तक पहुंचना इस बात का प्रतीक है कि पार्टी के जमीनी दफ्तर बंद हो चुके हैं और कार्यकर्ता अपनी राजनीतिक पहचान छोड़ चुके हैं या दूसरे दलों में शामिल हो चुके हैं।

हरियाणा की सियासत में 'चाबी' से सत्ता का ताला खोलने वाली जेजेपी के लिए यह समय बेहद आत्मचिंतन का है। राजनीति में कोई भी हार या जीत अंतिम नहीं होती, लेकिन शून्य पर पहुंच जाने के बाद दोबारा खड़े होना बेहद कठिन होता है। जननायक जनता पार्टी को यदि अपना राजनीतिक अस्तित्व दोबारा हासिल करना है, तो उसे अपनी नीतियों और जनता से कटे होने के कारणों का गहराई से विश्लेषण करना होगा।

कबाड़ में पड़ी वह नेम प्लेट आज हरियाणा के हर छोटे-बड़े राजनीतिक दल के लिए एक चेतावनी की तरह है। यह याद दिलाती है कि जनसमर्थन के बिना सत्ता के गलियारों की चमक बहुत अस्थायी होती है। अगर जनता का विश्वास खो जाए, तो सत्ता की चाबी भी कबाड़ का हिस्सा बनते देर नहीं लगती।

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