योगी आदित्यनाथ से पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव ने सवाल क्या पूछ लिया, सत्ता के गलियारों में इतनी बेचैनी क्यों दिखाई देने लगी?

सवाल पूछना इतना बड़ा गुनाह हो गया है कि अब सवाल पूछने वाली पत्रकार से ही पूछताछ होने लगी?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव ने सवाल क्या पूछ लिया, सत्ता के गलियारों में इतनी बेचैनी क्यों दिखाई देने लगी?
बीजेपी कार्यकर्ताओं द्वारा घेरने और LIU से पूछताछ कराए जाने के जो आरोप सामने आ रहे हैं, आखिर इनके पीछे किसका आदेश था?
अगर पत्रकार ने कोई अपराध किया है तो कानून के तहत कार्रवाई कीजिए।
लेकिन अगर उसका अपराध सिर्फ़ सत्ता से सवाल पूछना है, तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद गंभीर सवाल है।
योगी जी, पत्रकार सवाल पूछेगा तो जवाब दीजिए—जांच एजेंसियां मत भेजिए।
लोकतंत्र में पत्रकारिता का काम जय-जयकार करना नहीं, जनहित के सवाल सत्ता के सामने रखना है।
लगता है सत्ता को सवालों से इतना डर लगने लगा है कि अब सवाल पूछने वाला ही कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।
वीडियो देखिए और खुद तय कीजिए—
सवाल से डर कौन रहा है और जवाब देने से कौन भाग रहा है?
लेखक: राजकुमार अग्रवाल
पत्रकार का सबसे प्राथमिक और मुख्य काम सत्ता से सवाल करना है। सवाल चाहे मौजूदा सरकार से हो, प्रदेश के मुख्यमंत्री से हो या फिर किसी विभाग के मंत्री से हो, सवाल पूछना पत्रकार का न केवल लोकतांत्रिक अधिकार है बल्कि यह उसकी नैतिक जिम्मेदारी भी है। लेकिन आज हमारे देश में पत्रकारिता एक बेहद कठिन और अजीब दौर से गुजर रही है। एक तरफ जहां सवाल पूछने पर धमकियां मिलने के आरोप लग रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पत्रकारों को सत्ता की सुविधाओं के इतना करीब ला दिया गया है कि जनहित के सवाल पूछने और सत्ता का गुणगान करने के बीच का फर्क लगातार धुंधला होता जा रहा है।
हाल ही में उत्तर प्रदेश से सामने आई एक घटना इस चिंता को और गहराई से रेखांकित करती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सवाल पूछने वाली एक महिला पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव ने गंभीर आरोप लगाए हैं। पत्रकार का कहना है कि तीखा सवाल पूछने के बाद उसे भाजपा कार्यालय में घेरकर डराया-धमकाया गया। उसे घर पर बुलडोजर चलवाने और पुलिस की एलआईयू जांच पीछे लगाने की धमकियां दी गईं। इतना ही नहीं, बाद में उसे उसके समाचार चैनल से भी बाहर कर दिया गया, जिससे वह काफी सहमी हुई है।
इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि सच्चाई सबके सामने आ सके। लेकिन अगर किसी पत्रकार को सिर्फ अपना काम करने और सवाल पूछने की वजह से प्रताड़ित किया जाता है, तो यह केवल उस एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता। यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, जहां मीडिया को जनता की आवाज बनकर सत्ता से जवाबदेही तय करने का अधिकार दिया गया है। अगर सवाल पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा किया जाएगा तो निष्पक्ष पत्रकारिता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
इसी देश में एक दूसरा पहलू मध्य प्रदेश से भी देखने को मिला है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। भोपाल स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पत्रकारों से चर्चा कर रहे थे। पत्रकार एक के बाद एक सवाल पूछ रहे थे और मुख्यमंत्री सहजता से उनका जवाब दे रहे थे। उसी दौरान जब पार्टी के एक मीडिया प्रतिनिधि ने माइक हटाकर पत्रकार को रोकने का प्रयास किया, तो मुख्यमंत्री ने तुरंत दखल देते हुए कहा कि पूछने दो। यह छोटा सा वाक्य आज के दौर में मीडिया की आजादी के लिए एक बहुत बड़ा और सकारात्मक संदेश देता है।
मुख्यमंत्री को पत्रकार का सवाल पसंद आए या न आए, सवाल सरकार के पक्ष में हो या आलोचनात्मक, सवाल तीखा हो या असहज करने वाला, लोकतंत्र में पत्रकार को अपनी बात रखने और सवाल पूछने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। किसी भी मुख्यमंत्री या जनप्रतिनिधि का काम हर सवाल से सहमत होना नहीं है, लेकिन जनता के प्रतिनिधि के रूप में आए पत्रकार के सवाल का शालीनता से जवाब देना उनकी संवैधानिक और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का अनिवार्य हिस्सा है।
मध्य प्रदेश की राजनीतिक और प्रशासनिक संस्कृति में यह एक स्वस्थ परंपरा रही है कि शीर्ष नेतृत्व हमेशा मीडिया के तीखे सवालों का सामना करता रहा है। समय के साथ राजनीतिक विचारधाराएं बदलीं और सरकार व मीडिया के संबंधों में कई उतार-चढ़ाव भी आए, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर संवाद और सवाल-जवाब की जगह हमेशा बरकरार रही। यह परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है जहां मतभेदों के बावजूद स्वस्थ चर्चा को हमेशा स्थान दिया जाता है।
अगर हम मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास को देखें तो दिग्विजय सिंह, उमा भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक, सभी ने अलग-अलग कार्यशैली और व्यक्तित्व के बावजूद पत्रकारों से सीधे संवाद की इस परंपरा को जीवित रखा है। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली सुंदरता है कि सत्ता में बैठे लोग सवालों से भागने के बजाय उनका सामना करते हैं और अपना पक्ष जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखते हैं।
सत्ता में बैठे लोग पत्रकार के सवाल से असहमत हो सकते हैं, आंकड़ों और तथ्यों के जरिए पत्रकार के दावे को चुनौती दे सकते हैं या राजनीतिक तर्क दे सकते हैं। यह सब लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन जब सत्ता की ताकत का इस्तेमाल करके पत्रकार को सवाल पूछने से रोका जाता है, तो इससे लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है। इसके साथ ही, आज के समय में पत्रकारिता के भीतर एक और गंभीर आंतरिक संकट पनप रहा है जिस पर ध्यान देना बेहद जरूरी है।
पत्रकारिता के सामने सिर्फ बाहरी या सत्ता का दबाव ही एकमात्र चुनौती नहीं है। सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब मीडिया का एक वर्ग सरकारी सुविधाओं और चाटुकारिता का इतना आदी हो जाता है कि उसकी इस सहूलियत की कीमत पूरी पत्रकारिता बिरादरी को चुकानी पड़ती है। जब निष्पक्षता के बजाय व्यक्तिगत लाभ और सत्ता से निकटता को प्राथमिकता दी जाने लगती है, तब पत्रकारिता का मूल उद्देश्य ही भटक जाता है।
सरकारी आवास, मुफ्त यात्रा, विशेष पास, विज्ञापनों का लालच और सत्ता के गलियारों में सीधी पहुंच जैसी सुविधाएं अगर तय नियमों के तहत सभी योग्य पत्रकारों को समान रूप से मिले तो इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन जब ये सुविधाएं निष्पक्ष सवाल पूछने की कीमत के रूप में बांटी या स्वीकार की जाने लगती हैं, तब से पत्रकारिता का पतन शुरू हो जाता है। जो पत्रकार सुविधाओं के मोह में बंध जाता है, उससे सत्ता से कड़े सवाल पूछने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
जब मीडिया का एक वर्ग सत्ता की जी-हजूरी में लग जाता है, तो सत्ता पक्ष को भी यह लगने लगता है कि पूरी मीडिया को सुविधाओं और संबंधों के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारों को उठाना पड़ता है जो आज भी जमीनी मुद्दों और जनता के सवालों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सत्ता उन्हें भी उसी चश्मे से देखने लगती है और उनके सही सवालों को भी प्रायोजित मान लिया जाता है।
पत्रकार न तो सरकार का स्थायी विरोधी होता है और न ही किसी राजनीतिक दल या विपक्ष का कार्यकर्ता होता है। पत्रकार का एकमात्र धर्म जनता के हितों की रक्षा करना और सत्ता में बैठे लोगों से निष्पक्ष सवाल करना है। लेकिन जब सत्ता में बैठे लोग हर तार्किक आलोचना को दुश्मनी और हर सवाल को षड्यंत्र मानने लगते हैं, तो लोकतंत्र में जनसंवाद का रास्ता पूरी तरह बंद होने लगता है जो किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
मध्य प्रदेश के हालिया घटनाक्रम से कम से कम यह उम्मीद जागती है कि वहां संवाद की गुंजाइश अभी खत्म नहीं हुई है। मुख्यमंत्री का माइक रोकने वाले को यह कहना कि पूछने दो, इसी लोकतांत्रिक मर्यादा का प्रतीक है। इस व्यवहार को किसी दल के प्रचार के रूप में देखने के बजाय एक स्वस्थ लोकतांत्रिक आचरण के उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए। देश के हर जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी को यह समझने की जरूरत है कि सवाल का जवाब देना ही एकमात्र सही रास्ता है।
पत्रकार की आवाज को दबाने के लिए माइक छीनना, धमकियां देना या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाना समस्याओं का समाधान नहीं है। अगर सवाल गलत है तो सही तथ्य सामने रखिए, अगर सवाल राजनीतिक है तो उसका राजनीतिक उत्तर दीजिए, लेकिन सवाल पूछने की प्रक्रिया को बंद करने की कोशिश मत कीजिए। किसी एक पत्रकार का माइक बंद कर देने से जनता के मन में उठ रहे सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि वे और तेजी से सोशल मीडिया और आम चर्चाओं में फैलने लगते हैं।
आज के दौर में पत्रकारों को भी अपनी गिरती साख और परंपरा को बचाने के लिए खुद आत्ममंथन करना होगा। सरकार के साथ पेशेवर संवाद बना रहे, लेकिन एक जरूरी वैचारिक दूरी भी बनी रहनी चाहिए। सत्ता का सम्मान करना एक बात है, लेकिन जनहित के सवालों से समझौता कर लेना बिल्कुल अलग बात है। सुविधाएं नियमों के दायरे में रहें, लेकिन उन सुविधाओं के बदले खबरों और विचारों का सौदा किसी भी कीमत पर नहीं होना चाहिए।
पत्रकारिता की वास्तविक ताकत और पहचान सरकार से मिलने वाली सुविधाओं या सुरक्षा से नहीं बनती, बल्कि उसके सवालों की धार और निष्पक्षता से बनती है। जिस दिन एक पत्रकार के मन में यह डर बैठ जाएगा कि सच बोलने या सवाल पूछने से उसकी नौकरी, गाड़ी, आवास या विज्ञापन चले जाएंगे, उसी दिन पत्रकारिता का वास्तविक अंत हो जाएगा और वह सिर्फ नाम मात्र की स्वतंत्र रह जाएगी।
इसलिए मध्य प्रदेश जैसी लोकतांत्रिक परंपराओं को हर राज्य में मजबूत किए जाने की आवश्यकता है। चाहे सत्ता में कोई भी राजनीतिक दल हो या कोई भी मुख्यमंत्री हो, पत्रकार को निर्भीक होकर सवाल पूछने का अवसर मिलना ही चाहिए। साथ ही, पत्रकारों को भी यह तय करना होगा कि वे जनता के प्रश्नों के साथ खड़े हैं या सत्ता के आराम के साथ। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन एक पत्रकार की सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी कभी नहीं बदलती।