कैथल लाडली हत्याकांड: हाईकोर्ट ने दोषी की फांसी को 50 साल की सख्त उम्रकैद में बदला, 73 लाख जुर्माना

Atal Hind12 August 20268 min read106 viewsकैथल
कैथल लाडली हत्याकांड: हाईकोर्ट ने दोषी की फांसी को 50 साल की सख्त उम्रकैद में बदला, 73 लाख जुर्माना

8 अक्तूबर 2022 कलायत वासियों के लिए कभी ना भूलने वाला काला दिन बन कर रहा गया था जब एक सात साल बच्ची ने अपनी मां से खाने के लिए चावल बनाने को कहा था और इसके बाद घर से बाहर खेलने चली गई। काफी देर तक वापस नहीं लौटने पर परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की।

सात सालउसकी तलाश में पुलिस और ग्रामीणों ने करीब 26 घंटे तक खेतों, तालाबों, जलाशयों, खंडहरों और आसपास के इलाकों को खंगाला था। बच्ची की तलाश के लिए पुलिस की कई टीमें लगाई गई थीं।लेकिन बच्ची जिन्दा होती तो माँ के हाथ से बने चावल भात खाती मगर अनहोनी कुछ और ही ब्यान कर रही थी

ग्रामीण रातभर बच्ची को ढूंढते रहे। करीब 26 घंटे बाद उसका अधजला शव बरामद हुआ तो पूरे गांव में मातम और आक्रोश फैल गया।

AtalHind की हर खबर सबसे पहलेJoin Channel

अदालत का फैसला: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कैथल के चर्चित लाडली हत्याकांड के दोषी पवन उर्फ मोनी की फांसी की सजा को सख्त उम्रकैद में बदल दिया है।

सजा की शर्त: दोषी को कम से कम 50 साल की वास्तविक जेल काटनी होगी। 50 साल से पहले उसकी रिहाई की किसी भी याचिका पर विचार नहीं किया जाएगा।

भारी जुर्माना: हाईकोर्ट ने दोषी पर कुल 73 लाख रुपये का जुर्माना (हत्या के लिए 50 लाख और पॉक्सो एक्ट के तहत 23 लाख) लगाया है, जो पीड़ित बच्ची के परिवार को मुआवजे के रूप में दिया जाएगा।

8 अक्तूबर 2022 को कैथल में 7 साल की बच्ची को अगवा कर दुष्कर्म किया गया था और हत्या के बाद उसके शव को जला दिया गया था। निचली अदालत ने आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने मॉडिफाई किया है।

कैथल/चंडीगढ़/12अगस्त 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कैथल के बहुचर्चित लाडली हत्याकांड में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने सात साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और उसकी हत्या के दोषी पवन उर्फ मोनी की फांसी की सजा को रद्द कर उसे उम्रकैद में बदल दिया है।

हालांकि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह कोई सामान्य उम्रकैद नहीं होगी। अदालत के आदेश के अनुसार दोषी को कम से कम 50 साल की वास्तविक जेल काटनी होगी। इसका मतलब है कि 50 साल पूरे होने से पहले उसकी रिहाई की किसी भी याचिका या पैरोल पर विचार नहीं किया जाएगा।

सामान्य मामलों में उम्रकैद की सजा में 14 या 20 साल बाद जेल से रिहाई की कानूनी संभावना बन जाती है। लेकिन इस मामले की भयावहता और मासूम के साथ हुई बर्बरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने यह कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने सुनिश्चित किया कि दोषी लंबे समय तक समाज से पूरी तरह दूर रहे।

सजा बदलने के साथ ही हाईकोर्ट ने दोषी पर कुल 73 लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना भी लगाया है। इसमें हत्या के जुर्म के लिए 50 लाख रुपये और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत 23 लाख रुपये का आर्थिक दंड शामिल है।

अदालत ने निर्देश दिया है कि जुर्माने की यह पूरी राशि पीड़ित बच्ची के परिवार को आर्थिक मुआवजे के रूप में दी जाए। यह राशि मृतक बच्ची के माता-पिता और उसके भाई-बहनों में बराबर-बराबर बांटी जाएगी, ताकि पीड़ित परिवार को कुछ सहारा मिल सके।

हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर दोषी जुर्माने की राशि जमा नहीं कर पाता, तब भी उसकी जेल की अवधि कम नहीं होगी। उसे अदालत द्वारा तय की गई 50 साल की वास्तविक कैद पूरी ही करनी होगी, जबकि जुर्माने की वसूली कानून के तहत उसकी संपत्ति से की जाएगी।

यह दिल दहला देने वाला मामला हरियाणा के कैथल जिले के कलायत क्षेत्र के एक गांव का है। घटना 8 अक्तूबर 2022 की है, जब सात साल की मासूम बच्ची दोपहर के समय अपने घर के बाहर खेलते-खेलते अचानक गायब हो गई थी।

लापता होने से ठीक पहले मासूम ने अपनी मां से बड़े प्यार से कहा था कि वह उसके लिए खाने में चावल बना दे। मां रसोई में चावल पकाने चली गई और बच्ची घर के बाहर खेलने निकल गई। किसी को अंदाजा भी नहीं था कि मां के हाथ के बने चावल खाना तो दूर, वह मासूम फिर कभी लौटकर घर ही नहीं आ पाएगी।

जब काफी देर तक बच्ची घर वापस नहीं आई, तो परिजनों को चिंता हुई। उन्होंने आसपास के घरों और गलियों में उसकी खोजबीन शुरू की। देखते ही देखते यह खबर पूरे गांव में आग की तरह फैल गई और सैकड़ों ग्रामीण बच्ची की तलाश में सड़कों पर उतर आए।

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तुरंत पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस ने बिना कोई समय गंवाए बड़े पैमाने पर सर्च ऑपरेशन शुरू किया। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (एसपी) ने खुद कमान संभालते हुए करीब 150 से अधिक पुलिसकर्मियों की अलग-अलग टीमें गठित कर दीं।

गांव के पास ही एक बड़ा तालाब था, इसलिए आशंका जताई गई कि कहीं खेलते समय बच्ची तालाब में न गिर गई हो। इस आशंका को दूर करने के लिए पुलिस ने गोताखोरों की मदद ली और तालाब तथा आसपास के जलाशयों को गहराई से खंगाला।

इसके अलावा पुलिस और ग्रामीणों की टीमों ने आसपास के खेतों, सुनसान खंडहरों, पुराने मकानों और झाड़ियों में भी तलाश जारी रखी। टॉर्च और मोबाइल की रोशनी के सहारे पूरी रात गांव का कोई भी शख्स नहीं सोया और लगातार सर्च अभियान चलता रहा।

करीब 26 घंटे के लंबे और थका देने वाले अभियान के बाद अगले दिन वह खौफनाक घड़ी आई, जिसने पूरे प्रदेश को हिलाकर रख दिया। गांव के पास ही एक सुनसान जगह से बच्ची का अधजला शव बरामद हुआ। शव की हालत देखकर हर किसी की आंखें नम हो गईं।

घटना की जानकारी मिलते ही गांव में मातम और भारी आक्रोश छा गया। ग्रामीणों ने सड़कों पर उतरकर पुलिस-प्रशासन से आरोपी को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने और सख्त से सख्त सजा देने की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया।

पुलिस जांच में चौंकाने वाले और खौफनाक तथ्य सामने आए। फॉरेंसिक जांच से पता चला कि आरोपी ने पहले मासूम के साथ दुष्कर्म जैसी दरिंदगी की थी। इसके बाद अपनी पहचान छिपाने की नीयत से उसने बच्ची की हत्या कर दी और शव पर पेट्रोल डालकर उसे जलाने का प्रयास किया।

इस जघन्य वारदात के बाद पुलिस ने वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने शुरू किए। गांव और आसपास के रास्तों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग को खंगाला गया। सीसीटीवी फुटेज की बारीकी से जांच करने पर पुलिस को एक संदिग्ध व्यक्ति की मूवमेंट दिखाई दी।

सीसीटीवी फुटेज और तकनीकी सुरागों के आधार पर पुलिस की जांच गांव के ही रहने वाले पवन उर्फ मोनी तक पहुंची। पुलिस ने तुरंत दबिश देकर पवन को हिरासत में लिया। जब पुलिस ने उससे कड़ाई से पूछताछ की, तो उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया।

पुलिस ने मामले की जांच तेजी से पूरी की और पुख्ता सबूतों के साथ निचली अदालत (सेशन कोर्ट) में चार्जशीट दाखिल की। अदालत में गवाहों के बयान दर्ज कराए गए और वैज्ञानिक साक्ष्यों को मजबूती से पेश किया गया।

मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालत ने इसे 'रेअरेस्ट ऑफ द रेयर' (दुर्लभ से दुर्लभतम) श्रेणी का अपराध माना था। अदालत ने आरोपी पवन उर्फ मोनी को दोषी करार देते हुए फांसी (मृत्युदंड) की सजा सुनाई थी।

निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ दोषी पवन ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट में फांसी की पुष्टि और दोषी की अपील पर लंबी सुनवाई हुई, जहां बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली।

हाईकोर्ट ने सभी पहलुओं, मेडिकल रिपोर्टों और कानूनी मिसालों का अध्ययन करने के बाद माना कि दोषी को समाज से लंबे समय तक दूर रखना जरूरी है। इसके बाद अदालत ने फांसी की सजा को 50 साल की बिना किसी छूट वाली सख्त उम्रकैद में बदल दिया।

पीड़ित बच्ची का परिवार बेहद गरीब और साधारण पृष्ठभूमि से आता है। उसके पिता सब्जी बेचकर परिवार का गुजर-बसर करते हैं। परिवार में इस मासूम के अलावा दो छोटी बहनें और एक छोटा भाई है, जो अपनी बड़ी बहन की याद में आज भी गमगीन हैं।

बच्ची के अचानक इस तरह चले जाने से पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। पिता का कहना है कि उनकी बेटी की मासूमियत और उसकी आवाज आज भी उनके कानों में गूंजती है, और अदालत के इस फैसले से उन्हें कानून पर भरोसा कायम रहने की उम्मीद मिली है।

यह मामला केवल कैथल ही नहीं बल्कि पूरे हरियाणा में बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा मुद्दा बन गया था। घटना के बाद राज्यभर में कैंडल मार्च निकाले गए थे और बच्चों के खिलाफ अपराधों पर सख्त कानून लागू करने की मांग उठी थी।

हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल पीड़ित परिवार को राहत देने वाला है, बल्कि समाज के लिए भी एक कड़ा संदेश है। अदालत ने साफ कर दिया है कि मासूमों के खिलाफ हैवानियत करने वालों को कानून की नजर में कोई ढील नहीं दी जाएगी।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि फांसी की सजा को 50 साल की निश्चित कैद में बदलना एक नया न्यायिक ट्रेंड दर्शाता है। इससे दोषी को पूरी जिंदगी जेल में अपनी गलतियों का पछतावा करना पड़ता है और समय से पहले रिहाई का रास्ता भी बंद हो जाता है।

स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने भी इस मामले में त्वरित कार्रवाई कर मिसाल कायम की थी। 26 घंटे के भीतर केस को क्रैक करना और सीसीटीवी के जरिए आरोपी तक पहुंचना पुलिस की सजगता को दर्शाता है, जिसकी तारीफ अदालत में भी हुई।

फिलहाल कैथल के इस गांव में शांति है, लेकिन 8 अक्तूबर 2022 की उस काली रात का खौफ आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। ग्रामीण उम्मीद जता रहे हैं कि दोषी को अब जीवनभर सलाखों के पीछे ही रहना पड़ेगा और मासूम आत्मा को शांति मिलेगी।

Share:

Comments

Leave a comment