पगार के लिए धरना व्यवस्था के माथे पर कलंक
कलायत /22 जून 2026 /अटल हिन्द /तरसेम सिंह
कलायत के पार्कों की देखरेख करने वाले कर्मियों का अपनी पगार के लिए धरने पर बैठना अत्यंत वेदनादायक ही नहीं बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का शर्मनाक उदाहरण है। जिन हाथों ने सार्वजनिक स्थलों को साफ सुथरा और सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी निभाई उन्हीं हाथों को अपनी दो जून की रोटी के लिए आवाज उठानी पड़े तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं अपितु मानवीय मूल्यों पर गहरा आघात है।
इन अकिंचन कर्मियों का कसूर आखिर क्या है? केवल इतना कि वे सरकार के नियमित मुलाजिम नहीं हैं? क्या मेहनतकश व्यक्ति का श्रम इसलिए छोटा हो जाता है कि वह ठेकेदारी व्यवस्था के माध्यम से काम कर रहा है? पसीना उसका भी बहता है। परिवार उसका भी है। रसोई उसके घर में भी जलती है। बच्चों की जरूरतें उसके सामने भी खड़ी रहती हैं।
हैरानी इस बात की है कि जिन अधिकारियों और जिम्मेदार तंत्र को वॉचटावर की तरह यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि कहीं कोई गड़बड़ी, अनियमितता या शोषण न हो वही तंत्र मूकदर्शक बना रहा। यदि कर्मियों को समय पर पगार नहीं मिली तो यह पूछा जाना चाहिए कि भुगतान रोका किसने, देरी क्यों हुई और निगरानी करने वाले जिम्मेदार लोग कहां थे?
यह प्रश्न भी गंभीर है कि क्या इस प्रकार की लापरवाही हरियाणा सरकार की छवि को धूमिल करने वाले किसी सुनियोजित षड्यंत्र की कड़ी तो नहीं? जब सरकार जनहित और सुशासन की बात करती है तब धरातल पर ऐसी घटनाएं सरकार की मंशा पर नहीं बल्कि स्थानीय व्यवस्था की नीयत और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच नितांत आवश्यक है। जिन लोगों की लापरवाही, उदासीनता या मिलीभगत से इन कर्मियों को अपनी पगार के लिए धरने पर बैठना पड़ा।
उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। यह कार्रवाई केवल दंड नहीं बल्कि भविष्य के लिए नजीर बने। ताकि मेहनतकश कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों की अनदेखी करने वाला कोई भी नेटवर्क फिर सिर उठाने का साहस न कर सके।
मेहनत की पगार भीख नहीं होती अधिकार होती है। अधिकार के लिए मजदूर को धरने पर बैठना पड़े तो दोष मजदूर का नहीं व्यवस्था का होता है।


