कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में लोक साहित्य एवं संस्कृति विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न, विद्वानों ने दिए विचार

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग और साहित्य अकादमी, संस्कृति मंत्रालय, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में लोक साहित्य एवं संस्कृति के विविध आयाम विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने सीनेट हॉल में की। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलित करके की गई।
लोक साहित्य और संस्कृति समाज की पहचान
कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि लोक साहित्य और संस्कृति किसी भी समाज की पहचान, स्मृति और जीवन-मूल्यों का जीवंत प्रतिबिंब हैं। वर्तमान समय में लोक साहित्य एवं संस्कृति के डाक्यूमेंटेशन की बहुत ज्यादा जरूरत है। लोक-साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका बहुत बड़ा हिस्सा कभी लिखा ही नहीं गया है। यह श्रुति और मौखिक परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लगातार पहुंचता रहा है। इसी मौखिक परंपरा की शक्ति के कारण हमारी संस्कृति हजारों वर्षों से लगातार आगे बढ़ती रही है। लोक साहित्य का मतलब केवल गांव नहीं बल्कि उस जनमानस के अनुभव, उसकी संवेदनाएँ, उसके जीवन के अनुभव और अभिव्यक्तियाँ इन सबका सामूहिक स्वरूप ही लोक-साहित्य और लोक-संस्कृति है। मनुष्य का शरीर विज्ञान, इंजीनियरिंग और प्रबंधन से विकसित हो सकता है, लेकिन उस शरीर के भीतर जो आत्मा है, उसे साहित्य और संस्कृति ही जीवंत बनाते हैं।
सांस्कृतिक स्मृति और एनईपी 2020
हमने अपनी दादी-नानी, माता-पिता और बुजुर्गों से जो लोक कथाएँ सुनीं, जो गीत सुने, जो कहावतें और पहेलियाँ सुनीं, वे हमारी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन गई हैं। कहीं न कहीं हमारी नई पीढ़ी अपनी लोक-संस्कृति को भूलती जा रही है। इसलिए हमें अपनी लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए कार्य करना होगा। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय द्वारा धरोहर हरियाणा संग्रहालय एवं राज्य स्तरीय रत्नावली के माध्यम से हरियाणा की प्रसिद्ध लोक कला एवं संस्कृति का संरक्षण किया जा रहा है। हमारी लोक-संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं है बल्कि वह हमारे वर्तमान की पहचान और भविष्य की नींव भी है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ने एनईपी 2020 को पूरे देश में सर्वप्रथम सभी कोर प्रावधानों के साथ केयू कैम्पस सहित सभी संबंधित महाविद्यालयों में भी लागू किया है। भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा से जोड़ने के लिए बीए विद भगवद्गीता, पीजी डिप्लोमा इन भगवद्गीता तथा एमए इन हिन्दू स्टडीज नए प्रोग्राम्स शुरू किए गए हैं। गणित, कंप्यूटर साइंस, होम साइंस, बॉटनी सहित अन्य क्षेत्रों में भी भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित सामग्री विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।
सामूहिक चेतना का दर्पण
हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. महासिंह पूनिया ने कहा कि लोक साहित्य समाज की सामूहिक चेतना का दर्पण है। इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य लोक साहित्य और संस्कृति के विविध पक्षों पर गंभीर अकादमिक विमर्श को बढ़ावा देना है। विभिन्न देशों से मिले शुभकामना संदेश इस आयोजन की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाते हैं। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के अध्यक्ष माधव कौशिक ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत करते हुए कहा कि लोक साहित्य मानवीय मूल्यों का आधार है। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के सूत्रपात में लोकगायक, लोक साहित्यकार एवं नाट्यकारों का बहुत विशिष्ट योगदान रहा है। हमारे लोक गायकों और कलाकारों ने हमारी मौखिक परंपरा से जुड़कर साहित्य को पढ़ा नहीं, बल्कि उसे आत्मसात कर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे पहुंचाया है।
विदेशों में हिंदी का प्रचार और शोध केंद्र
माधव कौशिक ने कहा कि हमारे गाँवों में ऐसे लोग रहे हैं, जो शिवपुराण की पुस्तक शायद कभी नहीं देख पाए, लेकिन पूरा शिवपुराण अपनी वाणी और स्मृति से सुना सकते थे। उन्होंने विदेशों में रहने वाले हिन्दी विद्वतजनों से लोक साहित्य को अन्य भाषाओं में भी अनुवाद करने का आह्वान किया। हरियाणा केवल एक भौगोलिक प्रदेश नहीं है, बल्कि यह लोक-स्मृतियों, लोकगीतों, लोककथाओं, वीरगाथाओं और जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं की धरती है। साहित्य अकादमी तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों का दायित्व है कि इस विरासत को केवल अपने तक सीमित न रखें, बल्कि भारत और विश्व की भाषाओं तक पहुँचाएँ। उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में स्थापित होने वाले लोक साहित्य एवं संस्कृति शोध केन्द्र को 200 पुस्तकें भेंट करने की घोषणा की। साथ ही उन्होंने प्रो. लाल चन्द गुप्त मंगल के साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से सहयोग करने के लिए आभार भी व्यक्त किया।
नए दृष्टिकोण की आवश्यकता
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व अधिष्ठाता भाषा एवं कला संकाय प्रो. लाल चन्द गुप्त मंगल ने बतौर बीज वक्तव्य कहा कि लोक-साहित्य पर पुनरावृत्ति नहीं अपितु नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है। हरियाणा के लोक-साहित्य पर पर्याप्त शोध हो चुका है जिसमें प्रतिष्ठित विद्वानों एवं शोधार्थियों ने बहुत काम किया है। यदि हम बार-बार उसी सामग्री को दोहराते रहेंगे, तो यह केवल पिष्टपेषण होगा। लोक-साहित्य वह है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोक-परंपरा के माध्यम से हमारे पास आया है। उसके रचनाकार का पता नहीं है लेकिन फिर भी समाज ने उन्हें सहर्ष स्वीकार किया है। यही लोक-साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति है। लोक-साहित्य शाश्वत एवं सामूहिक है तथा वह किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज का साहित्य है।
दस्तावेजीकरण और भविष्य की योजनाएं
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. वीरेन्द्र पाल ने कहा कि लोक साहित्य किसी भी समाज की सांस्कृतिक स्मृति और सामूहिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार है। बदलते समय और जीवनशैली के कारण लोक परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त हो रही हैं। ऐसे में लोक साहित्य का व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकरण करना आवश्यक है, ताकि लोक कथाओं, लोकगीतों, लोक गाथाओं और लोक परंपराओं को प्रमाणिक रूप में संरक्षित कर भावी पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सके। साहित्य एवं संस्कृति मंत्रालय, नई दिल्ली के प्रो. अनुपम तिवारी ने कहा कि लोक साहित्य भारतीय समाज के नैतिक आधार को मजबूत करती है। साहित्य अकादमी की ओर से यह पहला कार्यक्रम कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित किया जा रहा है। पूर्ण चंद शर्मा ने कहा कि लोक साहित्य हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का पारंपरिक खजाना है। इसमें आम जनजीवन, सामाजिक मूल्यों, रीति-रिवाजों, मान्यताओं और परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। लोक साहित्य को केवल साहित्यिक दृष्टि से नहीं, बल्कि समाज की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के रूप में भी संरक्षित करने की आवश्यकता है। संतराम देशवाल ने कहा कि लोक साहित्य की फुटकर विधाओं का भी व्यापक स्तर पर संकलन किया जाना चाहिए। लोक साहित्य की अनेक छोटी-छोटी विधाएं और मौखिक परंपराएं अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद हैं।