कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय को मिला एक और भारतीय पेटेंट, हिंदी विभाग की राष्ट्रीय संगोष्ठी में हुए 109 शोध पत्र प्राप्त

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय को मिला एक और भारतीय पेटेंट, हिंदी विभाग की राष्ट्रीय संगोष्ठी में हुए 109 शोध पत्र प्राप्त

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के नाम एक और भारतीय पेटेंट दर्ज हुआ है। इस उपलब्धि से विश्वविद्यालय के शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में निरंतर बढ़ते योगदान को नई पहचान मिली है। कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए पेटेंटधारकों डॉ. सुमन महेंदिया, रितु जांगड़ा, पूनम महेंदिया एवं स्वर्गीय प्रो. श्याम कुमार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।

शोध का लक्ष्य समाजोपयोगी तकनीक और सामाजिक मूल्य का सृजन

कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि शोध का लक्ष्य समाजोपयोगी तकनीक और सामाजिक मूल्य का सृजन होना चाहिए। यह उपलब्धि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की शोध उत्कृष्टता, नवाचार क्षमता और वैज्ञानिक सोच का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में शोध को केवल शोध-पत्रों और पेटेंट प्राप्त करने तक सीमित न रखते हुए उसके परिणामों को समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ना आवश्यक है। शोध का प्रभावी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और उसके समाजोपयोगी अनुप्रयोगों में उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि विश्वविद्यालय में होने वाला शोध व्यापक स्तर पर वास्तविक और ठोस सामाजिक मूल्य का सृजन कर सके।

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प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि वर्तमान समय में उच्च शिक्षण संस्थानों की भूमिका केवल ज्ञान के सृजन तक सीमित नहीं है, बल्कि शोध के माध्यम से नई तकनीकों, नवाचारों और व्यावहारिक समाधानों का विकास करना भी आवश्यक है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय अपने शोधकर्ताओं को ऐसे नवोन्मेषी एवं प्रभावशाली शोध के लिए निरंतर प्रोत्साहित कर रहा है। कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने डीन, रिसर्च एवं डेवलेपमेंट प्रो. संजीव अग्रवाल को विश्वविद्यालय में शोध एवं नवाचार के लिए सशक्त एवं अनुकूल वातावरण विकसित करने में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए विशेष रूप से बधाई दी। उन्होंने प्रो. संजीव अग्रवाल को वरिष्ठ प्रोफेसर के पद पर पदोन्नति के लिए भी शुभकामनाएं प्रेषित कीं।

लोक साहित्य एवं संस्कृति के विविध आयामों पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में हिंदी विभाग एवं साहित्य अकादमी, संस्कृति मंत्रालय, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में लोक साहित्य एवं संस्कृति के विविध आयाम विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन मंगलवार को किया गया। संगोष्ठी में विभिन्न राज्यों से 109 शोध-पत्र प्राप्त हुए। संगोष्ठी के दौरान लोक साहित्य, संस्कृति, लोक कलाओं, परंपराओं तथा बदलते सामाजिक परिवेश में इनके संरक्षण और संवर्धन को लेकर व्यापक विमर्श हुआ।

संगोष्ठी के प्रथम सत्र में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के अध्यक्ष माधव कौशिक, केयू के पूर्व भाषा एवं कला संकाय अधिष्ठाता प्रो. लाल चंद गुप्त मंगल तथा साहित्य एवं संस्कृति मंत्रालय, नई दिल्ली के प्रो. अनुपम तिवारी ने अपने विचार एवं व्याख्यान प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने लोक साहित्य को समाज की सांस्कृतिक स्मृति और जीवन-मूल्यों का महत्वपूर्ण आधार बताया। द्वितीय सत्र में विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. वीरेन्द्र पाल, हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. महासिंह पूनिया, पूर्व प्रोफेसर भीम सिंह, पूर्ण चंद शर्मा, डॉ. राजकला देसवाल तथा डॉ. संतराम देसवाल ने व्याख्यान दिए।

संगोष्ठी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शुभकामनाएं प्राप्त हुईं। विभिन्न देशों से मिले इन संदेशों ने संगोष्ठी के अंतरराष्ट्रीय महत्व को रेखांकित किया। विभाग के अध्यक्ष प्रो. महासिंह पूनिया ने बताया कि संगोष्ठी ने लोक साहित्य एवं संस्कृति के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और वैश्विक स्तर पर इसके प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण अकादमिक मंच प्रदान किया।

राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान तीन पुस्तकों का हुआ विमोचन

प्रो. महासिंह पूनिया ने बताया कि राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान तीन कविता-संग्रहों पुस्तकों का विमोचन कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने किया। इसमें डॉ. राजकला देशवाल का कविता-संग्रह मन तरंगों की नाव में, डॉ. संतराम देशवाल का कविता-संग्रह प्रेम न हाट बिकाय तथा हरिओम फुलिया की पुस्तक लोक साहित्य में साहित्यकारों का योगदान शामिल है।

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