कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में विभाजन विभीषिका, एंटी-रैगिंग और राष्ट्रीय सुदूर संवेदी दिवस पर विशेष कार्यक्रम आयोजित

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में हाल ही में कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस, एंटी-रैगिंग एवं यौन उत्पीड़न विषय पर कार्यशाला और राष्ट्रीय सुदूर संवेदी दिवस पर विशेष व्याख्यान शामिल रहे। इन आयोजनों का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को इतिहास, कानून और आधुनिक तकनीक से जोड़ना था।
विभाजन विभीषिका दिवस देता है एकता और सुदृढ़ राष्ट्र का संदेशः प्रो. वीरेन्द्र पाल
भारत विभाजन केवल जमीन का बंटवारा नहीं था, बल्कि यह लाखों लोगों के जीवन, रिश्तों और अस्मिता की त्रासदी थी। विशेष रूप से महिलाओं ने अपहरण, हिंसा, बलात्कार और विस्थापन की भयावह पीड़ा झेली। विभाजन के दौरान भूख, प्यास, हिंसा और विस्थापन ने लोगों की मानसिक स्थिति तक को प्रभावित किया। अनेक परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया और अपना घर-बार छोड़कर नए स्थानों पर जीवन शुरू किया। विभाजन की स्मृतियां हमें यह सिखाती हैं कि नफरत और हिंसा का सबसे बड़ा नुकसान आम इंसान को होता है। इसलिए हमें इतिहास से सीख लेकर शांति, सद्भाव और भाईचारे को मजबूत करने का संकल्प लेना चाहिए। यह उद्गार कुलसचिव प्रो. वीरेन्द्र पाल ने छात्र कल्याण अधिष्ठाता कार्यालय की ओर से कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर गुरुवार को सीनेट हॉल में ‘विभाजन विभीषिका’ विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान में बतौर मुख्य वक्ता व्यक्त किए। इससे पहले छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. एआर चौधरी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया।
कुलसचिव प्रो. वीरेन्द्र पाल ने कहा कि विभाजन की स्मृतियां हमें आपसी भाईचारे, शांति और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने की प्रेरणा देती हैं। युवा पीढ़ी को इतिहास से सीख लेकर देश की एकता और अखंडता को सुदृढ़ करने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि विभाजन की हिंसा में हत्या, लूट, आगजनी, अपहरण, महिलाओं पर अत्याचार और बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ। मंटो, अमृता प्रीतम, भीष्म साहनी और इंतज़ार हुसैन जैसे साहित्यकारों ने इस पीड़ा को अपनी रचनाओं में दर्ज किया। विभाजन का इतिहास हमें नफरत नहीं, बल्कि जागरूकता, मानवीय संवेदना और सामाजिक एकता की सीख देता है। राष्ट्र को मजबूत बनाने के लिए प्रत्येक नागरिक को मानसिक, शारीरिक और संगठनात्मक रूप से सुदृढ़ होना आवश्यक है।
छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. एआर चौधरी ने कहा कि विभाजन विभीषिका दिवस हमें 1947 की त्रासदी को स्मरण कराने के साथ-साथ इतिहास से सीख लेने का अवसर देता है। राष्ट्र को मजबूत बनाने के लिए प्रत्येक नागरिक को मानसिक, शारीरिक और संगठनात्मक रूप से सुदृढ़ होना आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे एक-दूसरे के सहयोग के लिए संगठित रहें और अपनी संस्कृति, इतिहास एवं विरासत के प्रति आत्मविश्वास रखें। प्रो. चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विभाजन विभीषिका दिवस के पुनः स्मरण की पहल का उद्देश्य भी नई पीढ़ी को इतिहास से परिचित कराते हुए राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सशक्त भारत के निर्माण के लिए प्रेरित करना है। डॉ. अम्बेडकर अध्ययन संस्थान के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने अपनी कविता के माध्यम से कहा कि विभाजन की पीड़ा, खोए हुए भारत और राष्ट्रीय एकता के संकल्प के रूप में देखने का संदेश देता है।
कुटा प्रधान डॉ. जितेन्द्र खटकड़ ने कहा कि विभाजन की त्रासदी ने लाखों लोगों से उनके परिवार, घर, जमीन, रोजगार और पुश्तैनी पहचान छीन ली। उस दौर में ट्रेनें भी पीड़ा और भय का प्रतीक बन गई थीं। इस त्रासदी को महसूस करने वालों की वेदना की कल्पना करना भी कठिन है। उन्होंने कहा कि हमें अपने इतिहास को कभी नहीं भूलना चाहिए और विभाजन की पीड़ा से सीख लेते हुए राष्ट्र की एकता, अखंडता, शांति, सौहार्द और भाईचारे को मजबूत करने का संकल्प लेना चाहिए। कुंटिया प्रधान राजवंत कौर ने कहा कि विभाजन और स्वतंत्रता के इतिहास को याद रखना, सैनिकों के बलिदान का सम्मान करना और अपने-अपने कार्य को ईमानदारी से करना ही सच्ची देशभक्ति है। मंच का संचालन डॉ. निधि माथुर ने किया। इस अवसर पर प्रो. आरके मोदगिल, प्राचार्या प्रो. रीटा, प्रो. कुसुमलता, डॉ. प्रीतम सिंह, प्रो. परमेश कुमार, कुटा प्रधान डॉ. जितेन्द्र खटकड़, डॉ. विकास पोपली, डॉ. हरविंदर लोंगोवाल, उपासना सहित शिक्षक व विद्यार्थी मौजूद थे।
कानून के साथ गरिमा, समानता और स्वायत्तता की समझ जरूरीः प्रो. अमित लुदरी
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर सोमनाथ सचदेवा के कुशल मार्गदर्शन में विधि संस्थान द्वारा गुरुवार को संस्थान के मूट कोर्ट रूम में “एंटी-रैगिंग एवं यौन उत्पीड़न” विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य विद्यार्थियों को रैगिंग एवं यौन उत्पीड़न से जुड़े कानूनी, संस्थागत एवं सामाजिक पहलुओं के प्रति जागरूक करना तथा विश्वविद्यालय परिसर में सुरक्षित, सम्मानजनक एवं समावेशी शैक्षणिक वातावरण को बढ़ावा देना था। विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए विधि संस्थान के निदेशक प्रो. अमित लुदरी ने एंटी-रैगिंग एवं यौन उत्पीड़न से संबंधित कानूनों एवं विनियमों के निरंतर विस्तृत होते दायरे से परिचित होने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि भावी विधि-व्यवसायियों के लिए केवल कानून का सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें दैनिक जीवन में गरिमा, समानता एवं व्यक्तिगत स्वायत्तता की रक्षा में कानून की भूमिका को भी समझना चाहिए। एसोसिएट प्रोफेसर डॉ संत लाल निर्वाण ने विद्यार्थियों को रैगिंग के अर्थ, प्रकृति एवं व्यापक दायरे से अवगत कराया। उन्होंने उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग की रोकथाम एवं निषेध से संबंधित यूजीसी विनियमों तथा शिकायतों के निवारण के लिए उपलब्ध संस्थागत व्यवस्थाओं की जानकारी दी। यौन उत्पीड़न के विषय पर एसोसिएट प्रोफेसर डॉ कृष्णा अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि भारत में यौन उत्पीड़न से संबंधित कुछ विशिष्ट वैधानिक प्रावधान भले ही लैंगिक रूप से विशिष्ट हों, लेकिन व्यापक भारतीय विधिक व्यवस्था में विभिन्न लिंगों के व्यक्तियों के अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में कानूनी उपचार एवं संरक्षण के प्रावधान उपलब्ध हैं। कार्यशाला की मंचीय कार्यवाही का संचालन असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. जतिन कालोन ने किया।
उपग्रह आधारित सुदूर संवेदी तकनीक से संसाधन प्रबंधन में बदलावः प्रो. बीएस चौधरी
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में भूभौतिकी विभाग द्वारा राष्ट्रीय सुदूर संवेदी दिवस उत्साह एवं अकादमिक वातावरण में मनाया गया। कार्यक्रम में विभाग के सभी शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस अवसर पर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के दूरदर्शी वास्तुकार को याद किया गया।