लाड़ली बहना योजना में 3000 रुपये देने के वादे पर क्या है हकीकत और वित्तीय गणित

लाड़ली बहना योजना में 3000 रुपये देने के वादे पर क्या है हकीकत और वित्तीय गणित

लाड़ली बहना को 3000 रुपये देने का वादा हकीकत या हवा हवाई?

पवन वर्मा-विनायक फीचर्स

       

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          मध्य प्रदेश में 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में महिलाओं से वादा किया गया था कि भाजपा की सरकार बनी तो उन्हें तीन हजार रुपए  महीने तक लाड़ली बहना योजना के तहत देगी। इस वादे पर मध्य प्रदेश में भाजपा ने जबरदस्त सफलता पाई और फिर से सरकार बनाई। हालांकि यह वादा पांच साल में पूरा करना है, लेकिन हाल ही में यहां के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक ने पांच साल के लिए जो राशि इस योजना के लिए मंजूर की है, उससे भाजपा का महिलाओं को तीन हजार रुपए महीने देने का दावा और वादा लक्ष्य से मेल नहीं खाता है। यानि फिलहाल जो लक्ष्य कैबिनेट बैठक में सामने आया है उससे तीन हजार रुपए दिए जाने का वादा और दावा दोनों ही कमजोर होते दिखाई देते हैं।

                 मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना योजना को 2031 तक जारी रखने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की कैबिनेट ने हाल ही में 1,14,365 करोड़ रुपये की मंजूरी पांच साल के लिए दी है। कैबिनेट से मिली मंजूरी को मौजूदा 1.25 करोड़ लाभार्थी महिलाओं को 2031 तक 60 महीने की अवधि के हिसाब से देखें तो यह राशि करीब 1525  रुपये प्रति महिला प्रति माह बैठती है। यानी कैबिनेट से मिली 1,14,365 करोड़ रुपये की मंजूरी भाजपा के 3000 रुपये महीने के वादे का वित्तीय गणित पूरा नहीं करती।

                   यहां मंजूरी और बजट प्रावधान के फर्क को समझना भी जरूरी है। कैबिनेट ने 1,14,365 करोड़ रुपये की राशि को योजना को पांच साल आगे जारी रखने के लिए मंजूरी दी है। इसका यह अर्थ नहीं है कि सरकार ने अगले पांच वर्षों के बजट में इतनी पूरी राशि का प्रावधान कर दिया है या मासिक भुगतान के लिए अंतिम वित्तीय व्यवस्था तय हो गई है। आने वाले बजटों में सरकार अतिरिक्त राशि का प्रावधान कर सकती है।

            लाड़ली बहना योजना की शुरूआत तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जून 2023 में 1000 रुपये प्रतिमाह  से की थी। विधानसभा चुनाव से पहले इस राशि को बढ़ाकर 1250 रुपये किया गया। चुनाव के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार ने योजना जारी रखी और 1250 रुपए महीने से इसे जारी रखा, पिछले साल नवंबर में  मासिक राशि को 1500 रुपये किया। यानी उनके करीब दो साल आठ महीने के कार्यकाल में नियमित मासिक राशि में 250 रुपये की बढ़ोतरी हुई है।

           अब भाजपा के  अपने संकल्प पत्र  की बात करें तो 2023 के विधानसभा चुनाव के लिए जारी संकल्प पत्र में लाड़ली बहनों को मिलने वाली सहायता राशि को धीरे-धीरे बढ़ाकर 3000 रुपये महीना करने का वादा किया गया था। सरकार के पास 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले इस वादे को पूरा करने का समय है। मौजूदा 1500 रुपये से 3000 रुपये तक पहुंचने के लिए राशि में 1500 रुपये की और बढ़ोतरी करनी होगी।

19 अगस्त की कैबिनेट मंजूरी इसी वजह से महत्वपूर्ण  है। सरकार ने योजना को 2031 तक जारी रखने के लिए 1,14,365 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। अगर इस राशि को मौजूदा 1.25 करोड़ महिलाओं को पांच साल यानि 60 महीने में समान रूप से बांटकर देखा जाए तो प्रति महिला करीब 91,492 रुपये की कुल राशि आती है। इसे 60 महीनों में बांटने पर प्रति महिला औसतन करीब 1525 रुपये महीना बैठता है। दूसरी ओर 3000 रुपये महीना देने का हिसाब बिल्कुल अलग है। 1.25 करोड़ महिलाओं को 3000 रुपये हर महीने देने पर एक महीने में करीब 3750 करोड़ रुपये और साल में करीब 45 हजार करोड़ रुपये की जरूरत होगी। इसके मुकाबले कैबिनेट ने 1,14,365 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है।

                यही अंतर भाजपा के संकल्प पत्र के वादे और 19 अगस्त की कैबिनेट मंजूरी के बीच सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है। कैबिनेट से मिली राशि को 1.25 करोड़ महिलाओं और 60 महीने के आधार पर देखें तो यह 3000 रुपये महीने के लक्ष्य के आसपास भी नहीं पहुंचती। उसका औसत 1525 रुपये महीना है, जबकि संकल्प पत्र का लक्ष्य 3000 रुपये है। हालांकि यहां पर यह बात भी है कि अभी 1.25 करोड महिलाएं इस योजना का लाभ ले रही हैं। नए रजिस्ट्रेशन नहीं होने के कारण इन महिलाओं की संख्या भी धीरे-धीरे कम होगी, लेकिन ऐसा माना जाता है कि 2028 के विधानसभा चुनाव तक यह संख्या 1 करोड़ से कम नहीं रहेगी।

दूसरी स्थिति  यह भी है  कैबिनेट की मंजूरी अंतिम बजट प्रावधान नहीं होता है। सरकार आने वाले वित्तीय वर्षों में बजट के माध्यम से अतिरिक्त राशि का प्रावधान कर सकती है। लाभार्थियों की संख्या में बदलाव भी हो सकता है। भुगतान की दर भी चरणबद्ध तरीके से बढ़ाई जा सकती है। लिहाजा 1,14,365 करोड़ रुपये की मंजूरी को 3000 रुपये के वादे की अंतिम वित्तीय सीमा नहीं कहा जा सकता।

              एक अन्य तथ्य यह भी है कि राजनीति में सवाल सिर्फ वादे का नहीं, उसके लिए दिखाई देने वाली वित्तीय तैयारी का भी होता है। भाजपा ने 2023 में 3000 रुपये महीना देने का संकल्प लिया था। अब 2028 का चुनाव सामने आने में सवा दो साल का समय बचा है। ऐसे में 19 अगस्त को पांच साल के लिए योजना जारी रखने की मंजूरी देते समय सामने आया 1,14,365 करोड़ रुपये का आंकड़ा यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि 3000 रुपये तक पहुंचने के लिए सरकार को आने वाले बजटों में कितनी अतिरिक्त राशि जुटानी होगी।

                  शिवराज सिंह चौहान के समय 1000 रुपये से शुरू हुई योजना चुनाव से पहले 1250 रुपये तक पहुंची। मोहन यादव सरकार में अब यह 1500 रुपये है। अगले चरण में लक्ष्य 3000 रुपये का है। यानी अभी तक की बढ़ोतरी 500 रुपये है, जबकि वादे को पूरा करने के लिए 1500 रुपये और बढ़ाने होंगे। 19 अगस्त की कैबिनेट बैठक में सरकार ने योजना को 2031 तक चलाने की मंजूरी दे दी है, लेकिन मंजूर 1,14,365 करोड़ रुपये का गणित मौजूदा लाभार्थियों और अवधि के आधार पर  3000 रुपये महीने के लक्ष्य तक नहीं पहुंचता। अब नजर आने वाले बजटों पर होगी कि क्या सरकार इस अंतर को अतिरिक्त बजटीय प्रावधानों से भरेगी और 2028 से पहले लाड़ली बहना की राशि 3000 रुपये तक पहुंचाएगी? यही भाजपा के संकल्प पत्र के सबसे बड़े वादों में से एक की अगली परीक्षा होगी। (विनायक फीचर्स)

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