प्रेम पर पहरा नहीं और छल पर शिकंजा, महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 बना असली इम्तिहान

प्रेम पर पहरा नहीं और छल पर शिकंजा, महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 बना असली इम्तिहान

प्रेम पर पहरा नहीं, छल पर शिकंजा — महाराष्ट्र कानून का असली इम्तिहान

महाराष्ट्र मॉडल — सुरक्षा की मिसाल बनेगा या स्वतंत्रता की चुनौती?

इरादों की पड़ताल हो, इंसानों की नहीं — यहीं से न्याय की शुरुआत है

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किसी समाज की असली परीक्षा तब होती है, जब प्रेम, आस्था और कानून आमने-सामने हों। महाराष्ट्र में धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 को 28 अगस्त 2026 से लागू करने की तैयारी/अधिसूचना ने यही सवाल सामने ला दिया है। अंतरधार्मिक विवाह, कथित ‘लव जिहाद’ और सामूहिक धर्मांतरण पर बहस अब महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं रही; यह धार्मिक स्वतंत्रता, विवाह की पसंद, महिलाओं की सुरक्षा और राज्य की जिम्मेदारी के बीच संतुलन का प्रश्न बन गई है। कानून का घोषित उद्देश्य जबरन, धोखे, दबाव या प्रलोभन से होने वाले धर्म परिवर्तन को रोकना है। लेकिन कानून की मंशा जितनी महत्वपूर्ण है, उसका इस्तेमाल उससे कहीं अधिक। इसलिए इस व्यवस्था को भावनाओं से नहीं, अधिकारों और तथ्यों की कसौटी पर परखना होगा।

प्रस्तावित महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 के तहत स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को जिलाधिकारी को 60 दिन पहले सूचना देनी होगी। नोटिस सार्वजनिक होगी और आपत्ति या जांच हो सकती है। इससे पारदर्शिता और स्वतंत्र इच्छा से धर्म परिवर्तन सुनिश्चित होगा। अंतरधार्मिक विवाह में यदि साबित हो कि विवाह का एकमात्र उद्देश्य अवैध धर्म परिवर्तन था और उसमें दबाव, धोखा या लालच था, तो अदालत विवाह अवैध घोषित कर सकती है। ऐसी स्थिति में संतान को मां का विवाह-पूर्व धर्म देने का प्रावधान है। उद्देश्य कमजोर, खासकर महिलाओं, की सुरक्षा है। लेकिन सवाल है कि पारदर्शिता कहीं निजी निर्णय को सार्वजनिक जांच और सामाजिक दबाव में तो नहीं बदल देगी?

दरअसल, ‘लव जिहाद’ का विवाद यहीं कठिन हो जाता है। विवाह के बहाने धोखे से धर्म परिवर्तन के आरोप लंबे समय से सामने आते रहे हैं। यदि किसी संबंध में छल, दबाव या सुनियोजित धर्म परिवर्तन का प्रयास हो, तो कानून का हस्तक्षेप उचित है। इसी आधार पर सामूहिक धर्मांतरण पर कठोर प्रावधान हैं—सात वर्ष तक की सजा और पांच लाख रुपये तक जुर्माना; सामान्य मामलों में जुर्माना एक लाख रुपये तक, जबकि बार-बार दोषी होने पर सजा दस वर्ष और जुर्माना सात लाख रुपये तक हो सकता है। अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती है, ताकि पुलिस तत्काल कार्रवाई कर सके। लेकिन कठोर कानून न्याय की गारंटी नहीं; पुलिस शक्ति के साथ निष्पक्ष जांच और जवाबदेही भी जरूरी है।

सवाल है—क्या दो बालिगों की सहमति से बने रिश्ते भी राज्य की निगरानी में आएं? आलोचकों का तर्क है कि अपनी इच्छा से विवाह और धर्म परिवर्तन करने वाले वयस्कों के निजी निर्णय में सरकारी दखल सीमित होना चाहिए। निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हवाला देते हुए वे 60 दिन पहले सूचना की अनिवार्यता पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि इससे परिवार, सामाजिक संगठन या अन्य पक्ष हस्तक्षेप कर सकते हैं और स्वैच्छिक विवाह संदेह के घेरे में आ सकता है। विपक्षी दलों ने इसे संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध बताया है। चिंता यही है कि अपराध रोकने वाला कानून कहीं सहमति वाले रिश्तों को भी अपराध की छाया में न डाल दे।

सरकार का कहना है कि कानून स्वेच्छा से धर्म बदलने से नहीं रोकता, बल्कि अनुचित साधनों से धर्म परिवर्तन पर रोक लगाता है। मुख्यमंत्री ने इसे महिलाओं की सुरक्षा का महत्वपूर्ण कदम बताया है। महाराष्ट्र ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात के समान कानूनों के अनुभवों को भी ध्यान में रखा है। सरकार के अनुसार, ऐसे प्रावधानों से कुछ मामलों में कमी आई है। इसलिए महाराष्ट्र मॉडल को केवल राजनीतिक नारा मानकर खारिज करना उचित नहीं। धोखे और दबाव से धर्म परिवर्तन रोकना राज्य का अधिकार है, लेकिन इस्तेमाल प्रमाण के आधार पर होना चाहिए। स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन का सबूत देने का भार धर्मांतरण कराने वाले पक्ष पर है। माता-पिता, भाई-बहन समेत परिजन शिकायत कर सकते हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या महाराष्ट्र दूसरे राज्यों के लिए अनुकरणीय मॉडल बन सकता है। उत्तर कानून की कठोरता में नहीं, उसके निष्पक्ष क्रियान्वयन में है। शिकायत मिलते ही पुलिस यदि अफवाह को तथ्य और आरोप को अपराध मान ले, तो कानून सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है। लेकिन जांच प्रमाण, स्वतंत्र बयान और वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित हो, तो यही कानून कमजोर लोगों को सुरक्षा दे सकता है। विवाह की वैधता जैसे मामलों में अंतिम फैसला अदालत की कसौटी पर होना चाहिए। प्रशासन को न किसी समुदाय का पक्ष लेना है, न धार्मिक पहचान के आधार पर किसी संबंध को संदिग्ध मानना है। कानून की निष्पक्षता ही उसकी सामाजिक स्वीकार्यता की पहली शर्त है।

इतने बड़े विवाद में समाज मूकदर्शक नहीं रह सकता। युवाओं को सहमति, पारदर्शिता और जिम्मेदार संबंधों की समझ देना जरूरी है; परिवारों को भी बालिग संतान की पसंद को केवल प्रतिष्ठा का प्रश्न मानने से बचना होगा। प्रेम या विवाह की आड़ में धोखे, दबाव या प्रलोभन से धर्म परिवर्तन हो, तो उसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता कहकर सही नहीं ठहराया जा सकता। मीडिया की जिम्मेदारी भी अहम है। एक मामले से पूरे धर्म या समुदाय का चरित्र तय करना पत्रकारिता नहीं, पूर्वाग्रह फैलाना है। कानून सामाजिक विवेक का विकल्प नहीं हो सकता। समाज को तय करना होगा कि वह सुरक्षा चाहता है या संदेह की स्थायी संस्कृति।

आखिर में महाराष्ट्र का प्रयोग सुरक्षा और स्वतंत्रता के तराजू पर ही तौला जाएगा। जबरन या छलपूर्वक धर्मांतरण रोकना राज्य की जिम्मेदारी है, लेकिन अपनी इच्छा से धर्म चुनने और दो वयस्कों को सहमति से जीवनसाथी चुनने का अधिकार भी उतना ही जरूरी है। कानून की सफलता गिरफ्तारियों से नहीं, इस बात से मापी जाएगी कि कितने वास्तविक अपराध रुके और कितने निर्दोषों की स्वतंत्रता बची। यदि प्रशासन प्रमाण के साथ चले, अदालतें निष्पक्ष निगरानी रखें और समाज पूर्वाग्रह से ऊपर उठे, तो महाराष्ट्र मॉडल सुरक्षा की मिसाल बन सकता है। लेकिन कानून राजनीति, अफवाह या सामुदायिक अविश्वास का औजार बना, तो सुरक्षा की ढाल ही स्वतंत्रता के लिए चुनौती बन जाएगी।

लेखक -प्रो. आरके जैन “अरिजीत”शिक्षाविद् बड़वानी (मप्र)

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