इलाज के बाद बची बीमारी: अस्पतालों के नीचे दफन होता भविष्य और मेडिकल कचरे का खतरनाक सच

इलाज के बाद बची बीमारी: अस्पतालों के नीचे दफन होता भविष्य
यह लेख प्रो. आरके जैन “अरिजीत” द्वारा लिखा गया है। कूड़े का कोई टुकड़ा सिर्फ कूड़ा नहीं होता, खासकर तब जब वह अस्पताल से निकला हो। उसे जमीन में दबाने से खतरा खत्म नहीं होता; वह मिट्टी और पानी के रास्ते इंसानी जिंदगी तक पहुंच सकता है। मेडिकल कचरे के गलत निपटान पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की सख्ती ने स्वास्थ्य व्यवस्था की अनदेखी को उजागर किया है। सत्रह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की 9,178 स्वास्थ्य सुविधाओं की जांच में केवल 5,715 नियमों के अनुरूप मिलीं। बाकी में भूजल सुरक्षा की अनदेखी, जरूरी अनुमति का अभाव, गलत जगह गड्ढे और जानवरों की पहुंच रोकने में लापरवाही मिली। जिस अस्पताल में बीमारी का इलाज होता है, वहीं संक्रमित कचरे का गलत निपटान इलाज और प्रदूषण की सीमा मिटा देता है। सवाल सिर्फ कचरे का नहीं, मिट्टी, पानी और उन परिवारों की जिंदगी का है, जो इसकी कीमत चुका सकते हैं।
धरती के गर्भ में दबे कचरे और गहरे गड्ढे के नियम
धरती के गर्भ में दबा कचरा आंखों से ओझल हो सकता है, लेकिन उसका असर खत्म नहीं होता। संक्रमित कचरा भूजल तक न पहुंचे, इसलिए गहरे गड्ढे में दफन की प्रक्रिया के नियम बेहद कड़े हैं। जहां साझा जैव-चिकित्सा कचरा उपचार सुविधा नहीं है, वहां दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों में तय शर्तों पर गहरे गड्ढे में दफन की अनुमति दी जाती है। गड्ढे जलस्रोतों और आबादी से सुरक्षित दूरी पर हों, भूजल स्तर गड्ढे के निचले हिस्से से कम से कम छह मीटर नीचे हो, कचरे को मिट्टी और चूने से ढकना तथा जानवरों की पहुंच रोकना बेहद जरूरी है। लेकिन नियमों की असली ताकत उनके सही पालन में होती है। सुविधा के नाम पर की जाने वाली छोटी-सी लापरवाही प्रकृति के लिए वर्षों का बड़ा संकट बन सकती है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच के आंकड़े
जब आंकड़े जमीन पर उतरते हैं, वे सिर्फ संख्या नहीं रहते, बल्कि किसी की जिंदगी का बड़ा खतरा बन जाते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच में 477 सुविधाओं में भूजल सुरक्षा उल्लंघन मिले। 341 के पास जरूरी अनुमति नहीं थी और 316 में स्थल चयन तय मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया। 253 जगहों पर अभिलेख रखने में लापरवाही बरती गई, 229 स्थानों पर जानवरों की पहुंच रोकने की व्यवस्था नहीं थी और 216 जगहों पर कचरे को पर्याप्त मिट्टी से ढकने में कमी मिली। उत्तर प्रदेश की 111 और राजस्थान की 33 स्वास्थ्य सुविधाओं में पूर्ण गैर-अनुपालन दर्ज किया गया। इन आंकड़ों को यदि गांव के नक्शे पर रखा जाए तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। कहीं वह कुआं हो सकता है जहां से परिवार पानी भरता है, तो कहीं वह खेत जहां अगली फसल बोई जानी है।
अस्पताल के बाहर फैलने वाला संक्रमण और सार्वजनिक स्वास्थ्य
खतरा अस्पताल से बाहर निकलते ही खत्म नहीं होता, बल्कि कई बार कचरे के साथ वहीं से शुरू होता है। चिंता केवल नियम टूटने की नहीं, बल्कि नियम टूटने के बावजूद व्यवस्था के लगातार चलते रहने की है। चिकित्सकीय कचरे का खतरा उसकी मात्रा से अधिक उसकी प्रकृति में छिपा होता है। संक्रमित सामग्री, शरीर के अवशेष और रक्त या जैविक द्रव से सनी वस्तुओं का सुरक्षित उपचार होना अनिवार्य है। ऐसे कचरे तक यदि पशु पहुंच जाएं या उनका संपर्क भूजल से हो जाए, तो संक्रमण अस्पताल की चारदीवारी से बाहर फैल सकता है। इसलिए चिकित्सकीय कचरा केवल पर्यावरण मंत्रालय या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक गंभीर प्रश्न है। अस्पताल की असली स्वच्छता शल्य कक्ष में नहीं, बल्कि कचरे के अंतिम पड़ाव पर परखी जाती है।
दुर्गम क्षेत्र और नियमों के पालन की चुनौती
दुर्गम पहाड़ और लंबी दूरियां काम में कठिनाई हो सकती हैं, लेकिन किसी भी हाल में जिम्मेदारी से मुक्ति का कारण नहीं बन सकतीं। पूर्वोत्तर राज्यों, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में दुर्गम भूभाग, कम आबादी और परिवहन की कठिनाइयां साझा उपचार संयंत्रों की पहुंच को सीमित करती हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दस्तावेजों में ऐसे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का उल्लेख है जहां साझा जैव-चिकित्सा कचरा उपचार सुविधाएं पूरी नहीं हैं और दूरस्थ स्वास्थ्य सुविधाएं स्थानीय उपचार पर निर्भर हैं। कुछ क्षेत्रों में साझा उपचार संयंत्र स्थापित करने की प्रक्रिया तेज करने के निर्देश दिए गए हैं। मगर इसका समाधान दूरस्थ क्षेत्रों को नियमों से मुक्त करना नहीं, बल्कि वहां नियमों के पालन की तकनीकी और आर्थिक क्षमता पहुंचाना है।
एनजीटी के निर्देश और अगली सुनवाई
अब सवाल केवल आदेश जारी होने का नहीं, बल्कि आने वाले आठ सप्ताह में जमीन पर बदलाव दिखने का है। एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जैव-चिकित्सा कचरा निपटान के नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने को कहा है। पालन न होने पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम की धारा 5 के तहत कठोर निर्देश दिए जा सकते हैं और इस मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर को तय है। लेकिन अदालत की समयसीमा को केवल नई रिपोर्ट बनाने की अवधि बना देना इस गंभीर संकट के साथ अन्याय होगा। हर उल्लंघनकारी सुविधा की दोबारा जांच हो, जिम्मेदारी तय की जाए, पुराने दफन गड्ढों का लेखाजोखा बने, भूजल की जांच हो और सुधार का स्वतंत्र सत्यापन किया जाए।
निष्कर्ष और भविष्य की जिम्मेदारी
किसी भी समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी सुविधा की कीमत किसे चुकाने देता है। हम ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था कतई नहीं बना सकते जो मरीज को तो बचा ले लेकिन उसके आसपास की मिट्टी और पानी को गंभीर खतरे में डाल दे। राज्यों को नियमित निरीक्षण, प्रशिक्षित कर्मचारी, पारदर्शी अभिलेख और आधुनिक उपचार सुविधाओं का विस्तार करना होगा। जहां गहरे गड्ढे में दफन करना अपरिहार्य है, वहां हर शर्त अक्षरशः लागू हो। धरती तुरंत शिकायत नहीं करती और न ही पानी कोई मुकदमा दर्ज कराता है, लेकिन प्रदूषण का हिसाब पीढ़ियों तक चलता रहता है। इसलिए अब चिकित्सकीय कचरे को छिपाना नहीं, बल्कि उसकी पूरी यात्रा को जवाबदेह बनाना होगा।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, शिक्षाविद्, बड़वानी (मप्र), ईमेल: [email protected]