दवाएँ बनीं जीवन की उम्मीद, लेकिन महँगी कीमतें बनीं सबसे बड़ी दीवार

Team Atal Hind8 August 20262 min read51 viewsहेल्थ
दवाएँ बनीं जीवन की उम्मीद, लेकिन महँगी कीमतें बनीं सबसे बड़ी दीवार

समय ने ऐसी करवट ली है कि अब सबसे बड़ा डर बीमारी नहीं, बल्कि उसके उपचार का भारी बोझ बन चुका है। रोग का असर केवल शरीर तक सीमित रहता है, लेकिन दवाओं और इलाज का खर्च पूरे परिवार की आर्थिक शक्ति को भीतर तक चकनाचूर कर देता है। अस्पतालों की चौखट पर अब सिर्फ स्वास्थ्य की लड़ाई नहीं लड़ी जाती; वहाँ यह भी तय होता है कि किसकी आर्थिक क्षमता जीवन को बचा पाएगी और किसका जीवन पैसों की कमी के सामने हार मान लेगा। भारतीय स्वास्थ्य परिदृश्य आज ऐसे दो संकटों का सामना कर रहा है, जिनकी प्रकृति भले अलग हो, पर दोनों एक ही नैतिक चुनौती को उजागर करते हैं। एक तरफ कैंसर है, जो अब न उम्र की सीमाओं में बँधा है, न किसी क्षेत्र या वर्ग तक सीमित, और दूसरी तरफ दुर्लभ बीमारियाँ हैं जो असंख्य परिवारों को वर्षों तक आर्थिक, मानसिक और सामाजिक संघर्ष में जकड़े रखती हैं। रोग दोनों अलग हैं, किंतु उनकी सबसे बड़ी त्रासदी एक ही है कि जीवनरक्षक दवाएँ आज भी सामान्य नागरिक की पहुँच से बहुत दूर हैं।

सरकारी नीतियों की सबसे बड़ी कसौटी संकट के समय सामने आती है, और यहीं उनका सबसे गहरा विरोधाभास भी उजागर होता है। हमारे निर्णय अक्सर बीमारी की गंभीरता नहीं, बल्कि मरीजों की संख्या देखकर लिए जाते हैं। कैंसर के बढ़ते मामलों ने कुछ जीवनरक्षक दवाओं को निःशुल्क या रियायती दर पर उपलब्ध कराने की राह अवश्य खोली है, लेकिन यह व्यवस्था अब भी सीमित है। दूसरी ओर, दुर्लभ बीमारियों में मरीज कम होने के कारण सहायता भी सीमित कर दी जाती है। इलाज की परीक्षा अस्पताल से बाहर शुरू होती है, जब दवाओं का खर्च वर्षों तक परिवार का पीछा नहीं छोड़ता। कैंसर का उपचार ऑपरेशन या कीमोथेरेपी तक सीमित नहीं रहता और दुर्लभ बीमारियों में संकट तब और कठोर हो जाता है जब सरकारी नीति के तहत मिलने वाली प्रति मरीज ₹50 लाख तक की सहायता के बाद भी सालाना खर्च अधिक और दवा की जरूरत लगातार रहती है।

योजनाओं की प्रभावशीलता वहीं समाप्त होती है जहाँ उपचार का खर्च असाधारण हो जाता है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ सामान्य चिकित्सा प्रक्रियाओं में उपयोगी हैं, पर अत्यधिक महँगी व लंबी अवधि की जीवनरक्षक दवाओं का खर्च नहीं उठा पातीं। स्वास्थ्य नीति की अगली दिशा राहत नहीं, बल्कि अधिकार पर आधारित हो तथा उपचार की अवधारणा को अनुदान से अधिकार की ओर ले जाना होगा। समाधान की अगली कड़ी दवाओं की खरीद और उत्पादन व्यवस्था में बदलाव से जुड़ी है जिसके तहत केंद्रीय स्तर पर दवाओं की थोक खरीद और आवश्यक जीवनरक्षक दवाओं के घरेलू विनिर्माण को गति देनी होगी। जब उत्तरदायित्व स्पष्ट होंगे और स्वास्थ्य बजट का हिस्सा कैंसर और दुर्लभ बीमारियों के लिए आरक्षित होगा, तभी जीवनरक्षक दवा संख्या नहीं बल्कि पीड़ा देखकर उपलब्ध कराई जा सकेगी।

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