मिलावटी पेट्रोल बेचने का कॉर्पोरेट खेल

Atal Hind8 August 20265 min read26 viewsलेख

मिलावटी पेट्रोल बेचने का कॉर्पोरेट खेल: ई-20 से उपभोक्ता लूट और खाद्य सुरक्षा का खतरा

====टिप्पणीकार संजय पराते===

मोदी सरकार ने यह दावा किया था कि शुद्ध पेट्रोल से इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल सस्ता होगा। लेकिन मोदी सरकार का यह दावा भी दूसरे वादों की तरह जुमला ही साबित हुआ है, क्योंकि ई-10 और इसके बाद ई-20 उसी कीमत पर बेचा जा रहा है, जिस कीमत पर शुद्ध पेट्रोल बेचा जाता था,

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जबकि इससे माइलेज कम मिलता है और गाड़ियों में ज़्यादा टूट-फूट होती है। इससे बचने का इस देश के नागरिकों और उपभोक्ताओं के पास कोई रास्ता नहीं है, सिवाय इसके कि वे 160 रुपये प्रति लीटर वाला एक्सपी 100 पेट्रोल खरीदे।

सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स ने केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय को हाल ही में एक पत्र लिखकर इथेनॉल-मिश्रित ईंधन से होने वाले नुकसान पर चिंता जताई है, जिसमें पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट करने के जोखिमों और दुष्परिणामों को रेखांकित किया गया था। हालांकि, बाद में सरकार के दबाव में आकर उस पत्र को वापस ले लिया गया है, लेकिन इससे इस पत्र में उठाई गई बातों की तर्कसंगतता  खत्म नहीं हो जातीं।

इथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी साफ तौर पर उपभोक्ताओं को किस तरह लूट रहा है, उसे समझने के लिए किसी विशेषज्ञता की जरूरत नहीं है। इस समय देश में सरकारी पेट्रोल पंपों पर मिलावटी पेट्रोल की कीमत औसतन 105 रुपये प्रति लीटर है। अब इसमें माइलेज में 10 प्रतिशत गिरावट को जोड़ें। यदि एक दुपहिया एक लीटर शुद्ध पेट्रोल में 60 किमी. चलता है, तो मिलावटी पेट्रोल से 54 किमी. ही चलेगा और गाड़ी को 60 किमी. चलाने के लिए 115 रुपये का पेट्रोल खरीदना पड़ेगा।

लेकिन चूंकि इसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल मिला हुआ है, इसमें वास्तव में पेट्रोल 97 रुपये का ही है, जिसे हमें इथेनॉल मिलाकर 115 रुपये में बेचा जा रहा है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अनाप-शनाप कर लगाकर महंगा पेट्रोल बेचने के ऊपर से मोदी सरकार ने अतिरिक्त कमाई करने का रास्ता खोज लिया है। यह उपभोक्ताओं की लूट नहीं, तो और क्या है? इस गणना में मिलावटी पेट्रोल से गाड़ियों में हो रही टूट-फूट की मरम्मत की लागत शामिल नहीं है।

लेकिन मामला केवल यहीं तक सीमित नहीं है, क्योंकि हमारी चिंता खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ती है। अपने बचाव में मोदी सरकार का तर्क है कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की ज़रूरत है, लेकिन ऐसा खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संबंधी चिंताओं और ग्राहकों की समस्याओं की कीमत पर नहीं किया जा सकता। इथेनॉल का उत्पादन मुख्यतः मक्का और गन्ना से होता है।

एक ऐसे देश में, जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी और कुपोषण से जूझ रहा है, इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती कि खाद्य फसलों का इस्तेमाल ईंधन के उत्पादन के लिए हो। इथेनॉल का देश में उत्पादन बढ़ाने के लिए मक्का भी आयात किया जा रहा है। इससे देश की विदेशी मुद्रा भंडार पर चोट पहुंचती है, जबकि कुछ दिनों पहले ही मोदी ने विदेशी मुद्रा के बचत का आह्वान किया था! अमेरिका जीएम मक्का निर्यात करता है।

वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह सिद्ध हो चुका है कि यह मक्का इंसानों के खाने के लायक नहीं है। लेकिन भुखमरी से ग्रस्त भारत में इस पेट में जाने से भी रोका नहीं जा सकता, जिसके खाने से आनुवांशिकी बीमारियां पैदा हो सकती हैं। यह मक्का हमारी खेती को भी उसी तरह बर्बाद कर सकता है, जैसे पीएल-480 के गेहूं ने किया था, जिसे 1960 के दशक में अकाल के समय अमेरिका से आयात किया गया था।

इस घटिया लाल गेहूं के दुष्प्रभावों से अभी तक हम उबर नहीं पाए हैं। गन्ना उत्पादन के लिए ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है। ज़्यादा पानी की ज़रूरत वाली खेती से भूजल के सीमित संसाधन खत्म हो रहे हैं। इस सबका अर्थ यही है कि हमारे फसल चक्र में नकारात्मक बदलाव होगा, जो इस देश के लोगों और खेती किसानी के लिए नुकसानदेह है।

तो मिलावटी पेट्रोल बेचने से किसे फायदा होने जा रहा है? निश्चित रूप से उन्हें जो इथेनॉल का उत्पादन और व्यापार करते हैं। मिलावटी पेट्रोल बेचने की नीति का सीधा फायदा कॉरपोरेट घरानों और बड़ी चीनी मिलों को हो रहा है।

इस खेल का एक बड़ा खिलाड़ी केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का बेटा भी है। इस खेल में अमेरिका का दबाव भी है, जहां से इथेनॉल का निर्यात किया जाएगा। अमेरिका में खाद्यान्न को जैव ईंधन में बदलने का बड़ा उद्योग है, जो कॉर्पोरेटों द्वारा नियंत्रित हैं। भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता में यह महत्वपूर्ण प्रावधान भी शामिल है। साफ है कि मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में आम जनता के हित नहीं, कॉरपोरेटों के मुनाफे सुनिश्चित करना है।

संसद में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की तीन तेल कंपनियों और निजी कंपनियों ने संयुक्त रूप से इथेनॉल उत्पादन के लिए जहां वर्ष 2020-21 में 17715 करोड़ रुपये खर्च किए थे, वहीं वर्ष 2024-25 में यह बढ़कर 74053 करोड़ रुपये हो गया।

इसी अवधि में इथेनॉल आपूर्ति भी 255.55 करोड़ लीटर से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 1040 करोड़ लीटर से अधिक हो गया। मोदी सरकार आने के पहले पेट्रोल में केवल 1.53 प्रतिशत इथेनॉल की ब्लेंडिंग की जाती थी, जो अब बढ़कर 20 प्रतिशत हो गई है। पेट्रोल में इस अंधाधुंध सरकारी मिलावट का फायदा रिफाइनरी से लेकर स्थानीय डिस्ट्रीब्यूटर्स और पंप डीलर्स तक
उठा रहे हैं, जिनके लिए कम लागत वाले औद्योगिक सॉल्वैंट्स और रासायनिक पदार्थों (जैसे नेफ्था और टोल्यूनि) को इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल में मिलाना और आसान हो गया है। पूरी आपूर्ति श्रृंखला में यह खेल धड़ल्ले से चल रहा है।

मोदी सरकार की इस नीति के खिलाफ भी उसी तरह का संघर्ष छेड़ने की जरूरत है, जैसा कि जंतर मंतर पर कुछ दिनों पहले छात्र-युवाओं/छात्राओं-युवतियों ने किया था। उपभोक्ता को चयन का अधिकार मिलना चाहिए कि वह किस प्रकार का पेट्रोल खरीदना चाहता है : शुद्ध पेट्रोल या मिलावटी पेट्रोल? इसके साथ ही, इथेनॉल मिश्रित ईंधन की कीमत शुद्ध पेट्रोल से आनुपातिक रूप से कम होनी चाहिए, ताकि कम माइलेज और टूट-फूट के कारण गाड़ियों के मरम्मत की भरपाई हो सके। 20 प्रतिशत से ज़्यादा इथेनॉल ब्लेंडिंग नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही, अमेरिकी जीएम मक्का, जिससे इंसानी जिंदगी को खतरा है, के आयात पर रोक लगनी चाहिए। 

(टिप्पणीकार संजय पराते अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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