मोहन भागवत: मुसलमान न हो तो हिंदू नहीं रहेगा

Atal Hind Team Online30 August 202617 min read47 viewsअमेरिका
मोहन भागवत: मुसलमान न हो तो हिंदू नहीं रहेगा

आरोप क्या हैं?

कई आलोचक (विपक्षी दल, मानवाधिकार संगठन, कुछ विदेशी रिपोर्ट जैसे USCIRF, और कुछ पत्रकार) कहते हैं कि आरएसएस और उससे जुड़े संगठन अल्पसंख्यकों (खासकर मुसलमानों) के खिलाफ नफरत फैलाने, लिंचिंग, और कुछ सांप्रदायिक दंगों में भूमिका रखते हैं।

  • पुराने आयोगों की रिपोर्टों में कुछ दंगों (जैसे 1969 अहमदाबाद, 1979 जमशेदपुर आदि) में आरएसएस या उससे जुड़े लोगों के “जलवायु बनाने” का जिक्र है।
  • गुजरात 2002, बाबरी मस्जिद विध्वंस, और बाद की घटनाओं को लेकर भी आरोप लगते रहे हैं।
  • कुछ लोग कहते हैं कि हिंदुत्व की विचारधारा में अल्पसंख्यकों को “दूसरा दर्जा” देने की सोच है, इसलिए भारत में हिंसा होती है और विदेश में नरम चेहरा दिखाया जाता है।
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ये आरोप लंबे समय से चल रहे हैं।

न्यूयॉर्क//30 अगस्त 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में मुस्लिमों पर बड़ा बयान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम को संबोधित किया। यह कार्यक्रम ‘वन वर्ल्ड वन ह्यूमैनिटी’ नाम से आयोजित हुआ था। इसमें अलग-अलग धर्मों के लोग भी शामिल थे। भागवत जी ने वहां मानवता की एकता पर जोर दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि धर्म अलग हो सकते हैं लेकिन इंसानियत एक ही है।

उन्होंने एक पुरानी घटना का जिक्र किया। साल 2018 में दिल्ली में उनके एक व्याख्यान में कुछ मुस्लिम भाइयों ने उनसे सवाल पूछा था। सवाल यह था कि आप हिंदू संगठन हैं और हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं तो मुसलमानों का क्या होगा। क्या उन्हें देश से बाहर निकाल दिया जाएगा।

भागवत जी ने उस समय जवाब दिया था कि नहीं, यह हिंदुत्व नहीं है। न्यूयॉर्क में उन्होंने वही बात दोहराई। उन्होंने कहा कि अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए तो वह हिंदू नहीं रह जाएगा।

उन्होंने आगे समझाया कि अगर कोई खुद को हिंदू कहना चाहता है तो उसे यह मानना होगा कि सभी रास्ते एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। हर इंसान की अपनी इज्जत है। इंसानों में कोई फर्क नहीं है। सत्य एक है और मानवता उसी सत्य से निकली है।

भागवत जी ने कहा कि भारत की परंपरा रही है कि यहां हर किसी को जगह दी गई। दुनिया में जहां सुरक्षित जगह नहीं मिली वहां के लोग भारत आए और यहां बस गए। धर्म अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन मानवता एक है। यह भारत का पारंपरिक सोच रहा है।

उन्होंने अमेरिका और भारत की तुलना भी की। उन्होंने बताया कि अमेरिका की बात हो तो बहुलता यानी प्लूरलिज्म की चर्चा होती है। भारत की बात हो तो विविधता में एकता की बात होती है। दोनों ही भारत के स्वभाव में हैं। विविधता प्रकृति का नियम है और एकता उसके पीछे का सत्य है।

भागवत जी ने आरएसएस के सेवा कार्यों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि स्वयंसेवक करीब एक लाख तीस हजार सेवा प्रकल्प चला रहे हैं। इनमें किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाता। जरूरत पड़ने पर सबकी मदद की जाती है। उन्होंने दादरी में हुए एक विमान दुर्घटना का उदाहरण दिया जहां स्वयंसेवक पहले पहुंचे थे।

उन्होंने कहा कि बदलाव राजनीति से नहीं बल्कि समाज से शुरू होना चाहिए। राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है। जहां ‘मैं’ और ‘मेरा’ होता है वहां समाधान नहीं मिलता। ‘हम’ और ‘हमारा’ में समाधान है। इसलिए समाज से काम शुरू करना जरूरी है।

यह बयान न्यूयॉर्क में दिया गया। भागवत जी आरएसएस की शताब्दी वर्ष के दौरान विदेश दौरे पर थे। कार्यक्रम में भारतीय मूल के हजारों लोग और अंतरधार्मिक नेता मौजूद थे। उन्होंने भारतीय प्रवासियों से भी कहा कि वे अपनी कर्मभूमि यानी जिस देश में रहते हैं उसके प्रति वफादार रहें। जन्मभूमि की मूल्यों को जीएं।

भागवत जी के इस बयान पर कई जगह चर्चा हुई। कुछ लोगों ने इसे सकारात्मक माना क्योंकि इसमें सबको साथ रखने की बात कही गई। कुछ ने पुराने बयानों से जोड़कर देखा। साल 2018 में भी उन्होंने दिल्ली में लगभग यही बात कही थी कि जिस दिन मुसलमान नहीं चाहिए कहेंगे उस दिन हिंदुत्व नहीं बचेगा। बाद के वर्षों में भी उन्होंने समान विचार रखे।

भारत में हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर लंबे समय से चर्चा चलती रहती है। कुछ घटनाओं और बयानों के कारण तनाव की बातें होती हैं। भागवत जी ने कहा कि अतीत का कुछ बोझ भी समुदायों के बीच गड़बड़ी का कारण बना है। लेकिन परंपरा में सबको जगह देने की बात रही है।

उन्होंने जोर दिया कि विविधता को बचाना होगा क्योंकि यह प्रकृति का नियम है। एकता इस दुनिया का बड़ा सच है। आरएसएस का मानना है कि दुनिया की मानवता एक है इसलिए सब जगह जाकर यह संदेश देना उनका कर्तव्य है कि विविधताओं के बावजूद हम एक हैं।

न्यूयॉर्क कार्यक्रम में भागवत जी ने कहा कि सत्य एक है लेकिन उसे अलग-अलग तरीके से बताया जाता है। इंसान अपने दिमाग के सॉफ्टवेयर के कैदी हैं इसलिए वर्णन अलग हो जाते हैं। लेकिन मूल में मानवता एक ही रहती है। हर व्यक्ति सम्मान और गरिमा के साथ जीने का हक रखता है।

इस बयान के बाद सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में बात फैल गई। कई लोगों ने इसे हिंदुत्व की व्याख्या के रूप में देखा। कुछ ने पूछा कि व्यवहार में यह कैसे लागू होता है। कुछ ने पुराने बयानों और मौजूदा घटनाओं से जोड़कर सवाल उठाए। लेकिन भागवत जी ने साफ कहा कि किसी समुदाय को बाहर करने की सोच हिंदुत्व नहीं है।

आरएसएस शताब्दी वर्ष मना रहा है। इस दौरान विदेशों में भी कार्यक्रम हो रहे हैं। न्यूयॉर्क का यह कार्यक्रम उसी श्रृंखला का हिस्सा था। भागवत जी ने वहां कहा कि भारत का मिशन है विविधता में एकता का संदेश दुनिया को देना। यह सिर्फ कहने से नहीं बल्कि व्यवहार से दिखाना होगा।

उन्होंने सेवा को सबसे बड़ा माध्यम बताया। सेवा करते समय धर्म या जाति का भेद नहीं देखा जाता। जरूरत वाला व्यक्ति मदद का हकदार है। स्वयंसेवक इसी भावना से काम करते हैं। समाज की मदद से ये प्रकल्प चल रहे हैं।

भारत की संविधान में भी भाईचारे और एकता की बात है। भागवत जी ने कहा कि संविधान में यह बात है लेकिन व्यवहार में पूरी तरह नहीं उतर पाई क्योंकि राजनीति स्वार्थ पर आधारित हो गई। इसलिए समाज स्तर पर काम करना जरूरी है। संवाद और सेवा से ही समाधान निकलेगा।

कुछ लोग भागवत जी के बयानों को लेकर अलग-अलग राय रखते हैं। कुछ कहते हैं कि भारत में और विदेश में बातें अलग लगती हैं। कुछ कहते हैं कि उनके पुराने बयान भी इसी दिशा में रहे हैं। 2018 से लेकर बाद के वर्षों तक उन्होंने मुसलमानों को बाहर करने की सोच को हिंदुत्व के खिलाफ बताया। न्यूयॉर्क में भी उन्होंने वही दोहराया।

कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि जहां ‘मैं’ और ‘मेरा’ है वहां समाधान नहीं। ‘हम’ और ‘हमारा’ में समाधान है। यह बात उन्होंने समाज को संदेश के रूप में कही। विविधता को सजावट बताया और एकता को मूल सत्य।

भागवत जी ने यह भी कहा कि भारत ने हमेशा सबको शरण दी। जो दुनिया में सुरक्षित जगह नहीं पा सके वे भारत आए। यहां उन्होंने अपनी जगह बनाई। यह परंपरा आज भी बनी हुई है। धर्म अलग हो सकते हैं लेकिन इंसान एक हैं।

न्यूयॉर्क में दिए इस भाषण में उन्होंने हिंदू होने का मतलब भी समझाया। हिंदू कहलाने के लिए यह मानना जरूरी है कि सभी रास्ते एक लक्ष्य की ओर जाते हैं। हर इंसान की गरिमा समान है। इंसानों में कोई बुनियादी फर्क नहीं।

इस बयान के बाद कई समाचार माध्यमों ने इसे प्रमुखता दी। कुछ ने इसे सद्भावना का संदेश कहा। कुछ ने आरएसएस की विचारधारा से जोड़कर विश्लेषण किया। लेकिन मूल बात यही रही कि भागवत जी ने स्पष्ट किया कि मुसलमानों को भारत से बाहर करने की सोच हिंदू नहीं हो सकती।

उन्होंने कहा कि सत्य एक है। मानवता उसी से निकली है। इसलिए मानवता भी एक है। अलग-अलग धर्म अपने रीति-रिवाज अपनाते हैं लेकिन अंतिम लक्ष्य एक ही रहता है। यह भारत की जीवन दृष्टि है। आरएसएस स्वयंसेवक सेवा कार्यों में लगे रहते हैं। आपदा के समय भी वे पहुंचते हैं। दादरी की घटना का जिक्र करते हुए भागवत जी ने बताया कि कैसे बिना भेदभाव के मदद पहुंचाई गई। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां सेवा सबके लिए की गई।

विदेश में रहते भारतीय मूल के लोगों से उन्होंने कहा कि कर्मभूमि के प्रति वफादार रहें। जन्मभूमि से मिले मूल्यों को जीएं। दोनों का संतुलन जरूरी है। अमेरिका में रहते हुए अमेरिकी बनकर रहें लेकिन भारत की सोच को न भूलें। यह पूरा भाषण लगभग एक घंटे का रहा। इसमें मानवता, एकता, विविधता और सेवा पर जोर दिया गया। भागवत जी ने बार-बार दोहराया कि हम एक हैं। विविधता के बावजूद मूल में एकता है।

भारत में लंबे समय से साम्प्रदायिक सद्भाव की चर्चा होती रही है। कई नेता और संगठन इस पर बोलते रहे हैं। भागवत जी का यह बयान उसी श्रृंखला में देखा जा रहा है। उन्होंने 2018 में भी यही कहा था। बाद में भी कई मौकों पर दोहराया।

कुछ आलोचक कहते हैं कि शब्दों और व्यवहार में फर्क दिखता है। कुछ समर्थक कहते हैं कि विचारधारा साफ है और बार-बार दोहराई जा रही है। न्यूयॉर्क का यह कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिया गया इसलिए चर्चा बढ़ी।

भागवत जी ने कहा कि राजनीति से बदलाव नहीं आता। समाज से शुरू करना पड़ता है। संवाद, सेवा और एकता की भावना से काम करना होगा। जहां स्वार्थ हावी हो वहां समाधान मुश्किल है।

उन्होंने प्रकृति का उदाहरण दिया। विविधता प्रकृति का नियम है। एकता उसके पीछे का सत्य। जैसे मैं अपनी पहचान बचाता हूं वैसे ही दूसरों की भी रक्षा करनी होगी। विविधता को सजावट बताया और एकता को आधार।

यह संदेश उन्होंने विश्व स्तर पर दिया। आरएसएस का मानना है कि मानवता एक है इसलिए इसे दुनिया भर में फैलाना उनका काम है। शताब्दी वर्ष में ऐसे कार्यक्रम हो रहे हैं। भागवत जी के अनुसार भारत का भाग्य है कि वह दुनिया को विविधता में एकता का संदेश दे। सिर्फ कहने से नहीं बल्कि करके दिखाने से। सेवा और संवाद इसी का माध्यम हैं।

न्यूयॉर्क में दिए इस भाषण में उन्होंने साफ कहा कि कोई हिंदू अगर सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए तो वह हिंदू नहीं रह सकता। खुद को हिंदू कहने के लिए सभी रास्तों को एक लक्ष्य की ओर मानना होगा। हर इंसान का सम्मान बराबर है।

धर्म अलग हो सकते हैं लेकिन मानवता एक है। सत्य एक है। यह बात उन्होंने बार-बार दोहराई। पुरानी घटना का हवाला देकर अपनी बात को मजबूत किया। सेवा कार्यों का उदाहरण देकर भेदभाव न करने की बात कही।

यह बयान राष्ट्रीय स्तर पर पहले ही प्रकाशित हो चुका है। कई अखबारों और चैनलों ने इसे कवर किया। विदेश में दिए जाने के कारण अंतरराष्ट्रीय चर्चा भी हुई। कुछ जगह विरोध भी दर्ज किया गया लेकिन मुख्य बात मानवता की एकता रही।

भागवत ने कहा कि हम सब इंसान हैं। बाहरी फर्क सिर्फ सजावट हैं। मूल में हम एक हैं। भ्रम कुछ समय के लिए रह सकते हैं लेकिन अंत में सच्चाई सामने आती है। उन्होंने समाज को संदेश दिया कि ‘हम’ और ‘हमारा’ की सोच अपनाएं। स्वार्थ छोड़कर सामूहिक हित देखें। तभी सच्चे अर्थों में एकता बनेगी।

आरएसएस के अनुसार उनके स्वयंसेवक बिना भेदभाव के काम करते हैं। जरूरत वाले की मदद करते हैं। चाहे कोई भी धर्म हो। यही उनका तरीका है। न्यूयॉर्क कार्यक्रम में अलग-अलग धर्मों के नेता भी थे। भागवत जी ने सबके सामने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा सबको जगह देने की रही है। आज भी वही परंपरा जारी है।

इस पूरे भाषण में उन्होंने हिंदुत्व को किसी को बाहर करने की विचारधारा नहीं बताया। बल्कि सबको साथ रखने और सम्मान देने की बात कही। हर इंसान की गरिमा समान है। यह उनकी मूल बात रही। भारत जैसे विविधता वाले देश में ऐसे बयान महत्व रखते हैं। लोग अलग-अलग धर्म मानते हैं लेकिन एक देश में रहते हैं। भागवत जी ने कहा कि विविधता को बचाते हुए एकता बनाए रखनी होगी।

उन्होंने राजनीति की आलोचना भी की। कहा कि राजनीति स्वार्थ का खेल बन गई है। समाधान समाज से आएगा। शिक्षा, संवाद और सेवा से बदलाव संभव है। यह बयान 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क में दिया गया। उसके बाद पूरे देश में चर्चा शुरू हो गई। कुछ ने इसे सकारात्मक कदम माना। कुछ ने सवाल उठाए। लेकिन मूल संदेश साफ था कि मुसलमानों को बाहर करने की सोच हिंदू नहीं हो सकती।

भागवत ने कहा कि अगर आप हिंदू कहलाना चाहते हैं तो सभी रास्तों को एक लक्ष्य की ओर मानें। हर इंसान का सम्मान करें। इंसानों में फर्क न करें। धर्म अलग हो सकते हैं लेकिन मानवता एक है। सत्य एक है। यह बात उन्होंने आसान शब्दों में कही। पुरानी घटना याद दिलाई। सेवा कार्यों का जिक्र किया। विविधता और एकता का संतुलन समझाया। समाज से बदलाव की बात कही।

न्यूयॉर्क जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह संदेश देना आरएसएस की शताब्दी वर्ष की गतिविधियों का हिस्सा था। भागवत जी ने वहां भारतीय प्रवासियों को भी संबोधित किया और कर्मभूमि के प्रति वफादारी की बात कही।

कुल मिलाकर उनका संदेश मानवता की एकता पर केंद्रित रहा। उन्होंने बार-बार दोहराया कि हम एक हैं। विविधताओं के बावजूद मूल में एकता है। कोई भी समुदाय बाहर करने की सोच हिंदुत्व की मूल भावना के खिलाफ है।

मुस्लिमों को लेकर भागवत का साफ संदेश

मोहन भागवत के भाषण का सबसे ज्यादा चर्चा में आया हिस्सा मुस्लिमों को लेकर उनका बयान रहा। उन्होंने कहा कि जो हिंदू यह मानता है कि भारत में मुस्लिम नहीं होने चाहिए, वह हिंदू नहीं रह सकता।

भागवत ने इस बात को हिंदुत्व की मूल भावना से जोड़ते हुए कहा कि हिंदू परंपरा अलग-अलग रास्तों को स्वीकार करती है। उनके अनुसार किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान अलग हो सकती है, लेकिन इससे उसकी इंसान के तौर पर गरिमा कम नहीं होती।

उन्होंने धर्मों की विविधता को स्वीकार करने और मानवता को प्राथमिकता देने की बात कही। उनके भाषण का संदेश यह था कि किसी धर्म को मानने का अधिकार किसी दूसरे व्यक्ति के सम्मान और अस्तित्व के अधिकार को खत्म नहीं करता।

यह बयान ऐसे समय आया है जब RSS प्रमुख अमेरिका के दौरे पर हैं और न्यूयॉर्क में उनके कार्यक्रम को लेकर समर्थन के साथ-साथ विरोध भी हुआ है।

क्या यह पहली बार है जब भागवत ने ऐसी बात कही?

मोहन भागवत का यह बयान पहली बार नहीं है जब उन्होंने हिंदुत्व और मुस्लिम समाज को लेकर समावेशी बात कही हो। वर्ष 2018 में भी उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि हिंदू राष्ट्र का मतलब यह नहीं है कि भारत में मुस्लिमों के लिए कोई जगह नहीं होगी।

उस समय भागवत ने कहा था कि अगर मुस्लिमों को स्वीकार नहीं किया जाता तो उसे हिंदुत्व नहीं कहा जा सकता। उन्होंने हिंदुत्व को भारतीयता और समावेशिता से जोड़ते हुए मुस्लिमों को भारतीय समाज का हिस्सा बताया था।

इसलिए न्यूयॉर्क में दिया गया ताजा बयान उनके पुराने सार्वजनिक बयानों से पूरी तरह अलग नहीं है। हालांकि, मौजूदा राजनीतिक माहौल और RSS की हिंदू राष्ट्र संबंधी विचारधारा के कारण इस बयान पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

फिर सवाल क्यों उठ रहा है?

भागवत के बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर एक सवाल जरूर उठ रहा है कि RSS प्रमुख की समावेशी बातों को संगठन की व्यापक विचारधारा के साथ कैसे देखा जाए।

RSS भारत को हिंदू राष्ट्र के रूप में देखने की अपनी वैचारिक सोच लंबे समय से सार्वजनिक करता रहा है। दिसंबर 2025 में भी भागवत ने भारत को हिंदू राष्ट्र बताते हुए कहा था कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को समझना जरूरी है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि RSS मुस्लिम विरोधी संगठन नहीं है।

यानी भागवत के सार्वजनिक बयानों में एक तरफ हिंदू राष्ट्र और हिंदू सांस्कृतिक पहचान की बात दिखाई देती है, तो दूसरी तरफ मुस्लिमों को भारत का हिस्सा मानने और उनके सम्मान की बात भी सामने आती है।

भारत और विदेश में अलग संदेश का सवाल

न्यूयॉर्क के बयान के बाद राजनीतिक विरोधियों ने सवाल उठाया है कि यदि हिंदू-मुस्लिम एकता और मुस्लिमों के सम्मान की बात RSS की सोच का हिस्सा है, तो इसे भारत में भी उसी स्पष्टता से क्यों नहीं दोहराया जाता।

कुछ आलोचकों ने यह सवाल भी उठाया कि अमेरिका में दिए गए बयान का संदेश भारत की राजनीतिक बहस में RSS की छवि से कितना मेल खाता है। CPI महासचिव डी. राजा समेत कुछ नेताओं ने भागवत से भारत में भी इसी संदेश को दोहराने की मांग की है।

कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने भी सवाल उठाया कि हिंदू-मुस्लिम एकता की बात अमेरिका में करने की जरूरत क्यों पड़ी। इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि भागवत का बयान अब केवल धार्मिक भाषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।

क्या भागवत के बयान को ‘गिरगिट’ से जोड़ना सही है?

सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में यह सवाल उठ सकता है कि क्या भारत और विदेशों में नेताओं के बयान अलग-अलग होते हैं। इसी संदर्भ में कुछ लोग मोहन भागवत की तुलना ‘गिरगिट’ से करने जैसी भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं।

लेकिन तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिहाज से किसी व्यक्ति को ‘गिरगिट’ कहना उचित निष्कर्ष नहीं होगा। उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड यह दिखाता है कि भागवत ने भारत में भी कई मौकों पर मुस्लिमों के सम्मान और उनके भारत में रहने के अधिकार की बात की है।

2018 में उन्होंने कहा था कि मुस्लिमों के बिना हिंदू राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती और मुस्लिमों को स्वीकार करना हिंदुत्व का हिस्सा है। बाद के वर्षों में भी उन्होंने मुस्लिम और ईसाई समुदायों को भारतीय समाज का हिस्सा बताते हुए कई बयान दिए हैं।

इसलिए यह कहना कि उन्होंने केवल विदेश में जाकर पहली बार मुस्लिमों के पक्ष में बात की, उपलब्ध रिकॉर्ड से पूरी तरह सही नहीं होगा। हां, यह राजनीतिक सवाल जरूर है कि उनके इन बयानों और RSS की व्यापक राजनीतिक छवि के बीच कितना अंतर है।

RSS की हिंदू राष्ट्र की अवधारणा क्या कहती है?

इस पूरे विवाद को समझने के लिए RSS की हिंदू राष्ट्र संबंधी अवधारणा को समझना जरूरी है।

RSS के मुताबिक हिंदू राष्ट्र का अर्थ किसी धार्मिक समुदाय को भारत से बाहर करना नहीं है। संगठन हिंदू राष्ट्र को मुख्य रूप से भारत की सांस्कृतिक पहचान के रूप में प्रस्तुत करता है।

भागवत भी कई बार कह चुके हैं कि हिंदू राष्ट्र का मतलब मुस्लिम विरोधी राष्ट्र नहीं है। उनका कहना रहा है कि भारत की सांस्कृतिक पहचान अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के लोगों को साथ लेकर चलने वाली है।

लेकिन आलोचक इस व्याख्या पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि किसी विचारधारा की वास्तविक परीक्षा उसके सार्वजनिक व्यवहार और सामाजिक प्रभाव से होती है, केवल उसके वैचारिक स्पष्टीकरण से नहीं।

यही कारण है कि भागवत के न्यूयॉर्क बयान के बाद पुरानी बहस फिर सामने आ गई है।

न्यूयॉर्क में विरोध भी हुआ

मोहन भागवत के कार्यक्रम को लेकर न्यूयॉर्क में विरोध भी देखने को मिला। कई नागरिक अधिकार और अंतरधार्मिक संगठनों ने RSS की विचारधारा को लेकर सवाल उठाए।

न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने भी कार्यक्रम और RSS की विचारधारा की आलोचना की। उन्होंने RSS की सोच को भारत की बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष कल्पना से अलग बताया।

दूसरी तरफ कार्यक्रम के आयोजकों और समर्थकों ने इसे धार्मिक और सांस्कृतिक संवाद तथा वैश्विक स्तर पर भारतीय परंपरा को सामने रखने वाला आयोजन बताया। RSS भी अपने ऊपर लगाए जाने वाले असहिष्णुता के आरोपों को खारिज करता रहा है।

भागवत ने मानवता को बताया सबसे बड़ा आधार

अपने संबोधन में भागवत ने धर्मों के बीच अंतर को स्वीकार करते हुए मानवता को सबसे बड़ा आधार बताया।

उन्होंने कहा कि अलग-अलग धार्मिक परंपराएं अपनी-अपनी मान्यताओं और रास्तों के साथ आगे बढ़ती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एक धर्म को मानने वाला व्यक्ति दूसरे धर्म के व्यक्ति से कम या ज्यादा इंसान है।

भागवत के मुताबिक सभी मनुष्यों का सम्मान होना चाहिए। उनका संदेश था कि अलग-अलग धार्मिक पहचान के बावजूद समाज को एक-दूसरे को समझने और साथ रहने की कोशिश करनी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक बदलाव केवल राजनीति के माध्यम से नहीं आ सकता। इसके लिए समाज के स्तर पर लोगों के बीच संवाद और विश्वास बढ़ाना जरूरी है।

सवाल अब यह नहीं है कि मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में क्या कहा। सवाल यह है कि उनके इस संदेश को भारत में समाज और राजनीति किस रूप में देखती है और क्या यह संदेश जमीन पर भी उतना ही स्पष्ट दिखाई देता है।

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