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Narendra Modi-कौन दुष्ट है जो उनकी मौन साधना में बार-बार व्यवधान डाल रहा है ये तो बहुत ज्यादती है, नाइंसाफी है।

मोदी जी, ध्यान में बैठे हैं, लेकिन उनका ध्यान बार–बार टूट रहा है। कोई तो दुष्ट है जो उनकी मौन साधना में बार-बार व्यवधान डाल रहा है!

BY–मुकुल सरल

 

 

 

 


डिस्क्लेमर: यह एक व्यंग्य है, इसका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है। बिल्कुल उसी तरह जैसे ऐन चुनाव के समय मोदी जी की ध्यान साधना का चुनाव प्रचार से कोई संबंध नहीं है।

 

 

मोदी जी, ध्यान में बैठे हैं, लेकिन उनका ध्यान बार–बार टूट रहा है। क्यों, क्योंकि हालात ही ऐसे हैं। सबसे ज़्यादा उन्हें 4 जून की चिंता सता रही है।

 

 

 

लेकिन यह सब टीवी नहीं दिखा रहा है। मोदी जी के चारों तरफ लगे कैमरे इस बेचैनी को पकड़ नहीं पा रहे हैं। दरअसल कैमरामैन को हिदायत है कि ऐसे फुटेज डिलीट कर दिए जाएं। टीवी वालों को आदेश है कि वे शुरुआती ध्यान मुद्रा के विजुअल लूप बनाकर दिखाएं। ताकि वे उसमें लगातार शांत, स्थिर और ध्यानमग्न नज़र आएं।

 

 

 

 

मोदी जी ने शुरुआती विजुअल बनवाने के बाद जब वास्तव में पहली बार आंखें बंद की तो उन्होंने कुछ ऐसा देखा कि उन्होंने अचानक घबराकर आंखें खोल लीं। हड़बड़ा कर इधर-उधर देखा कि कोई कैमरा उन्हें क़ैद तो नहीं कर रहा है। सभी कैमरों का मुंह उनकी तरफ था। उन्होंने इशारे से कैमरा पर्सन को समझाया कि यह क्षण रिकॉर्ड न किए जाएं और अगर रिकॉर्ड हो गए हों तो डिलीट कर दिए जाएं।

 

 

 

 

तो हुआ यूं कन्याकुमारी में विवेकानंद रॉक मेमोरियल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआती शूटिंग के बाद वास्तव में जैसे ही पहली बार आंखें बंद कीं, वे हड़बड़ा गए। क्यों, ऐसा उन्होंने क्या देखा।

 

 

 

 

यह लेखक सोचता है कि शायद आंखें बंद करते ही उनके सामने यह ब्रेकिंग न्यूज़ आ गई कि कर्नाटक में प्रज्वल रेवन्ना बेंगलुरु एयरपोर्ट पर गिरफ्तार हो गया। यह वही प्रज्वल रेवन्ना है जो मास रेप का आरोपी है और जिसका हाथ पकड़कर मोदी जी ने जनता से अपील की थी कि प्रज्वल रेवन्ना को मजबूत बनाने का मतलब है मोदी को मजबूत बनाना।

 

 

 

मोदी जी ने शायद यह सोचा होगा कि इस कमबख्त को भी अभी भारत लौटना था। चार जून के बाद भी तो आ सकता था। या कम से कम मेरा ध्यान पूरा होने देता, एक जून की वोटिंग होने देता। लेकिन पता नहीं इसे क्या सूझी कि 31 मई को ही वापस चला आया।

 

 

 

 

ख़ैर अब क्या किया जा सकता है। मोदी जी ने सोचा होगा। लेकिन यह क्या उन्होंने दोबारा ध्यान लगाने की कोशिश की, लेकिन फिर विघ्न आ गया। उन्होंने दोबारा घबराकर आँखें खोलीं। कैमरों की तरफ देखा। देखा, कैमरामैन उनकी ओर ही देख रहे है। मोदी जी सोचने लगे यह क्या मुसीबत मोल ले ली। उन्होंने आंखों से फिर विजुअल डिलीट करने का निर्देश दिया और अपने अंग वस्त्र से अपना पसीना पोंछा।

 

 

 

 

इस बार क्या हुआ। मोदी जी का ध्यान क्यों टूटा। दरअसल आंखें बंद करते ही शायद उन्हें ख़याल आ गया कि उनके प्रिय महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोपी बृजभूषण शरण सिंह के बेटे जिन्हें उन्होंने अपनी पार्टी का टिकट दिया है, के कारों के काफिले ने कुछ लोगों को कुचल दिया है। और उनमें से दो लोगों की मौत हो गई है।

 

 

 

 

इसी के साथ उन्हें लखीमपुर खीरी का कांड भी याद आ गया जब उनके प्रिय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के सुपुत्र की थार ने किसानों को कुचल दिया था। यह सब सोचकर मोदी जी कुछ परेशान हो गए। फिर उन्हें पुणे का पोर्श कांड याद आ गया। जिसमें एक अमीरज़ादे ने शराब के नशे में अपनी तेज रफ्तार कार से दो लोगों को मौत के घाट उतार दिया। यह सोचकर उन्हें कुछ राहत मिली कि शायद बृजभूषण के बेटे करण भूषण को निबंध लिखना तो आता ही होगा। इतना तो पढ़ा-लिखा होगा ही बृजभूषण का बेटा, क्योंकि बृजभूषण के ख़ुद के इतने स्कूल-कॉलेज हैं उनके गौंडा ज़िले में।

 

 

लेकिन फिर मोदी जी उदास और परेशान हो गए। उन्हें लगा कि अगर जनता गुस्सा हो गई तो क्या होगा। इस नामुराद जनता के दबाव में ही पोर्श कांड के आरोपी अमीरज़ादे को शासन-प्रशासन चाह कर भी नहीं बचा सका। मंत्री-विधायक की सिफारिश भी काम नहीं आई और डॉक्टरों के झूठे सर्टिफिकेट के बावजूद जमानत रद्द हो गई। कोई निबंध काम नहीं आया और जेल (बाल सुधार गृह) जाना पड़ा।

 

 

 

ख़ैर…छोड़ो। मोदी जी ने सोचा, इन्हें अपने कर्मों की सजा भुगतने दो, अब मैं क्या करुं।

मोदी जी फिर ध्यान में बैठे। लेकिन जैसे ही आंखें बंद की, फिर घबराकर जाग उठे। इस बार उन्हें किसने परेशान किया। कौन दुष्ट है जो उनकी मौन साधना में बार-बार व्यवधान डाल रहा है। दरअसल इस बार उन्हें मणिपुर याद आ गया। इस मणिपुर ने भी मोदी जी को परेशान कर रखा है।

 

 

 

हालांकि उन अर्थों में परेशान नहीं, जिसमें व्यक्ति वास्तव में चिंतित और परेशान होता, बल्कि इसलिए कि इस मणिपुर ने भी नाक में दम कर रखा है। पहले जल रहा था और अब डूब रहा है। इसी मणिपुर की वजह से उनका ‘वॉर रुकवा दी पापा’ वाला विज्ञापन फेल हो गया। हर कोई मज़ाक उड़ाने लगा कि मोदी जी जब रूस-यूक्रेन की वॉर रुकवा सकते हैं तो मणिपुर की हिंसा क्यों नहीं रुकवा सकते।

 

 

 

अब मोदी जी क्या बताएं कि हक़ीक़त क्या है। जलते मणिपुर ने जितना परेशान नहीं किया उतना डूबता मणिपुर परेशान कर रहा है। वहां भयंकर बाढ़ आई है और पूछने वाले पूछ रहे हैं कि कन्याकुमारी की जगह अगर आप मणिपुर चले जाते तो कितना अच्छा होता। वाकई उससे आपकी इस ध्यान मुद्रा से भी बड़ी इमेज बनती।

 

 

सब कहते वाह मोदी जी वाह, आप वाकई बहुत संवेदनशील हैं। अब इन मूर्खों को कौन समझाए कि बात संवेदना की नहीं वोटों की है। तो जहां से वोट प्रभावित किए जा सकते हैं चुनाव के दौरान वे वहां नहीं जाएंगे तो कहां जाएंगे। एक जून को बंगाल में वोट पड़ रहे हैं और वे विवेकानंद के जरिये उन्हें न साधें तो फिर काहे के मोदी जी, काहे के राजनीतिज्ञ।

 

मणिपुर को भुलाकर वे फिर ध्यान में बैठे लेकिन फिर घबराने–उकताने लगे। अब मोदी जी का ध्यान में मन नहीं लग रहा है। वे जब-जब आंखें बंद करते हैं कोई न कोई मुद्दा उन्हें घेर लेता है। कभी गंगा की बदहाली उन्हें घेर रही है, वो गंगा जिसने उन्हें गोद ले लिया है, जिसने उन्हें वाराणसी बुलाया था और कभी वरुणा और अस्सी नदियां उन्हें घूर रहीं हैं, कि आप हमें तो भूल ही गए। गंगा अगर मां है तो हम तो भी आपकी मासी हैं। हमारे ही नाम से वाराणसी (वरुणा+अस्सी) है। हमारा ख्याल कौन करेगा।

 

 

वाराणसी का ख़याल आया तो अचानक उन्हें बीएचयू की लड़कियां नारे लगाते दिखाई देने लगीं। महिला सुरक्षा पर उन्होंने देशभर में वोट मांगा, यूपी की कानून व्यवस्था की दुहाई दी, लेकिन बीएचयू की ये लड़कियां उनकी पोल खोले दे रही हैं। IIT-BHU की बलात्कार पीड़ित लड़की के लिए इंसाफ मांग रही हैं। नारे लगा रही हैं। पूछ रही हैं कि क्यों बलात्कार के आरोपी आपकी पार्टी से ही जुड़े नज़र आते हैं। और आपके लोग क्यों उन्हें आखिरी दम तक बचाने की कोशिश करते रहते हैं। और क्यों आपने आज तक हमारी सुध नहीं ली।

 

 

इस बनारस ने तो मोदी जी को बहुत ज्यादा परेशान कर रखा है। अभी बीएचयू अस्पताल के हृदय रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर ओम शंकर अनशन पर बैठ गए थे। अरे बैठना है तो मोदी जी की तरह मौन साधना में बैठते, लेकिन नहीं आमरण अनशन पर बैठ गए। वो तो अच्छा हो कि प्रबुद्ध लोगों ने समझाया कि इस सरकार में यूं ही अपनी जान देने से कोई फायदा नहीं। इसलिए जूस पिलाकर उन्हें उठा दिया। वरना वोटिंग के दिन कोई पंगा हो जाता तो और लेने के देने पड़ जाते।

 

मोदी जी की परेशानियों का अंत नहीं। एक जान कितना कुछ करे। चुनाव लड़े, चुनाव लड़ाए, दिन-रात प्रचार करे और ऊपर से फिर जनता अपना काम बताने लगती है, परेशानियां सुनाने लगती है… ये तो बहुत ज्यादती है। नाइंसाफ़ी है।

 

कभी देश की महंगाई, बेरोजगारी उन्हें घेर लेती है कभी कुछ और। वे इन फालतू के विचारों को झटक देते हैं। लेकिन वे ये सोचकर तो परेशान हैं कि चुनाव में उनका कोई भी मुद्दा क्यों नहीं चल पाया। ख़ासकर हर बार आजमाया हुआ नुस्खा हिंदू-मुस्लिम भी नहीं चला। कांग्रेस के घोषणापत्र पर मुस्लिम लीग की छाप से अपना चुनाव अभियान शुरू करने वाले मोदी मंगलसूत्र और भैंस छीनने तक पहुंचे लेकिन कोई मुद्दा कारगर नहीं हुआ।

 

 

पूरे ज़ोर-शोर से अबकी बार 400 पार का नारा दिया लेकिन उसमें उनके ही सांसदों और नेताओं ने संविधान बदलने की बात कहकर पलीता लगा दिया और विपक्ष इसे ले उड़ा कि मोदी जी को 400 सीटें संविधान बदलने के लिए चाहिए। अगर इस बार मोदी सरकार वापस आ गई तो संविधान खत्म हो जाएगा, आरक्षण खत्म हो जाएगा। लोकतंत्र खतरे में आ जाएगा। ऊं..हूं…ये क्या बकवास है।

 

 

 

अपने ही दो अनमोल रतन अंबानी-अडानी के जरिये राहुल गांधी को घेरने की कोशिश की लेकिन वो तीर भी उलटा होकर खुद को ही आ लगा। राहुल के साथ लोग भी पूछने लगे कि मोदी जी अडानी-अंबानी का काले धन से भरा टैंपो कब पकड़ोगे। कब आईटी-सीबीआई-ईडी भेजोगे।

 

 

 

मोदी जी परेशान हैं जो भी मुद्दा उठाते हैं वो बैकफायर कर रहा है। तो उन्होंने अब ख़ुद ही घोषणा कर दी कि वे बॉयलॉजिकल नहीं है, वे तो भगवान का अवतार हैं। लेकिन यह युक्ति भी काम नहीं आई। भले ही हमारा देश बाबा-महात्माओं और देवताओं-अवतारों में विश्वास रखता है, लेकिन लोगों को यह बात कुछ हजम नहीं हुई तो फिर उन्होंने पूजा, ध्यान, साधना की युक्ति निकाली। अब लोग यह पूछने लगे कि जब आप खुद भगवान हैं तो किसकी पूजा और ध्यान करने जा रहे हैं।

 

 

 

दोस्तो, बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि जब बहुत ज्यादा या अनर्गल बोल लो तो कुछ देर चुप बैठना अच्छा होता है। जब मन या चित्त शांत न हो तो मौन साधना करनी चाहिए, यह बात सच है लेकिन इसके उलट यह भी सच है कि जब चित्त शांत न हो तो साधना में भी मन नहीं लगता। और जब आपको चुनाव की चिंता सता रही हो। ख़ासकर चार जून की चिंता कि अगर वास्तव में वापस सरकार में नहीं आए तो क्या होगा। क्या वाक़ई झोला उठाकर हिमालय की तरफ़ जाना पड़ेगा। तो किसका मन ध्यान साधना में लगेगा।

(यह एक व्यंग्य आलेख है। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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