नारनौल में जिला परिषद की बैठक का पार्षदों ने किया सामूहिक बहिष्कार, प्रशासन को दिया 48 घंटे का अल्टीमेटम

नारनौल में जिला परिषद की प्रस्तावित बैठक को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। नारनौल में सोमवार को जिला परिषद की प्रस्तावित बैठक का जिला परिषद के सदस्यों ने सामूहिक रूप से बहिष्कार कर दिया है। जिला परिषद के कुल 19 पार्षदों में से 17 पार्षद इस बैठक में पहुंचे थे। लेकिन सभी पार्षदों ने बैठक में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया। सभी पार्षदों ने प्रशासन के खिलाफ भारी नाराजगी जताई है। पार्षदों ने प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताते हुए बैठक का पूर्ण रूप से बहिष्कार किया। जिला प्रमुख राकेश कुमार भी सभी पार्षदों के साथ इस बहिष्कार में शामिल रहे।
विकास कार्य रोकने का लगाया गंभीर आरोप
पार्षदों ने प्रशासन पर कई गंभीर और बड़े आरोप लगाए हैं। पार्षदों ने आरोप लगाया है कि जिले में विकास कार्य पूरी तरह से ठप पड़े हैं। उनका कहना था कि प्रशासन की उदासीनता के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में जनहित के काम समय पर बिल्कुल नहीं हो पा रहे हैं। पार्षदों ने बताया कि पिछली बैठक में जितने भी प्रस्ताव पास हुए थे, उनमें से अधिकांश प्रस्तावों पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। करीब 300 प्रस्ताव अभी भी लंबित पड़े हुए हैं। इन सभी लंबित प्रस्तावों की अनुमानित लागत 50 से 60 करोड़ रुपये के बीच बताई गई है।
छह महीने से नया विकास कार्य नहीं हुआ शुरू
बैठक का बहिष्कार करने वाले पार्षदों ने अपनी बात रखते हुए और भी खुलासे किए। पार्षदों ने कहा कि पिछले छह महीनों के दौरान जिले में एक भी नया विकास कार्य शुरू नहीं हो सका है। इस स्थिति के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के विकास पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। प्रदर्शन कर रहे सभी सदस्यों ने अधिकारियों की कार्यशैली पर भी बड़े सवाल खड़े किए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जिला स्तर पर अधिकारी लंबे समय तक अपनी जगह पर नहीं टिकते हैं। इसके अलावा जिला परिषद की बैठकों में भी इन अधिकारियों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं होती है।
अधिकारियों की अनुपस्थिति और सामूहिक इस्तीफे की चेतावनी
सोमवार को होने वाली इस बैठक को लेकर एक और बड़ी बात सामने आई। पार्षदों ने कहा कि सोमवार को बुलाई गई इस प्रस्तावित बैठक में भी अधिकांश विभागों के अधिकारी अनुपस्थित रहे। पार्षदों ने अधिकारियों के इस तरह गायब रहने को प्रशासन की एक गंभीर लापरवाही बताया है। इसके साथ ही सदस्यों ने विकास कार्यों के दौरान भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी होने के भी गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्षदों ने प्रशासन को कड़ा अल्टीमेटम देते हुए 48 घंटे का समय दिया है। उन्होंने कहा है कि यदि इन लंबित प्रस्तावों और रुके हुए विकास कार्यों पर कोई ठोस कार्रवाई शुरू नहीं की गई, तो वे सभी सामूहिक रूप से अपने पद से इस्तीफा देने पर विचार करेंगे। पार्षदों का कहना था कि जनता ने उन्हें केवल विकास कार्य करवाने के लिए ही चुना है। लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण वे जनता के प्रति अपना दायित्व ठीक से नहीं निभा पा रहे हैं।