आरती ने 14 अगस्त 2026 को तीन बच्चों को जन्म दिया,पति नीरज 2015 से जेल में बंद

नीरज बवाना का नाम दिल्ली और आसपास के इलाकों में एक चर्चित गैंगस्टर के रूप में जाना जाता है। हाल ही में वह अपनी बीमार पत्नी और नवजात जुड़वां बच्चों से मिलने के लिए तिहाड़ जेल से 5 घंटे की कस्टडी पैरोल पर बाहर आया। दिल्ली पुलिस की कड़ी सुरक्षा के बीच उसे उसके परिवार से मिलवाया गया और समय सीमा समाप्त होते ही वापस जेल भेज दिया गया।
नई दिल्ली/26 अगस्त 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
दिल्ली के कुख्यात गैंगस्टर नीरज बवाना उर्फ नीरज सहरावत 26 अगस्त 2026 को तिहाड़ जेल से कुछ घंटों के लिए बाहर निकले। दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें छह घंटे की कस्टडी पैरोल दी थी। सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक का समय तय था। पुलिस की कड़ी सुरक्षा में उन्हें हरिनगर स्थित घर और मोती नगर के अस्पताल ले जाया गया। वहां उनकी पत्नी और नवजात बच्चे थे।
नीरज बवाना 2015 से जेल में बंद हैं। उन पर कई गंभीर मामले दर्ज हैं। जेल वैन में हत्या समेत दर्जनों केस उनके नाम हैं। कोर्ट ने उन्हें हाई रिस्क अंडरट्रायल माना है। फिर भी मानवीय आधार पर यह पैरोल दी गई।
क्या हुआ था? उनकी पत्नी आरती ने 14 अगस्त 2026 को तीन बच्चों को जन्म दिया। गर्भधारण करीब 27 हफ्ते का था। इमरजेंसी सर्जरी हुई। तीनों में से एक बच्चा जन्म के कुछ घंटों में ही चल बसा। बाकी दो बच्चे मोती नगर अस्पताल के एनआईसीयू में भर्ती रहे। एक वेंटिलेटर पर था, दूसरा सीपीएपी सपोर्ट पर। पत्नी घर पर डिस्चार्ज हो चुकी थीं।
नीरज बवाना ने कोर्ट में अर्जी दी। उन्होंने कहा कि पत्नी और बच्चों की देखभाल के लिए उनकी जरूरत है। इंटरिम जमानत मांगी। ट्रायल कोर्ट ने पहले इनकार कर दिया था। हाई रिस्क कैदी होने और गैंग रिवैलरी के खतरे की वजह से। दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस मनोज जैन ने छह घंटे की कस्टडी पैरोल मंजूर की। पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी गई। अगली सुनवाई 2 सितंबर को तय हुई।
पैरोल के दौरान नीरज बवाना को सिर्फ पत्नी और बच्चों से मिलने की इजाजत थी। डॉक्टरों से बात कर सकते थे। किसी और से मिलना मना था। जेल सुपरिंटेंडेंट को सुरक्षा के पूरे इंतजाम करने के आदेश दिए गए। दिल्ली पुलिस की टीम उनके साथ रही। तिहाड़ से हरिनगर और फिर अस्पताल तक का रास्ता सुरक्षित रखा गया।
नीरज बवाना दिल्ली-एनसीआर के बड़े गैंगस्टर माने जाते हैं। बवाना गांव से ताल्लुक होने की वजह से उन्हें नीरज बवाना कहा जाता है। असल नाम नीरज सहरावत है। छोटी-मोटी चोरी से शुरू करके हत्या, उगाही, जमीन कब्जा जैसे कई मामलों में नाम जुड़ा। गैंग में कई गुर्गे बताए जाते हैं। जेल में रहते हुए भी गैंग चलाने के आरोप लगते रहे हैं।
लॉरेंस बिश्नोई गैंग और अन्य गिरोहों से रिवैलरी की बातें पुरानी हैं। दिल्ली पुलिस उनके आंदोलन पर हमेशा नजर रखती है। पैरोल पर बाहर आने पर सुरक्षा का इंतजाम सीएम लेवल का जैसा रहा। कई पुलिस वाले साथ थे। रास्ते चेक किए गए। अस्पताल और घर के आसपास भी सुरक्षा बढ़ाई गई।
पत्नी आरती से उनकी गुपचुप शादी की बातें पहले भी सामने आई थीं। जेल में बंद रहने के बावजूद परिवार चल रहा था। बच्चे पैदा हुए। कई लोग सवाल उठाते हैं कि जेल में बंद व्यक्ति शादी और बच्चे कैसे कर लेते हैं। कानून के मुताबिक कुछ मामलों में पैरोल या अन्य सुविधाएं मिलती हैं। गरीब कैदियों और बड़े गैंगस्टरों के बीच अंतर की चर्चा भी होती रहती है।
इससे पहले भी नीरज बवाना को पैरोल मिली थी। 2025 में पत्नी की बीमारी के समय छह घंटे की पैरोल दी गई थी। पत्नी के दिमाग में नर्व ब्लॉकेज था। अस्पताल में आईसीयू में भर्ती थीं। तब भी भारी सुरक्षा में ले जाया गया। 2026 में जून में भी दो दिन की पैरोल हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के दौरान मिली थी।
इस बार बच्चे पैदा होने के बाद पिता बनने की खुशी में बाहर आए। लेकिन सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि पत्रकार भी दूर से ही देख पा रहे थे। नीरज बवाना चुपचाप रहे। ज्यादा बात नहीं की। गैंगस्टर की इमेज के बावजूद परिवार से मिलने का मौका मिला।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि ऐसे मामलों में रिस्क बहुत होता है। गैंग वार का खतरा बना रहता है। इसलिए कस्टडी पैरोल में कैदी पुलिस के साथ ही रहता है। स्वतंत्र नहीं घूमता। घर और अस्पताल तक सीमित रहता है। समय पूरा होते ही वापस जेल ले जाया जाता है।
नीरज बवाना के केस में 28 से ज्यादा मामले बताए जाते हैं। 2015 के जेल वैन हत्याकांड में मुख्य आरोपी हैं। तब रोहिणी कोर्ट से तिहाड़ ले जाते समय वैन के अंदर दो कैदियों की हत्या का आरोप लगा। तब से लगातार जेल में हैं। जमानत की कई अर्जियां खारिज हो चुकी हैं।
कोर्ट ने इस बार भी मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। बच्चों की हालत नाजुक थी। पत्नी की मदद के लिए पिता की मौजूदगी जरूरी मानी गई। लेकिन पूर्ण जमानत नहीं दी। सिर्फ कुछ घंटे की राहत दी। पुलिस रिपोर्ट आने के बाद आगे का फैसला होगा।
लोगों में चर्चा है कि बड़े गैंगस्टरों को पैरोल आसानी से मिल जाती है। आम कैदी को इतनी सुविधा नहीं मिलती। कानून सबके लिए एक है। लेकिन परिस्थितियों के हिसाब से कोर्ट फैसला लेता है। परिवार और स्वास्थ्य के आधार पर कभी-कभी राहत दी जाती है।
नीरज बवाना का गैंग दिल्ली के बाहरी इलाकों, नरेला, कश्मीरी गेट और यूपी बॉर्डर तक सक्रिय बताया जाता है। पुलिस उनके गुर्गों पर भी कार्रवाई करती रहती है। हाल के महीनों में भी गिरफ्तारियां हुईं।
पैरोल पर बाहर आने का वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैल गईं। कुछ रिपोर्ट्स में काले कपड़ों का जिक्र आया। सुरक्षा घेरे में वे चुपचाप चले। पत्नी से मिले। बच्चों को देखा। फिर समय पूरा होने पर तिहाड़ वापस लौट गए।
यह घटना दिल्ली की अपराध दुनिया की हकीकत दिखाती है। जेल में बंद रहने के बावजूद परिवार का सिलसिला चलता रहता है। कोर्ट मानवीय आधार पर फैसला लेता है। लेकिन सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है। नीरज बवाना क्यों अपराधी बने, इसकी कहानी पुरानी है। साधारण परिवार से शुरू करके अपराध की दुनिया में पहुंच गए। छोटी उम्र में ही मामलों में नाम जुड़ गया। गैंग बना लिया। रिवैलरी बढ़ी। पुलिस के निशाने पर आए। 2015 के बाद लगातार जेल में हैं।
पत्नी आरती किराए के घर में रहती हैं। बच्चों की देखभाल अकेले कर रही थीं। कोर्ट ने इसी को ध्यान में रखकर पैरोल दी। डॉक्टरों से सलाह लेने और परिवार से मिलने का मौका मिला। दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश साफ था। सिर्फ निर्धारित जगहों पर जा सकते हैं। किसी गैंग मेंबर या बाहरी व्यक्ति से संपर्क नहीं। पुलिस हर कदम पर साथ रहेगी। जेल अधिकारी जिम्मेदार होंगे।
इस तरह की खबरें देशभर में चर्चा में रहती हैं। गैंगस्टर, पैरोल, परिवार और कानून का मिश्रण लोगों को आकर्षित करता है। नीरज बवाना का नाम दिल्ली अपराध जगत में लंबे समय से है। लॉरेंस बिश्नोई जैसे नामों के साथ उनकी तुलना भी होती रही है। पैरोल खत्म होने के बाद वे वापस तिहाड़ पहुंच गए। बच्चों की हालत पर नजर बनी रहेगी। कोर्ट की अगली सुनवाई में पुलिस रिपोर्ट देखी जाएगी। इंटरिम जमानत पर फैसला बाद में होगा।
यह पूरी घटना कब हुई, कहां हुई, कैसे हुई और क्यों हुई, सब साफ है। 26 अगस्त 2026 को दिल्ली में। हाईकोर्ट के आदेश पर। पुलिस सुरक्षा में। पत्नी और नवजात बच्चों से मिलने के लिए। मानवीय आधार पर। नीरज बवाना के साथ उनकी पत्नी आरती और बच्चे जुड़े हुए हैं। परिवार की जरूरत को कोर्ट ने माना। लेकिन अपराधी होने की वजह से पूरी आजादी नहीं दी। कस्टडी में ही बाहर निकाले।
ऐसी खबरें याद दिलाती हैं कि कानून सबके लिए समान है। लेकिन परिस्थितियों के हिसाब से राहत मिलती है। गैंगस्टर हों या आम कैदी, परिवार और स्वास्थ्य के मामले में कोर्ट संवेदनशीलता दिखाता है। सुरक्षा का ख्याल भी रखता है। नीरज बवाना की यह पैरोल दिल्ली की अपराध और न्याय व्यवस्था की एक और मिसाल बन गई। भारी सुरक्षा, सीमित समय और परिवार से मुलाकात। इतना ही।