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मंढियाली कांड की बरसी पर विशेष: प्रदेश का चर्चित किसान आंदोलन था मंढिय़ाली गोलीकांड

October 03, 2018 06:34 PM
सतनाली से प्रिंस लांबा की रिपोर्ट

मंढियाली कांड की बरसी पर विशेष:


प्रदेश का चर्चित किसान आंदोलन था मंढिय़ाली गोलीकांड


71 दिन तक अवरूद्ध रहा था रेवाड़ी-सादुलपुर रेल मार्ग


सतनाली मंडी (प्रिंस लांबा)।

 

हर वर्ष की भांति इस बार भी मंढिय़ाली कांड में शहीद हुए किसानों को श्रद्धांजलि देने के लिए बुधवार 10 अक्तूबर को किया जाएगा श्रद्धांजलि सभा का आयोजन। प्रदेश में बिजली समस्या को लेकर समय-समय पर विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में अनेक आंदोलन हो चुके हैं तथा बिजली समस्या को लेकर सतनाली क्षेत्र के गांव मंढिय़ाली में भी इस तरह का एक आंदोलन पूर्व मुख्यमंत्री चौ. बंशीलाल की सरकार में हो चुका है। यह आंदोलन आज भी मंढिय़ाली कांड के नाम से जाना जाता है। आज भी पुलिस की गोलियों के सामने असहाय किसानों का मंजर याद कर क्षेत्रवासियों की आंखें नम हो जाती हैं तथा इस कांड में शहीद हुए किसानों को याद करने के लिए गांव बारड़ा की शहीद स्मारक पर हर वर्ष की भांति बुधवार 10 अक्तूबर को श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाएगा।



गौरतलब है कि सन् 1997 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चौ. बंशीलाल की सरकार में सतनाली क्षेत्र के गांव नांवा, सोहड़ी, बासड़ी, श्यामपुरा, सतनाली, सुरेहती पिलानियां, सुरेहती मोडियाना, सुरेहती जाखल, डालनवास, गादड़वास, माधोगढ़, डिगरोता, सतनाली बास, ढ़ाणा सहीत दो दर्जन से अधिक गांवों के किसानों ने सरकार से बिजली-पानी की मांग की थी। सरकार ने यहां के किसानों की बिजली-पानी की मांग को नजर अंदाज कर दिया था। जिसके चलते किसानों ने धरने-प्रदर्शन आरंभ कर दिए। जब प्रशासन द्वारा धरने-प्रदर्शनों पर भी ध्यान नहीं दिया गया तो नतीजन मंढिय़ाली कांड का जन्म हुआ और इस गोलीकांड में पांच किसान शहीद हो गए। इस कांड ने सरकार का तख्ता पलट कर रख दिया और इसकी गूंज दिल्ली की संसद तक सुनाई दी थी।



इस आंदोलन में क्षेत्र के अनेक गांवों के किसान बिजली समस्या को लेकर आंदोलन कर रहे थे, उस समय सरकार ने किसानों की मांग को अनसुना कर किसानों पर गोलियां बरसवा दी थी जिसमें पांच किसान शहीद हो गए। इस गोलीकांड से किसानों का आंदोलन तो प्रभावित नहीं हुआ लेकिन मंढिय़ाली कांड की गूंज दिल्ली के गलियारों तक सुनाई दी थी और इस कांड ने उस समय की सरकार का तख्ता पलट कर रख दिया था। यहां के किसानों ने धीरे-धीरे धरने-प्रदर्शन करने आरंभ कर दिए। सरकार व अधिकारियों ने किसानों की मांग और धरने-प्रदर्शनों पर कोई ध्यान नहीं दिया। नतीजन किसानों ने रणनीति तैयार कर मंढिय़ाली कांड को जन्म दिया। मंढिय़ाली कांड के दौरान यहां के किसानों ने रेवाड़ी-सादुलपुर रेल मार्ग को 71 दिन तक अवरूद्ध रखा और इस कांड में पुलिस की गोलियों से पांच किसान शहीद हो गए थे।



मंढिय़ाली गोलीकांड में शहीद हुए किसानों की याद में हर वर्ष सतनाली क्षेत्र के बारड़ा गांव में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाता है। जिसमें विभिन्न राजनैतिक व गैर-राजनैतिक संगठनों के लोग भाग लेकर किसानों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस मौके पर गांव में शहीद स्मारक पर विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। लेकिन बड़े खेद की बात है कि हर वर्ष किसान संगठनों द्वारा शहीद किसानों की बरसी पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित तो की जाती है लेकिन उनके परिवारों की कभी सुध नहीं ली जाती। किसान संगठनों द्वारा कार्यक्रम व खेल प्रतियोगिताओं के नाम पर राजनैतिक व गैर-राजनैतिक संगठनों द्वारा चंदा एकत्रित किया जाता है लेकिन आज तक शहीद किसानों के परिवारों को कभी भी आर्थिक सहायता नहीं दी गई।



मंढिय़ाली कांड में शहीद हुए किसानों की बरसी से एक हफ्ते पहले ही आती है शहीद स्मारक की याद:
यूं तो हर वर्ष 10 अक्तूबर को ही शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित किए जाते हैं लेकिन शहीद किसानों की याद में बनाए गए शहीद स्मारक को सालभर कोई किसान नेता देखने तक नहीं आता। देखरेख न होने के कारण स्मारक में झाड़-झखाड़ इतनी बुरी तरह पैदा हो जाते हैं कि उसके अंदर जाना तक मुश्किल हो जाता है। परंतु किसानों की बरसी से एक हफ्ता पहले शहीदों की प्रतिमाओं व स्मारक की साफ-सफाई पर ही ध्यान दिया जाता है, इसके अलावा शहीद स्मारक को कोई देखने की जहमत तक नहीं उठाता।


फोटो कैप्शन: शहीद हुए पांच किसानों की प्रतिमाएं।

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