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Guest Writer

किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह जी की जयंती (23 दिसंबर) पर विशेष

December 22, 2018 05:44 PM
सज्जन सिंह ढुल

किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह जी की जयंती (23 दिसंबर) पर विशेष


किसानों के हमदर्द थे पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह

चौधरी चरण सिंह भारतीय राजनीति की उस परम्परा के अनमोल मोती हैं जो महात्मा गांधी से शुरू होती है और सरदार पटेल - डा0 लोहिया से होते हुए आगे बढ़ती है तथा जनता के हित एवं सिद्धान्तों के लिए किसी भी ताकत से टकराने से नहीं हिचकती।

उत्तर प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री बनने के बाद देश के प्रधानमंत्री बने थे चौधरी चरण सिंह

चौधरी साहब का जन्म 23 दिसम्बर 1902 को चौधरी मीर सिंह तथा नेत्र कौर के पुत्र के रूप में बुलन्दशहर के एक गाँव नूरपुर की एक साधारण सी झोपड़ी में हुआ था। उस समय देश अंग्रेजों का गुलाम था। बीसवीं सदी के साथ देश का राजनीतिक और सामाजिक वातावरण बदल रहा था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा नूरपुर व जानी गाँव में हुई। डिप्टी इन्स्पेक्टर आफ स्कूल उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अगली कक्षा का भी इम्तहान देने को कहा। वे अगली कक्षा की भी परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर गए।
चौधरी साहब का विवाह 4 जून 1925 को रोहतक जिले के कुण्डल गाँव के कट्टर आर्य समाजी चौधरी गंगाराम की पुत्री व जालन्धर महाविद्यालय से स्नातक गायत्री देवी के साथ हुआ। उन्होंने कस्तूरबा की तरह से चौधरी साहब के सार्वजनिक जीवन में सदैव साथ दिया। जीवन की धूप-छाया, सुख-दुःख और हर कष्टकर मोड़ पर एक दूसरे के सम्बल बने। 1927 में कानून की डिग्री लेने के बाद जीविकोपार्जन और वंचितों को न्याय दिलाने के ध्येय से गाजियाबाद में वकालत करने लगे। 1930 में महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह किया। उस समय इनकी उम्र 28 वर्ष थी स्वदेशी और स्वराज की भावना उनके मन में कूट-कूट कर भर चुकी थी। अंग्रेजों के दमन - चक्र का विरोध करते हुए वे गिरफ्तार हुए, 6 महीने की सजा हुई।
चौधरी चरण सिंह भारतीय राजनीति की उस परम्परा के अनमोल मोती हैं जो महात्मा गांधी से शुरू होती है और सरदार पटेल - डा0 लोहिया से होते हुए आगे बढ़ती है तथा जनता के हित एवं सिद्धान्तों के लिए किसी भी ताकत से टकराने से नहीं हिचकती। चरण सिंह को किसानों के दुःख - दर्द का सबसे बड़ा प्रवक्ता कहा जाय तो गलत न होगा। अपनी सादगी, स्पष्टवादिता और सहज नेतृत्व क्षमता के कारण चौधरी साहब की स्वीकार्यता व लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ने लगी। वे गाजियाबाद के आर्य समाज के सभापति चुने गए। 1948 से 1951 तक राज्य विधान मण्डलीय दल के सचिव रहे। 1951 में वे प्रथम बार उत्तर प्रदेश के सूचना व न्यायमंत्री बनाये गये। प्रथम चुनाव के उपरान्त पंत जी केन्द्र चले गए। पंतजी ने 1950 के अन्त में चौधरी साहब को जमींदारी उन्मूलन विधेयक बनाने की जिम्मेदारी दी थी जो 1 जुलाई 1952 को लागू हुआ। एक झटके में किसान वर्ग, खेतिहर मजदूरों और भूमिहीन ग्रामीणों के होठों पर मुस्कान आ गई। 1967 के चुनाव में कांग्रेस को 198 और विरोधी दलों को 227 सीटें मिलीं। चन्द्रभानु गुप्त और चौधरी चरण सिंह जी में इंदिरा गांधी ने गुप्त जी को अधिक महत्व देकर उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवा दिया। 14 मार्च 1967 को गुप्त जी की ताजपोशी हुई, चरण सिंह जी ने शर्त रखा कि दो कुख्यात व्यक्ति को मंत्री न बनाया जाय, मंत्रीमंडल में उन दोनों विधायकों का नाम देख कर चरण सिंह का क्रोधित होना स्वाभाविक था। सभी विरोधी दलों ने संयुक्त विधायक दल (संविद) बनाया जिसका नेता राम चन्द्र विकल को चुना। डा0 लोहिया की स्वीकृति से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के विधायकों ने चरण सिंह को समर्थन दिया और उत्तर प्रदेश की पहली गैर कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री चौधरी साहब 3 अप्रैल 1967 को बने। उन्होंने पहले जन-कांग्रेस फिर नवम्बर 1967 में भारतीय क्रांति दल बनाया। 1969 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में नवनिर्मित भारतीय क्रान्ति दल को 90 से अधिक सीटें मिली। 17 फरवरी 1970 को चौधरी साहब दोबारा मुख्यमंत्री बने। यह सरकार मात्र 6 महीने 2 अक्टूबर 1970 तक चली। 6 महीने की अल्पावधि में उन्होंने 6, 26338 एकड़ भूमि के सीरदारी पट्टे और 31188 एकड़ के आसामी पट्टे वितरित किए। सीलिंग से प्राप्त जमीनें दलितों और पिछड़ों में बाँटा। अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। उनकी लोकप्रियता का परचम चारों ओर फहराने लगा। तत्कालीन नेताओं ने चौधरी साहब की किसान समर्थक सरकार गिरा दी। अब तक चौधरी साहब राजनीति के एक केन्द्र के रूप में स्थापित हो चुके थे। 29 अगस्त 1974 को उन्होंने केन्द्रीय भूमिका निभाते हुए भारतीय लोकदल का गठन किया। राजनीतिक झंझावतो के मध्य प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने आपात काल आरोपित कर दिया। चौधरी साहब को गिरफ्तार कर तिहाड़ की काल-कोठरी में डाल दिया गया। एमनेस्टी इंटरनेशनल के हस्तक्षेप और गिरते स्वास्थ्य के कारण उन्हें 7 मार्च 1976 में पैरोल पर रिहा किया गया। 11 अगस्त 1974 को बनी भारतीय क्रांति दल (पूर्व नाम जन कोंग्रेस ) 29 अगस्त 1974 स्वतंत्र पार्टी, संसोपा, उत्कल कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक संघ किसान मजदूर पार्टी व पंजाबी खेती बारी यूनियन के साथ विलित होकर भारतीय लोक दल बनी, चरण सिंह जी इसके संस्थापक अध्यक्ष बने। 1977 में लोकसभा के चुनाव हुए। जनता ने जनता पार्टी व जयप्रकाश नारायण, आचार्य कृपलानी चौधरी चरण सिंह, राजनाराण की टोली में अपना विश्वास व्यक्त करते हुए भारी अन्तराल से जिताया। 298 लोकसभा सीटें अकेले जनता पार्टी जीती, सहयोगी दलों को मिलाकर यह संख्या 345 पर पहुँच गई। कांग्रेस को मात्र 153 जगह जीत हासिल हुई। जेपी, कृपलानी की इच्छा थी बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री बनें, चौधरी साहब ने मोरारजी पर सहमति व्यक्ति की । अन्ततोगत्वा 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई जी भारत के प्रधानमंत्री बने। चौधरी चरण सिंह ने गृह व वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी ली जो उनके कद, योगदान व योग्यता के अनुरूप थी। कांतिशाह व राजनारायण प्रकरण से मोरारजी व चरण सिंह का मतभेद बढ़ता गया जो चरण सिंह जी के इस्तीफा देने केे बाद भी कम नहीं हुआ। 28 जुलाई को चौधरी साहब प्रधानमंत्री बने। चौधरी साहब उत्तर प्रदेश में नेताजी के कार्यों से काफी प्रसन्न रहते थे, दोनों की सोच एक जैसी होना भी इसका कारण हो सकता है। 14 जनवरी को दिल्ली में चौधरी साहब की सरकार गिरी, दोबारा इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं।
चौधरी साहब प्रधानमंत्री तक हुए दोनों ने लम्बा सतत संघर्षमय लोकजीवन जिया और देश के नवनिर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 1967 से लेकर 1987 तक के दौर को चरण सिंह युग की संज्ञा दी जा सकती है। भले ही वे देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री व उत्तर प्रदेश के दो बार के मुख्यमंत्री रहे हों लेकिन उनका नाम, कद, और प्रतिष्ठा हमेशा पदों से ऊपर रहे हैं।

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