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महागठबंधन.राजनैतिक दलों का देश हित चुनाव जीत कर सत्ता हासिल करने तक ही सीमित है?

January 22, 2019 09:50 AM
डॉ नीलम महेंद्र

 

महागठबंधन देश हित या स्वार्थ

इन राजनैतिक दलों का देश हित चुनाव जीत कर सत्ता हासिल करने तक ही सीमित है?
‘’मंजिल दूर है, डगर कठिन है लेकिन दिल मिले ना मिले हाथ मिलाते चलिए", कोलकाता में विपक्षी एकता के शक्ति प्रदर्शन के लिए आयोजित ममता की यूनाइटिड इंडिया रैली में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का यह एक वाक्य "विपक्ष की एकता" और उसकी मजबूरी दोनों का ही बखान करने के लिए काफी है। अपनी मजबूरी के चलते ये सभी दाल इस बात को भी नजरअंदाज करने के लिए मजबूर हैं कि यह सभी नेता जो आज एक होने का दावा कर रहे हैं वो सभी कल तक केवल बीजेपी नहीं एक दूसरे के भी "विपक्षी" थे। सच तो यह है कि कल तक ये सब एक दूसरे के विरोध में खड़े थे इसीलिए आज इनका अलग आस्तित्व है क्योकि सोचने वाली बात यह है कि अगर ये वाकई में एक ही होते तो आज इनका अलग अलग वजूद नहीं होता। दरअसल कल तक इनका लालच इन्हें एक दूसरे के विपक्ष में खड़ा होने के लिए बाध्य कर रहा था, आज इनके स्वार्थ इन्हें एक दूसरे के साथ खड़े होने के लिए विवश कर रहे हैं। क्योंकि इनमें से अधिकांश भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं जैसे ममता शारदा चिटफंड घोटाला, अखिलेश खनन घोटाला, केजरीवाल राशन घोटाला लालू चारा घोटाला आदि। इसलिए ये सभी केंद्र में कैसी और कौन सी सरकार चाहते यह समझा जा सकता है। शायद इसलिए यह रैली देश के लोगों में चर्चा का विषय बन जाती है जब लालू के बेटे तेजस्वी यादव (जिनके पिता के कार्यकाल में बिहार जंगल राज किडनैपिंग फिरौती और भ्रष्टाचार के लिए मशहूर था) या अरविंद केजरीवाल सरीखे लोग मंच पर मोदी से देश को बचाने के नारे लगाते हैं या फिर ममता बनर्जी जैसी नेता जिनके राज में बंगाल के पंचायत जैसे चुनाव का नामांकन भी बंदूक की नोक पर होता हो, लोकतंत्र को बचाने की दुहाई देती हैं। क्या ये राजनेता भारत की जनता को इतना मूर्ख समझते हैं कि वो समझ नहीं पाएगी कि असल में लोकतंत्र और संविधान नहीं बल्कि खुद इनका आस्तित्व खतरे में हैं?
दरअसल राजनीति में जो दिखता है या जो दिखाया जाता है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण वो होता है जो दिखता नहीं है या दिखाया नहीं जाता। जैसे,
1, ममता ने इस रैली के बहाने जो शक्तिप्रदर्शन किया है वो "कथित बाहरी विपक्ष" यानी भाजपा के लिए नहीं बल्कि "अंदरूनी विपक्ष" यानी प्रधानमंत्री पद के अन्य दावेदारों के लिए था। मोदी तो बहाना था, असली मकसद तो मायावती को अपनी ताकत दिखाना था। उन्हें उस खुमारी से जगाना था जो उन्हें यूपी में सपा के साथ गठबंधन करके होने लगी थी। बसपा और सपा के गठबंधन के बाद भाजपा और मोदी की नींद कितनी उड़ी यह कहना तो मुश्किल है लेकिन ममता की इस रैली से मायावती की नींद अवश्य उड़ गई होगी।

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2, विभिन्न क्षेत्रीय दल विपक्षी एकता के जितने भी दावे करे वो खुद भी अपने इस दावे के खोखलेपन को जानते हैं।क्योंकि वो जानते हैं कि कांग्रेस को अपने साथ मिलाए बिना विपक्षी एकता की बात बेमानी होगी लेकिन कांग्रेस को अपने साथ मिलाकर एकता की बात करना बेवकूफी ही नहीं आत्मघाती भी होगी। इस बात को यूपी में बुआ बबुआ ने अपने गठबंधन में कांग्रेस को बाहर रख कर सिद्ध कर दी है और अन्य राज्यों के क्षेत्रीय दलों को भी दिशा दिखा दी है।
3, ममता की इस रैली में 23 विपक्षी दलों के नेताओं की मौजूदगी उतनी अहम नहीं है जितनी कुछ नेताओं की गैरमौजूदगी। क्योंकि ये वो नाम हैं जिन्हें ममता तो क्या ये 23 विपक्षी दल भी अनदेखा नहीं कर सकते। आइए इन नामों पर गौर फरमाएँ, सोनिया गांधी राहुल गांधी मायावती सीताराम येचुरी के चंद्रशेखर जगनमोहन रेड्डी नवीन पटनायक।
4, यहां यह याद करना भी जरूरी है कि कुछ समय पहले जब सोनिया ने बीजेपी के खिलाफ गठबंधन करने की कोशिश की थी, तब भी कुछ नाम गैरहाजिर थे, माया ममता और अखिलेश।
5, लेकिन याद कीजिए, कुछ समय पहले ही कर्नाटक में कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में जब मंच पर एक साथ मौजूद सोनिया माया ममता की एक दूसरे को गले लगाती उन तस्वीरों ने मीडिया में काफ़ी सुर्खियाँ बटोरी थीं। तो अब सबसे एहम सवाल यह है कि वो विपक्ष जिसकी कथित एकता की तस्वीरों में ही चेहरों का स्थायित्व नहीं है, वो देश को अपनी एकता का संदेश और स्थायित्व देने में कितना सफल हो पाएगा।
6, क्योंकि आज जब यूनाईटिड इंडिया के मंच पर ये सभी विपक्षी दल एक होते हैं तो अपने भाषणों से जनता को अपने "एक होने" का मकसद तो सफलता पूर्वक समझा देते हैं, "मोदी को हटाना है"। लेकिन उस मकसद को हासिल करने के बाद देश के लिए अपना एजेंडा तो छोड़ो अपने नेतृत्व का नाम तक नहीं बता पाते।


7, जब ममता उस मंच से यह कहती हैं कि हमारे यहाँ हर कोई लीडर है तो क्या उनके पास कांग्रेस का कोई इलाज है? क्योंकि अगर कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरती है, तो राहुल अपनी दावेदारी पहले ही जाहिर कर चुके हैं। अगर विपक्षी दल राहुल को पीएम स्वीकार नहीं करें तो कांग्रेस एक बार फिर मनमोहन पर दांव खेल सकती है। ऐसी स्थिति का सामना वो विपक्ष कैसे करेगा जिसमें सभी लीडर हैं यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

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लेकिन इन राजनैतिक सवाल जवाबों से परे जब देश का आम आदमी इन विपक्षी दलों को अपने अपने मतभेदों को भुलाकर "देशहित" में एक होते हुए देख रहा है तो सोच रहा है कि क्या इन राजनैतिक दलों का देश हित चुनाव जीत कर सत्ता हासिल करने तक ही सीमित है? जिस आम आदमी की दुहाई देकर ये दल आज महागठबंधन बनाने की बात कर रहे हैं क्या इन्होंने कभी इस आम आदमी के हित के लिए गठबंधन किया है जब उसे वाकई में जरूरत थी? क्या देश के किसी हिस्से में भूकंप बाढ़ सूखा या फिर अन्य किसी प्राकृतिक आपदा में इस प्रकार की एकता दिखा कर उसकी मदद के लिए इकट्ठे हुए है? क्या ऐसे मौकों पर खुद आगे बढ़ कर देश हित में देश सेवा की है? इन सभी क्षेत्रीय दलों के देश हित की दास्तान तो खुद इनके प्रदेश बयाँ कर रहे हैं जहाँ सालों ये सत्ता में थे या हैं। पश्चिम बंगाल हो बिहार हो या उत्तर प्रदेश, जनता सब जानती है इसलिए मंद मंद मुस्कुराती हुए पूछती है कि झूठ क्यों बोलते हो साहेब, यह महागठबंधन नहीं ये तो महाठगबंधन है बाबू।!!

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