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Guest Writer

पुलवामा :मर्यादाहीन बयानों की बढ़ती राजनीति

February 24, 2019 10:03 AM
अटल हिन्द ब्यूरो

पुलवामा :मर्यादाहीन बयानों की बढ़ती राजनीति
सुरेश हिन्दुस्थानी
पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद देश में कुछ दिनों तक जिस प्रकार की बयानबाजी की गई, उससे यही लग रहा था कि देश के सभी राजनीतिक दल राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर गंभीर रुख अपना रहे हैं। वास्तव में यह एक ऐसा मामला है, जिस पर सारे देशवासियों का एक स्वर होना चाहिए, लेकिन हमारे देश में राजनीतिक विसंगतियां भी साथ-साथ चलती हैं। सरकार के विरोधी राजनीतिक दलों से जैसे बयानों की उम्मीद की जा रही थी, लगभग वैसा ही प्रदर्शित होना प्रारंभ हो गया है। जहां पूरा विश्व पुलवामा हमले पर भारत के प्रति समर्थन का भाव व्यक्त कर रहा है, वहीं हमारे देश के राजनेता सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे बयानों के चलते अप्रत्यक्ष रुप से दुश्मन देश को ही समर्थन मिलता है। यह बात सही है कि पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान को सबक सिखाना बहुत ही आवश्यक था, लेकिन इस हमले की प्रतिक्रिया शीघ्र हो और बिना किसी तैयारी के हो, तब विपक्षी दलों के नेताओं के बयानों को जल्दबाजी ही कहा जाना उचित होगा।

 


यह सार्वभौमिक सत्य है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले पर किसी भी प्रकार की राजनीति नहीं की जानी चाहिए, लेकिन भारत में पहले भी खुलकर राजनीति होती रही है और आज भी हो रही है। विपक्षी राजनीतिक दलों का यह कदम निश्चित रुप से सरकार को कमजोर बताने का एक ऐसा खेल है, जो दुश्मन देश को यही संदेश देता है कि भारत सरकार कमजोर है और उससे विदेशी शक्तियां अनुचित लाभ उठा सकती हैं। यह बात भी सही है कि बड़ी कार्यवाही करने के लिए ठोस योजना बनाई जाती है, लेकिन हमारे राजनेताओं को यह उक्ति समझ में नहीं आ रही। वह तत्काल कदम उठाने की ओर बाध्य कर रहे हैं। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि तात्कालिक प्रतिक्रिया कभी कभी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होता है। पाकिस्तान को सटीक उत्तर देने के लिए अच्छी और ठोस योजना की आवश्यकता है।

 


हम जानते हैं कि कांगे्रस नेता और पंजाब सरकार में मंत्री पर विराजमान पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी नवजोत सिंह सिद्धू को भारत की जनता ने इस तरह से बेनकाब किया है कि अब वह देश में कहीं भी जाने की स्थिति में नहीं हैं। उन पर सवाल उठ रहे हैं कि वह जो शांति का पैगाम लेकर आए थे, उसके परिणाम स्वरुप पुलवामा में हमला हो गया। आज देश की जनता आक्रोशित है और हमारे यहां बयानों की राजनीति प्रारंभ हो गई है। भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान का पानी रोका जाना भी देश के कई नेताओं को अच्छा नहीं लगा है। यह बात सही है कि पानी रोकने की प्रक्रिया बहुत ही लम्बी है, लेकिन इस कदम से भारत सरकार के इरादों का पता चलता है। पानी बंद कब होगा, सवाल इस बात का नहीं है, सवाल तो यह है कि जब पानी बंद हो जाएगा तो पाकिस्तान की स्थिति क्या होगी।यह भारत सरकार का सबसे बड़ा कूटनीतिक कदम है।

 


राजनेता जिस प्रकार से भाषाई मर्यादाओं का उल्लंघन कर रहे हैं। वह कहीं न कहीं सरकार के कदमों को रोकने जैसे ही लग रहे हैं। कांगे्रस नेता रणदीप सुरजेवाला का बयान पूरी तरह से सरकार पर हमले करने जैसा ही है। कांगे्रस की ओर से यह बयान एक प्रकार से सेना की रणनीति में अवरोधक बनने का काम कर रहा है। क्योंकि जब केन्द्र सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए सेना को पूरी छूट दे दी है, तब यह तो मानना ही पड़ेगा कि सेना योजना भी बना रही होगी। हम यह भी जानते हैं कि कांगे्रस ने सेना की कार्यवाही पर कई बार सवाल उठाने का दुस्साहस किया है। पाकिस्तान में सीमा पर स्थिति आतंकी केन्द्रों पर भारत द्वारा की गई सर्जीकल स्ट्राइक पर भी कांगे्रस ने गंभीर सवाल सठाए थे। वास्तव में कांगे्रस की इस प्रकार की राजनीति देश के साथ विश्वासघात करने जैसा ही है।

 


यह बात भी सही है कि पुलवामा आतंकी हमले के बाद देश की जनता भी अब पाकिस्तान को माफ करने के मुद्रा में नहीं है। यहां तक पाकिस्तान से सारे संबंध तोडऩे के भी स्वर मुखरित हो रहे हैं। मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्जा वापस लेने का कदम जन भावनाओं के अंतर्गत उठाया गया कदम ही है, इसके बाद अब पानी रोकने का निर्णय लिया गया है। लेकिन हमारे देश के राजनेताओं को इस सत्य से परिचित होना ही चाहिए कि केन्द्र सरकार ने अपनी कार्यवाही प्रारंभ कर दी है। यह दोनों कदम छोटे कदम नहीं कहे जा सकते हैं।

 


जब पूरा देश पाकिस्तान से संबंध नहीं रखने की बात कर रहा है, तब राजनेताओं को आपत्तिजनक बयान देने से परहेज करना चाहिए। राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव जहां भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच को नहीं रोके जाने की वकालत करते दिख रहे हैं, वहीं कांगे्रस के मनीष सिंघवी का स्पष्ट कहना है कि ऐसे मैच नहीं होने चाहिए। इस बयान से यह साफ जाहिर होता है कि हमारे यहां सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की राय व्यक्त की जा रही हैं। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि जिनको राष्ट्रीय मर्यादाओं की जानकारी नहीं होती, वही नकारात्मक बयान देते हैं। आज मुद्दा क्रिकेट के खेल का नहीं है, बल्कि राष्ट्रीयता का मामला है। जब जनता चाह रही है कि पाकिस्तान से किसी भी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहिए, तब एक मात्र खेल के बारे में सोचना ठीक नहीं कहा जा सकता।

 


दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि विपक्ष के नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश यात्राओं पर भी सवाल उठा रहे हैं, लेकिन क्या ये विपक्ष के नेता ये भी जानने का प्रयास करेंगे कि मोदी की यह विदेश यात्रा किस लक्ष्य पर केन्द्रित है। दक्षिण कोरिया में मोदी ने साफ शब्दों में आतंकवाद पर ही प्रहार किया है, प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा पाकिस्तान को घेरने के लिए ही है। इसलिए भारतीय राजनेताओं को ऐसे हर किसी कदम का समर्थन ही करना चाहिए, जो आतंकवाद के विरोध में हो।

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