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चिंतन: बेबसी में जी रहे हैं अनेक जीवन

February 25, 2019 02:16 PM
अटल हिन्द ब्यूरो

चिंतन: बेबसी में जी रहे हैं अनेक जीवन
राज शेखर भट्ट
बच्चे पैदा होते हैं और समय के साथ-साथ किशोरावस्था तक पहुंच जाते हैं। किशोरावस्था में पहुंचने वाले ऐसे हजारों बच्चे हैं, जिनका बचपन बेबसी में बीत रहा है। सरकार लाख दावे करले लेकिन बचपन आज भी बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। बालश्रम पर हालांकि पाबंदी है, परन्तु हालात कुछ और ही इशारा करते हैं। श्रम विभाग के आंकडे़ अलग कथा सुनाते हैं और वास्तविक कुछ और ही होती है।
बड़ा होने के बाद हर व्यक्ति चाहता है कि उसके बच्चों के हाथों में खिलौने हों। उसका वक्त संगी-साथियों के साथ गुजरे, लेकिन ऐसा होता नहीं हैं, नियति उसे कहां धकेल देती है। हम केवल बालश्रम की वास्तविकता की बात करें तो स्थिति भयावह दिखती है। अफसोस इस बात का है कि जिम्मेदार कौन है ऐसी स्थितियों का? शासन-प्रशासन और सरकार इस बचपन को संवारने के प्रति कतई गंभीर नजर नहीं आते। अनेकों तथ्य ऐसे भी हैं कि भुखमरी, गरीबी और बेरोजगारी के कारण बालश्रम तो है ही। वहीं दूसरी ओर अपने बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए अनेक लोग गलत से गलत काम करने में पीछे नहीं रहते।
बाल श्रम विभाग के कई अधिकारी श्रम महकमे में उन कामों को करने में अधिक दिलचस्पी दिखाते हैं, यहां से उनकी जेबें गर्म होती हैं। बचपन को जकड़ी बेड़ियां कब खुलेंगी, यह तो कहा नहीं जा सकता। मगर, बड़ा सवाल यह है कि सिर्फ बाल श्रमिकों के चिह्नीकरण भर से ही बचपन में गहरा कुहासा नहीं छंटने वाला है। यहां यह बता दें कि भारत सरकार के कानून के अनुसार 14 साल से बड़ी उम्र के कामगार को श्रम कानूनों का उल्लंघन नहीं माना जाता। विभाग 14 से 18 साल के बाल श्रमिकों को काम करने पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता।
जब तक आम आदमी स्वयं जागरूक नहीं होता, तब तक बालश्रम ही नहीं बल्कि अन्य आराजक स्थितियों में सुधार आना मुश्किल है। कितना दुखद है कि किस तरह बचपन किताबों की जगह कहीं चाय, कहीं केतली थामे है तो कहीं झूठन साफ कर रहा है। अधिकतर यही सामने आता है कि बाल श्रम के आंकड़ों में बालश्रम बहुत कम दिखता है लेकिन आम आदमी स्वयं देखता है कि हजारों बाल श्रमिक हैं। क्या यह सब विभाग में तैनात उच्चाधिकारी की संवेदनशीलता के कारण होता है।
श्रम मंत्रालय और श्रम विभाग के आंकड़ों की कुशलता को तो पूरे भारतवर्ष में होटल, ढाबों और ठेलियों में एक आम नागरिक स्वयं देख सकता है। जिससे साफ होता है कि कितना बालश्रम है और कितना नहीं। बेशक, लगभग प्रत्येक राज्य में बाल मजदूरों के चिन्हीकरण में विभाग ने गैर सरकारी संगठनों को साथ लेकर अप्रत्याशित तेजी दिखाई है। लेकिन अभी भी सवाल जस का तस मुंह बांए खड़ा है। क्योंकि, बचपन को जकड़ी मजदूरी की बेड़ियां तभी हट पाएंगी, जब उन्हें उचित शैक्षिक माहौल मिलेगा और वह बेहतर भविष्य की राह पर अग्रसर होंगे।
सड़कों पर भीख मांगने वाले बच्चों के जीवन को बचाने के लिए शुरू की गयी हैं, लेकिन हुआ क्या? मामले तो जस के तस हैं। बस स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की याद भी केवल एक दिन के लिए ही आती है और सोशल मीडिया का बाजार गर्म रहता है। केवल इसी तरह सुधरेंगी स्थितियां, क्या यही है स्वतंत्रता, क्या यही है हमारा गणतंत्र कि भारत के झण्डे के साथ अपनी फोटो चिपकाकर शुभकामनायें दे दी जायें और सुधार हो जाय।

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