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Guest Writer

दिल बहलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है

November 07, 2017 02:11 PM
कृष्ण कुमार निर्माण
दिल बहलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है
 
आइए!क्यों न रोते रोते जश्न मनाया जाए।क्या कहा नहीं?अरे क्यों भाई क्यों?जश्न तो मनाया जाना ही चाहिए।आखिर नोटबन्दी की वर्षगाँठ जो आ गयी है।क्या है जनाब बरसी?चलो बरसी ही मान लो।आखिर कुछ तो आया ही है साहब, गया तो नहीं ना।हर आने वाली चीज पर जब जश्न मानते हैं तो इस बरसी, अरे नहीं यार इस पहली वर्षगाँठ पर भी तो जश्न मनाया जा ही सकता है पर ये रोते रोते जश्न मनाने वाली बात हजम नहीं हुई कुछ।अरे हाँ, कभी रोते रोते जश्न मनाया जा सकता है क्या?जरूर मनाया जा सकता है जी।देश बदल रहा है।
(SUBHEAD)
सब कुछ बदल रहा है।फिर रोते रोते जश्न क्यों नहीं मनाया जा सकता जी।मनाया जा सकता है जी।आप देखिए आज कुछ लोग पूरे होश ओ हवास के साथ जश्न मनाएंगे कि ये नोटबंदी की पहली वर्षगाँठ है और दूसरी तरफ कुछ लोग इसे पहली बरसी के तौर पर भी मनाएंगे और पता नही कैसा कैसा मातम करेंगे?अरे याद आया, मित्रों........।चोंकिए मत....अरे यार हम वो नहीं हैं जो आप समझ रहे हैं।हम तो लेखक हैं जी।हम तो कर ही क्या सकते हैं सिर्फ लिख सकते हैं वैसे आम जन की भाषा में इसे बकना भी कहा जाता है।याद आया आम जन।अरे ये वो आम आदमी की पार्टी वाला आम जन नहीं है ना, वो तो आजकल खास से भी कुछ थोडा ज्यादा हो चुका है।सही पकडे हैं।आपको पता है ऐसे एक आम आदमी की तो गाडी भी चोरी हो गयी थी जी और दो दिन बाद ही चोर उस तथाकथित गाड़ी को घर तक अदब से छोड़कर गया।बड़ा दिल दुखी था उस चोर का साहब।अंदर से बिल्कुल टुटा हुआ था।शायद यही सोच रहा होगा कि हाय!मैं किस आम आदमी की गाड़ी चोर कर लाया।बेचारा आम आदमी जिसके पास सी एम होते हुए भी पुरानी गाड़ी है और वो भी आजकल के ज़माने के अनुसार नहीं।
अरे!चल छोड़ो यार जाने भी दो।कार मिल गई।आम आदमी को बस और क्या चाहिए।
यहाँ तो पूरा एक साल हो गया।जश्न मनाने की पूरी तैयारी हो रही है।उधर कुछ लोग बरसी मनाने की तैयारी में भी हैं बट एक हम हैं, जो इसी उधेड़बुन में हैं कि जश्न मनाएं या फिर बरसी मनाएं।
क्या कहा साहब?वो बात याद आ रही है आपको क्या?मित्रों, .......अरे!कितनी बार कहा है डरा मत करो, सुना करो।अच्छा सिर्फ पचास दिन दो, भारत के भाग्य को बदल दिया जायेगा वरना मुझे चाहे जो सजा दे लेना।
क्या बात करते हो साहिब?हमें पता राजनीति में हर बात सच्ची नहीं होती, हर बात क्या शायद कोई भी बात सच्ची नहीं होती?खासकर देश से जुड़ी, गरीबों से जुड़ी, बेरोजगारों से, किसानों, महिलाओं, मजदूरों, आम जनता से जुड़ी कोई भी बात सीधी और सच्ची नहीं होती।वो तो जुमला होती है जुमला।और जुमले राजनीति में चोली दामन का संग साथ रखते हैं जी।
अब देखो क्या आपके खातों में पंद्रह लाख आये?क्या आपके जन धन खाते भर गए?क्या हर साल करोड़ रोजगार मिल पाएं?जिसकी वर्षगांठ हम मना रहे हैं उसके बाद क्या काला धन आया?क्या अर्थदशा सुधरी?क्या आतंकवाद में कमी आई?क्या अनैतिक काम रुके?क्या सब कुछ डिजिटल हो गया?
अब देखो जी आम जन के लिए आप झट से आँकड़े उठा लाएं जी।क्या करें इन आँकड़ो का, इन्हें चाटे, बिछाएं, पहने, ओढ़े या खाएँ साहब।आँकड़ो से भूख नहीं ना मिटती, आँकड़ो से रोजगार नहीं ना मिलता।गया था एक भाई सब्जी की दुकान पर प्याज टमाटर लेने, सारे आंकड़े बता डाले उसको बट क्या मजाल कि सब्जीवाला टस से मस हुआ हो।और सच पूछिये तो टमाटर प्याज खरीदने में ही जान निकल गयी और आम जन द्वारा डेली यूज़ किया जाने वाला गैस सिलेंडर की कीमतें उछल रही हैं सब्सिडी छोड़ने के बाद भी, जिसका बढ़ चढ़ कर प्रचार किया जा रहा है, पेट्रोल तो आग की तरह भड़क ही रहा है  लगातार और क्या कहें साहिब ऊपर से ये जी एस टी।इसकी भी वर्षगांठ मनेगी गया।बता देना समय से पहले ही ताकि हम सब तैयारी करके रखें जी ताकि हम भी जश्न मना सके।खेर, जश्न मनाने में बुराई भी क्या है?कम से कम रोते रोते जश्न तो मनाया जा ही सकता है जनाब।हम तो अपनी ताजा रचना का मतला पूरे मजे से गुनगुना रहे हैं जी----
रोते रोते भी जश्न मनाया जाए।
दिल को ऐसे भी बहलाया जाए।।
चलिए, सब एक साथ जश्न मनाते हैं वैसे जश्न मनाने में कोई बुराई तो नहीं ना।खेर, इनको इनका जश्न मुबारक, उनको उनका काला दिवस मुबारक।हमें तो करके खाना है और पछताना है।

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