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राहुल के सामने बड़ी चुनौती।

December 14, 2017 09:12 AM
लखनऊ संदीप पाल
राहुल के सामने बड़ी चुनौती।
(by संदीप पाल )
 
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी के साथ कांग्रेस में राहुल युग की शुरूआत हो गई। वैसे तो अध्यक्ष के रूप में वह सोनिया गांधी के वारिस उसी दिन बन गये थे जिस दिन उन्होने सक्रिय राजनीति में आने का फैसला लिया था। दो बार से यूपी की अमेठी संसदीय सीट से संसद पहुचने वाले व भविष्य के कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी क्या देश के नेता हो पायेंगे। यह एक बड़ा सवाल है। 
कांग्रेस अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी की ताजपोशी उस समय हुई है। जब आज कांग्रेस अपने राजनीतिक सफर के सबसे खराब दौर से गुजर रही है। या यूं कहे की बहुत कमजोर हो चुकी है। हालात यह तक पहुंच चुके है कि चुनावों में देश के तमाम राज्यों की जनता उसे लगातार नकारती जा रही है। खासकर उन राज्यों में जहां एक तीसरा मजबूत दल है उसे मुंह की खानी पड़ी। 
अब देखने वाली बात यह होगी कि राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस वह कांग्रेस रहेगी, जैसी की सोनिया गांधी के समय में थी। 
उम्मीद यही है कि राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी सम्भालने के साथ ही सोनिया गांधी सक्रिय राजनीति से दूर हो जाएंगी। वैसे भी राहुल गांधी का अध्यक्ष बनना मात्र औपचारिकता ही है। उनके सामने कभी कोई चुनौती थी ही नही। 
एक समय था जब कांग्रेस पूरी तरह से सोनिया गांधी परिवार पर पूरी तरह से आश्रित था। क्योंकि शरद पवार जैसे नेता कांग्रेस अध्यक्ष पद पर अपना दावा पेश कर सकते थे। पहले ही बाहर हो चुके थे और माधव राव सिंधिया व राजेश पायलट जैसे नेता इस दुनिया से विदा हो चुके थे।
एक बार राहुल गांधी ने खुद ही अपने मन की बात कही थी कि वह चाहते तो वह प्रधानमंत्री बन सकते थे। उनकी इस बात का सभी ने खूब मजाक भी बनाया गया था। लेकिन राहुल गांधी के इस बयान में सच्चाई थी जब 2004 में सोनिया गांधी ने खुद प्रधानमंत्री नहीं बनने का निर्णय कर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनवा दिया था। यदि वह चाहती तो राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं और कोई उनको रोक भी नहीं सकता था। उस दौरान लालू प्रसाद यादव जैसे नेता उन्हे कंधे पर उठा कर ने केवल धूमते, बल्कि जयकारा भी लगाते। सच्चाई यह भी है कि तब राहुल गांधी अमेठी से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतकर आये थे। इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती, क्योंकि उनके पिता राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने थे। उस समय लोकसभा सदस्य के रूप में उनका पहला कार्यकाल था। संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बाद अमेठी लोकसभा की सीट खाली हो चुकी थी, राजीव वहां से जीतकर संसद पहुंचे थे। उसके कुछ समय बाद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में इंदिरा गांधी की हत्या 31 अक्टूबर 1984 को कर दी गई थी और राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बना दिया गया। कहीं से भी किसी प्रकार का कोई विरोध स्वर नहीं उठा। सभी ने एकमत उनका समर्थन किया। उस समय गांधी परिवार कोई भी सदस्य उन्हे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाने वाला नहीं था। जबकि 2004 में सोनिया गांधी के एक इशारे पर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जा सकता था। उन्होने ऐसा नहीं किया। सोनिया ने उस समय राहुल को प्रधानमंत्री योग्य नहीं समझा। सोनिया गांधी की इस दूरदर्शिता का फायदा कांग्रेस को पांच साल बाद मिला और कांग्रेस फिर से केन्द्र की सत्ता में आई।  तथा मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया। वह बात अलग है कि 2009 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद उस पर भ्रष्टाचार के बडे़ बडे़ आरोप लगे। लेकिन कांग्रेस मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि ढाल की तरह इस्तेमाल करने की नाकाम कोशिश करते रही।
सोनिया गांधी के नजरीए से देखा तो उन्होने ने राहुल गांधी का राजनैतिक अनुभव प्राप्त करने के लिए प्राप्त समय दिया और उनके नेतृत्व अनेक चुनवा भी लड़े गए। हालंकि कुछ एक स्थानों छोड़ा ज्यादातर जगहों कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके राजनीति में ऐसा माना जाता है कि किसी नेता के लिए जीत के ज्यादा फायदेमंद हार का अनुभव होता है। तथा के अनुभव का सही विश्लेषण कऱ जीत का मार्ग प्रशस्त करता है।
वर्तमान समय में कांग्रेस हाशिए पर चली गई है और उसे संजीवनी की जरूरत है ऐसे में राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष पद पर ताजपोशी किसी अग्नि परीक्षा से कम नही है। राहुल को मारी हुई कांग्रेस को जिन्दा करने के लिए संजीवनी बूटी का जुगाड़ तो करना ही पड़ेगा।
2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने जिस प्रकार से देश में चुनावी कैम्पेनिंग की उससे पूरे देश में चुनाव प्राचार के परम्परागत तरीके को पूरी तरह बदल कर रख दिया। बीजेपी ने चुनाव प्रचार की जो सोशल मीडिया का बेहतरीन उपयोग किया, और 2014 के लोकसभा चुनाव में यह बीजेपी का ब्रहास्त्र साबित हुआ और दो दशकों से केन्द्र की सत्ता पर काबिज कांग्रेस उसके प्रहार से चारों खाने चित हो गई। यहां तक की कि उसने सोशल मीडिया के सहारे कांग्रेस अध्यक्ष को पप्पू तक बना डाला। उसके बाद से राहुल गांधी अभी तक उक्त टाइटल से अपना पीछा नहीं छूड़ा सके हैं। 
समय के साथ साथ और अनुभव के आधार पर कांग्रेस अध्यक्ष अब जाकर कही एक अच्छे वक्ता के रूप दिखाई पड़ने लगे है। ऐसा की कुछ गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी की रैलियों में दिये गये भाषण को सुनने से पता चलता है। अब प्रतीत होता है कि राहुल गांधी राजनैतिक रूप से परिपक्व हो गए है। वह समझ चुके हैं कि देश की राजनीति में ओबीसी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। बिना ओबीसी के सत्ता के शिखर तक नहीं पहुंचा जा सकता है। इसलिए उन्होने गुजरात मंे पाटीदार युवा नेता हार्दिक पटेल व जीगनेश ठाकुर समेत दूसरे अन्य नेताओं को अपने पाले में कर लिया है जो कि हालहि में गुजरात आन्दोलन से निकाल कर आये हैं। मोदी को भी राहुल उन्ही के अंदाज में जवाब दे रहे हैं। राहुल के इस रूप से बीजेपी खेमे में खलबली मच गई। अब गुजरात चुनाव में विकास को पीछे छोड़ते हुये अपशब्द, औरंगजेब, बाबर, अलाउद्दीन खिलजी, आतंकवाद और पाकिस्तान की इंट ीªª हो चुकी है।
 
गौरतलब है कि 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने मुसलमानों को खुश करने के इरादे से ओबीसी को हिन्दू और गैर-हिन्दू वर्गाें में बांट दिया। जिसका खामियाजा उसे हार के रूप चुकाना पड़ा था। ठीक इसी प्रकार से 2014 के लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस सरकार ने जाटों को खुश करने के लिए उन्हे केन्द्र की ओबीसी सूची मंे पहले ही डाल दिया था, और कांग्रेस को चुनाव में हार का सामना करना पड़़ा था।

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