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Guest Writer

एक्ट में एक ही दिन में ही जांच करके पता लगाया जाए कि आरोप फर्जी है या सही अगर फर्जी पाया जाए तो बेल वरना जेल

April 05, 2018 10:41 AM
General

वंचित आंदोलन के कुछ संदर्भ सोचने के

एक्ट में एक ही दिन में ही जांच करके पता लगाया जाए कि आरोप फर्जी है या सही अगर फर्जी पाया जाए तो बेल वरना जेल 

कृष्ण कुमार निर्माण

याद करें 2 अप्रैल, 2018 का वंचित तबकों द्वारा किया गया व्यापक आंदोलन, जिसे हिंसात्मक तौर पर चर्चित किया गया, इससे भी ज्यादा व्यापक आंदोलन इस देश में हो चुके हैं, उन तमाम आंदोलनों में इसे भी चर्चित आंदोलन माना गया बल्कि कई आंदोलन तो कई- कई दिनों तक भी लगातार चले हैं और शायद विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलन चलते भी रहेंगे।
यहाँ एक और गजब की बात यह है कि शायद ये पहली बार हुआ है कि एक दिन के आंदोलन में हरियाणा जैसे राज्य में मात्र एक जिले में 3850 केस दर्ज होते है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि फिर पूरे देश में कितने लाख मुक़द्दमें दर्ज हुए होंगे, ये अपने आप में एक रिकॉर्ड है जो कि इससे पूर्व हुए तमाम आंदोलनों में इतने मुक़द्दमें दर्ज नहीं हुए, दर्ज जरूर हुए हैं पर इतने नहीं।यही एक बड़ा गम्भीर सवाल है जो संवेदनशील लोगों को सोचने पर मजबूर करता है।
दूसरी बात यह भी ध्यान रखिये कि कोर्ट के निर्णयों के खिलाफ यह कोई पहला मामला नहीं है क्योंकि इतिहास गवाह है कि कौर्ट के निर्णय के खिलाफ लोग पहले भी बोलते रहे हैं, हम सब जानते हैं कि बहुत बार ऐसा हो चुका है और आपातकाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
शायद इतिहास में यह पहला आंदोलन है जो बिना किसी नेतृत्व के हुआ और मात्र एक दिन चला, स्वतः स्फूर्त था और खासकर सदियों से दबाये गये समाज द्वारा किया गया यह पहला आंदोलन था जिसे खुलकर किया गया।क्योंकि ये आंदोलन दलितों को अपने स्वाभिमान का आंदोलन सा लगा, ऐसा तमाम चिंतक मानते हैं।
लेकिन शायद यह भी पहली बार ही हुआ कि इस आंदोलन के बाद जिस तरह की बात हुई, जो कि पिछले दिनों हुए आंदोलनों के दौरान नहीं हुई, मसलन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया को आप देख सकते हैं, दलितों के प्रति उसी तरह की भाव उजागर किए गए, जो भाव उनके साथ सदियों से रखे जाते रहे हैं जबकि राजा चौहान का केस भी सामने आ गया और दूसरे भी कई तथ्य सामने आ गए, जिससे ये धीरे धीरे साफ़ हो रहा है कि दलितों ने किस तरह अपना आंदोलन बिना किसी नेतृत्व के चलाया, फिर भी हद दर्जे के आरोप लगाए गए और लगाए जा रहे हैं, जो इस बात को प्रमाणित करते है कि आज भी दलितों के प्रति कैसी मानसकिता तथकथित लोगों में हैं।
इसी से जोड़ते हैं एससी एक्ट का मामला, जिसके कारण आंदोलन हुआ।दलितों को घर जलाये गए, दुलिना में भीड़ ने दलितों को मार दिया, गुजरात में सरेआम पीटा गया, हरियाणा के हिसार में दलितों को ज़िंदा जला दिया गया----लेकिन हुआ क्या?कहा गया कि घर अपने आप जला लिए, अपने आप मर गए, गुजरात कांड का अब कहीं जिक्र है या नहीं?मतलब सिर्फ इतना है कि आखिर दलितों के अलावा कोई और किसी जाति का उदाहरण दे कि और किस किस के साथ हुआ?न्याय नहीं मिला और बोला जा रहा है कि---इस एक्ट का दुरूपयोग होता है। खेर, एक सीधा सवाल जहाँ तक एफ आई आर की बात है वो तो असल में बहुत सारे लोगों की दर्ज नहीं होती और क्या क्या कैसे कैसे होती है?उन सब बातों को दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए?फिर दुरूपयोग कैसा?यहीं से सवाल ये भी यह कि---किसी भी आरोप के लग जाने पर आखिर गिरफ्तार क्यों किया जाता है ।याद कीजिये कोर्ट की ही बात, कानून की ही बात कि कहीं आरोपी बाहर रहकर अपने दबाव का इस्तेमाल करके प्रभावित न कर ले इसलिए बहुत सारे क्राइम में बेल नहीं दी जाती और अब कहते हैं कि---एक्ट कमजोर नहीं किया गया।
इसी संदर्भ में आज तक एक उदाहरण बताएं कि किसको इस एक्ट में सजा हुई है और कितने ब्लैकमेल हुए हैं, यह रिसर्च का विषय है, जिसे वक्त की नजाकत को देखते हुए निष्पक्षता से किया जाना बेहद जरुरी है और समय की मांग भी है।
बिलकुल सही बात है कि--निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए लेकिन उसके लिए ऐसा भी हो सकता है कि तुरंत एफ आई आर दर्ज हो और तुरंत गिरफतारी हो और ये प्रावधान हो कि--इस एक्ट में एक ही दिन में ही जांच करके पता लगाया जाए कि आरोप फर्जी है या सही अगर फर्जी पाया जाए तो बेल वरना जेल ताकि कानून का भी सम्मान रहे और कमजोरों का भी ध्यान रहे और साथ ही साथ कोई निर्दोष भी ना फंसे।
एक सवाल और पिछले दिनों से उठाया जा रहा है कि---आरक्षण ने देश को बर्बाद कर दिया।आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि देश की कुल जनसँख्या 125 करोड़, इनमे से दलित लगभग 30 करोड़ और इन दलितों में कुल 4.37% दलितों के पास सरकारी नौकरी मतलब इसे 5% मानकर चलिए तो कुल एक करोड़ दलित ही सरकारी नौकरी में हैं बाकि 29 करोड़ लोगों के पास नौकरी नहीं है अर्थात 100 में से 2 कर्मचारी एस सी हैं और इसमें भी कमाल की बात ये है कि ज्यादातर एस सी कर्मचारी तीसरा और चौथा दर्जा ही हैं। कोई भी आर टी आई मांग ले तो आँखे फ़टी की फ़टी रह जाएंगी फिर भी आरोप कि आरक्षण ने देश को बरबाद कर दिया।क्योंकि ये आरोप अच्छा लगता है, जल्दी पच जाता है परन्तु तथ्य यह है कि आरक्षण ने देश बरबाद नहीं किया। ये सब आप सोच लीजिये और यहीं आप समानता की बात सोच लीजिये कि जो 30% हैं उनकी नौकरी 5% है और जो देश में जनसंख्या के आधार पर 10 से 15% है उनकी नौकरी 50%के आसपास फिर भी आरोप है कि देश को बरबाद आरक्षण ने कर दिया।जबकि बातें और भी बहुत है जिन्हें आप और हम समझते भी हैं, जानते भी है कि किस तरह एक मूर्ति कागज की तो पुज्यनीय है लेकिन उसी भगवान के द्वारा बनाएं गयी जीती जागती मूर्ति की कोई गरिमा नहीं है, उसके छूने से आप अपवित्र हो जायेंगे और उसके आंदोलन करने के बाद आप आंदोलन करेंगे जबकि पहले हुए किसी भी आंदोलन के बाद किसी ने भी आंदोलन नहीं किया?
हिन्दू धर्म और दलित--सीधी बात ये है कि जब तक इंसान और इंसान में भेदभाव खत्म नहीं होगा तब तक चीजें ठीक नहीं होगी।इसी आंदोलन ने बहुत सारी बातें खोलकर रख दी कि कुछ ठेकेदार संगठनों ने विरोध भी किया और कई जगह टी झड़प भी हुई जबकि होना यह चाहिए था कि--इनकी समस्यायों को समझा जाता और उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाता लेकिन किसी भी संगठन का कोई भी ब्यान नहीं आया जबकि पूर्व के हुए आंदोलनों में बहुत ब्यान आये।
दलित और राजनैतिक दल--असल में किसी भी पोलिटिकल पार्टी ने दलितों का विकास करने की सार्थक कोशिश ही नहीं की, जिसका परिणाम हम सबके सामने है और दलितों को मात्र वोट बैंक ही माना जाता रहा और प्रयोग किया गया।
आखिर समाधान क्या है?सिर्फ और सिर्फ ये कि मन, वचन, कर्म, भाव और एहसास से जाति को खत्म करना होगा, देश की सार्वजनिक सम्पति पर सबका अधिकार हो, भेदभाव दूर हो और भी बहुत सारी बात करनी होगी वरना देश किधर जा रहा है और क्या होगा?शायद हम सबके लिए सोचने की जरूरत है।

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