नूंह में जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य पर सवाल: 5 साल में 239 मातृ मौतें, 2025-26 में 838 शिशुओं की मौत

नूंह मेवात में जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य पर गहरा संकट: 5 साल में 239 माताओं और एक साल में 838 शिशुओं की मौत, स्वास्थ विभाग की व्यवस्थाओं पर उठे सवाल
नूंह / 12 अगस्त 2026 / अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
मेवात यानी नूंह जिले में सुरक्षित प्रसव और जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य को लेकर सरकारी स्तर पर लगातार योजनाएं चलाए जाने के बावजूद सामने आए आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। जिले में पिछले पांच वर्षों के दौरान प्रसव के दौरान 239 महिलाओं की मौत दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
वहीं वर्ष 2025-26 में सरकारी रिकॉर्ड में 838 शिशुओं की मौत दर्ज की गई। ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं, जब हरियाणा सरकार मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और संस्थागत प्रसव को बढ़ाने पर लगातार जोर दे रही है।
हालांकि इन आंकड़ों को पूरे जिले की वास्तविक तस्वीर मान लेना भी सही नहीं होगा। घरों में होने वाले प्रसव, अपंजीकृत चिकित्सा संस्थानों में इलाज और वहां होने वाली मौतों का पूरा रिकॉर्ड सरकारी व्यवस्था तक नहीं पहुंच पाने की स्थिति में वास्तविक संख्या अलग हो सकती है।
यही वजह है कि नूंह में जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य की स्थिति को समझने के लिए सिर्फ मौतों की संख्या नहीं, बल्कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की जांच, एनीमिया की स्थिति, समय पर अस्पताल पहुंचने की सुविधा, रेफरल व्यवस्था और प्रसव के दौरान उपलब्ध विशेषज्ञ सेवाओं की भी समीक्षा जरूरी है।
योजनाएं बहुत, लेकिन जमीनी चुनौती बरकरार
सरकार की ओर से गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव उपलब्ध कराने के लिए कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इनमें गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा, एनीमिया की पहचान और इलाज तथा जरूरत पड़ने पर उच्च स्वास्थ्य संस्थान में रेफर करने जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
हरियाणा में भी मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिए संस्थागत प्रसव और रेफरल सेवाओं का विस्तार किया गया है। राज्य सरकार के अनुसार 2024 में हरियाणा में संस्थागत प्रसव का स्तर 98 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया था। इसके साथ ही राज्य का शिशु मृत्यु दर भी पिछले एक दशक में कम हुआ है।
लेकिन किसी राज्य का औसत प्रदर्शन किसी एक जिले की पूरी तस्वीर नहीं बताता। नूंह जैसे क्षेत्र में भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की चुनौती अलग हो सकती है।
इसलिए नूंह के मामले में यह देखना जरूरी है कि सरकार की योजनाएं गर्भवती महिलाओं तक कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी तरीके से पहुंच रही हैं।
नूंह में स्वास्थ्य सुविधाओं का बड़ा नेटवर्क
जिले में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का एक विस्तृत नेटवर्क मौजूद है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार नूंह में मेडिकल कॉलेज के अलावा जिला नागरिक अस्पताल, 111 स्वास्थ्य उपकेंद्र, 18 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और चार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं।
इसके अलावा जिले में 105 निजी अस्पताल पंजीकृत बताए गए हैं। कागज पर स्वास्थ्य संस्थानों की यह संख्या कम नहीं है। इसके बावजूद अगर प्रसव के दौरान महिलाओं और नवजातों की मौत का आंकड़ा चिंता पैदा कर रहा है तो सवाल सुविधाओं की संख्या से आगे जाकर उनकी उपलब्धता और उपयोग की गुणवत्ता पर भी उठता है।
क्या हर स्वास्थ्य केंद्र पर जरूरी स्टाफ उपलब्ध है? क्या गंभीर गर्भवती महिला को समय पर उच्च केंद्र तक पहुंचाया जा रहा है? क्या प्रसव के दौरान खून और जरूरी दवाओं की उपलब्धता रहती है? ऐसे सवालों के जवाब जमीनी समीक्षा से ही सामने आ सकते हैं।
एनीमिया बड़ी चुनौती बन सकता है
गर्भावस्था के दौरान एनीमिया यानी शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिम बढ़ा सकती है। खासकर गंभीर एनीमिया वाली महिला में प्रसव के दौरान अधिक रक्तस्राव होने की स्थिति में खतरा तेजी से बढ़ सकता है।
ऐसे मामलों में समय पर रक्त की उपलब्धता, प्रशिक्षित चिकित्सकीय टीम और जरूरत पड़ने पर तुरंत ऑपरेशन की सुविधा बेहद महत्वपूर्ण होती है।
नूंह को लेकर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के पुराने स्वास्थ्य संकेतकों में भी गर्भवती महिलाओं की एंटी-नेटल जांच और संस्थागत प्रसव से जुड़ी चुनौतियां दर्ज की गई थीं। NHM के एक पुराने हेल्थ एटलस में नूंह को कम ANC कवरेज और संस्थागत प्रसव वाले आकांक्षी जिलों में शामिल किया गया था।
हालांकि यह पुराना डेटा है, इसलिए इसे वर्ष 2026 की वर्तमान स्थिति नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन यह जरूर बताता है कि नूंह में गर्भवती महिलाओं की समय पर पहचान, नियमित जांच और सुरक्षित प्रसव लंबे समय से स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण प्राथमिकता रहे हैं।
समय पर अस्पताल पहुंचना भी जीवन बचाने वाला कारक
मातृ मृत्यु के कई मामलों में बीमारी या जटिलता अचानक जानलेवा नहीं बनती, बल्कि समय पर इलाज नहीं मिलने से स्थिति बिगड़ती जाती है। गंभीर एनीमिया, अत्यधिक रक्तस्राव, हाई ब्लड प्रेशर, संक्रमण और प्रसव से जुड़ी अन्य जटिलताओं में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है।
अगर गर्भवती महिला को घर से स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने में लंबा समय लगे या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से बड़े अस्पताल तक रेफर करने में देरी हो जाए तो खतरा बढ़ सकता है।
इसी कारण मातृ स्वास्थ्य व्यवस्था में केवल अस्पताल बनाना पर्याप्त नहीं माना जाता। प्रशिक्षित स्टाफ, एंबुलेंस, रक्त की उपलब्धता, विशेषज्ञ डॉक्टर, ऑपरेशन की सुविधा और 24 घंटे रेफरल व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
हरियाणा में सरकार ने भी हाई-रिस्क गर्भावस्थाओं के लिए First Referral Units को मजबूत करने और विशेषज्ञ सेवाओं को नजदीक उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया है।
निजी अस्पतालों की निगरानी भी जरूरी
नूंह में सरकारी अस्पतालों के साथ बड़ी संख्या में निजी स्वास्थ्य संस्थान भी काम कर रहे हैं। ऐसे में निजी अस्पतालों में होने वाली डिलीवरी और इलाज की निगरानी भी मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार वर्ष 2025 में 16 निजी अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई की गई, जबकि वर्ष 2026 में अब तक चार निजी अस्पतालों पर कार्रवाई की जानकारी दी गई है। विभाग की छापेमारी के दौरान प्रतिबंधित दवाइयां बरामद होने की बात भी सामने आई है।
हालांकि किसी भी अस्पताल या चिकित्सक को किसी मामले में दोषी ठहराने से पहले विभागीय जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है। केवल आरोप या छापेमारी को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
लेकिन यदि जांच में नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो कार्रवाई स्वास्थ्य व्यवस्था में भरोसा कायम करने के लिए महत्वपूर्ण होगी।
सामने आए कुछ मामले
नूंह में प्रसव के दौरान हुई मौतों से जुड़े कुछ मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। 7 दिसंबर 2024 को नूंह के एक निजी क्लीनिक में प्रसव के दौरान आयशा और उसके नवजात की मौत का मामला सामने आया था। परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया था।
23 सितंबर 2024 को पिनगवां के एक निजी क्लीनिक में कम हीमोग्लोबिन वाली गर्भवती महिला का प्रसव कराने का आरोप सामने आया। महिला की हालत बिगड़ने के बाद उसे नलहड़ मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया, जहां उसकी मौत हो गई।
11 जून 2025 को नूंह के एक निजी अस्पताल में महिला की मौत के मामले में तीन डॉक्टरों सहित पांच लोगों के खिलाफ केस दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई थी। परिजनों ने ऑपरेशन में लापरवाही का आरोप लगाया था।
सिकरावा में भी कथित अवैध क्लीनिक में गर्भवती महिला और उसके नवजात की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई का मामला सामने आया था। छापेमारी के दौरान MTP किट और चिकित्सा उपकरण बरामद किए जाने की जानकारी दी गई थी।
इन मामलों में अंतिम जिम्मेदारी संबंधित जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही तय की जा सकती है। इसलिए इन्हें स्वास्थ्य व्यवस्था में संभावित कमियों की जांच के उदाहरण के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।
838 शिशु मौतों के आंकड़े की भी गहन समीक्षा जरूरी
वर्ष 2025-26 में 838 शिशुओं की मौत का आंकड़ा भी गंभीरता से देखने की जरूरत है। लेकिन शिशु मृत्यु को समझने के लिए केवल कुल संख्या पर्याप्त नहीं है।
समय से पहले जन्म, जन्म के समय कम वजन, जन्म के दौरान ऑक्सीजन की कमी, संक्रमण, जन्मजात बीमारियां और नवजात देखभाल की कमी जैसे कई कारण शिशु मृत्यु के पीछे हो सकते हैं।
इसलिए प्रत्येक शिशु मृत्यु की मेडिकल समीक्षा जरूरी है। इससे पता लगाया जा सकता है कि मृत्यु का कारण क्या था और क्या उस मामले में समय पर उचित उपचार उपलब्ध कराया जा सकता था।
हरियाणा सरकार ने हाल के वर्षों में नवजात देखभाल के लिए सरकारी अस्पतालों में जरूरी उपकरण बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए हैं। राज्य स्तर पर Infant Mortality Rate में कमी आने की जानकारी सरकार ने SRS 2024 के आधार पर दी है।
लेकिन राज्य के बेहतर होते औसत आंकड़ों के साथ-साथ कमजोर जिलों में स्थानीय स्तर की कमियों को पहचानना भी जरूरी है।
सिर्फ आंकड़े कम करना लक्ष्य नहीं होना चाहिए
मातृ और शिशु मृत्यु के आंकड़ों को कम करना स्वास्थ्य विभाग का महत्वपूर्ण लक्ष्य जरूर है, लेकिन इससे भी जरूरी यह समझना है कि मौत क्यों हुई।
अगर किसी महिला की मौत गंभीर एनीमिया के कारण हुई तो यह देखना होगा कि गर्भावस्था के दौरान उसकी हीमोग्लोबिन जांच हुई थी या नहीं। अगर जांच हुई थी तो उसे आयरन उपचार मिला या नहीं।
अगर प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव हुआ तो यह देखना होगा कि अस्पताल में रक्त उपलब्ध था या नहीं। अगर मरीज को दूसरे अस्पताल रेफर किया गया तो एंबुलेंस और रेफरल में कितना समय लगा।
इसी तरह नवजात की मौत के मामले में यह देखना जरूरी है कि बच्चा समय से पहले पैदा हुआ था या नहीं, जन्म के समय उसका वजन कितना था और उसे तुरंत नवजात विशेषज्ञ की देखभाल मिल पाई थी या नहीं।
हर मातृ मृत्यु की समीक्षा से सामने आ सकती है असली तस्वीर
मातृ मृत्यु की प्रत्येक घटना की समीक्षा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद कमजोर कड़ी की पहचान हो सकती है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के स्तर पर भी मातृ मृत्यु समीक्षा का उद्देश्य यही है कि किसी महिला की मौत के पीछे चिकित्सा और गैर-चिकित्सकीय कारणों को समझा जाए और भविष्य में उसी तरह की मौत को रोकने के लिए व्यवस्था में सुधार किया जा सके।
नूंह जैसे जिले में यह समीक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहां सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में बड़ी संख्या में प्रसव होते हैं।
मृत्यु के हर मामले को सिर्फ एक आंकड़ा मानने के बजाय उसे स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जाए तो कई ऐसी कमियां सामने आ सकती हैं जिन्हें समय रहते दूर किया जा सकता है।
स्वास्थ्य विभाग का कहना है, सुविधाओं का लाभ उठाएं
सीनियर डॉक्टर डॉ. विशाल सिंगला ने लोगों से सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठाने की अपील की है। उनके अनुसार सरकार की ओर से आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है और लोगों को समय पर इन सेवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि निजी अस्पतालों से संबंधित शिकायत मिलने पर स्वास्थ्य विभाग कार्रवाई करता है। जिले में समय-समय पर जागरूकता अभियान भी चलाए जाते हैं।
उनकी अपील का मुख्य संदेश यही है कि गर्भवती महिलाओं को नियमित जांच करानी चाहिए और प्रसव के लिए सुरक्षित एवं मान्यता प्राप्त स्वास्थ्य संस्थान का चयन करना चाहिए।
मेवात में सुरक्षित प्रसव की असली कसौटी क्या होगी?
नूंह में 239 मातृ मौतों और 838 शिशु मौतों से जुड़े आंकड़े निश्चित रूप से गंभीर सवाल खड़े करते हैं। लेकिन इन आंकड़ों को समझने के लिए पूरी तस्वीर सामने लाना जरूरी है।
घर पर होने वाले प्रसव, अपंजीकृत संस्थानों में इलाज, निजी अस्पतालों में होने वाली मौतों और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज मामलों के बीच अंतर को भी जांचना होगा।
इसके साथ ही प्रत्येक मातृ और शिशु मृत्यु की मेडिकल समीक्षा, गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, एनीमिया का समय पर उपचार, रक्त की उपलब्धता, विशेषज्ञ चिकित्सकों की मौजूदगी और तेज रेफरल व्यवस्था को मजबूत करना होगा।
हरियाणा में राज्य स्तर पर मातृ और शिशु स्वास्थ्य के आंकड़ों में सुधार की दिशा में प्रगति दर्ज की गई है, लेकिन नूंह जैसे जिलों में स्थानीय स्तर की चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आखिरकार सुरक्षित प्रसव की सफलता केवल अस्पतालों की संख्या या सरकारी योजनाओं की सूची से तय नहीं होगी। असली कसौटी यह होगी कि गर्भावस्था से लेकर प्रसव और नवजात की शुरुआती देखभाल तक हर महिला और बच्चे को समय पर सही इलाज मिले और रोकी जा सकने वाली मौतों को वास्तव में कम किया जा सके।
इस रिपोर्ट में 239 मातृ मौतों और 838 शिशु मौतों सहित नूंह जिले से जुड़े स्थानीय आंकड़े उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आधारित हैं। इन आंकड़ों की स्वतंत्र सरकारी डेटाबेस से पूर्ण पुष्टि उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिली है, इसलिए इन्हें संबंधित स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड के रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि स्वतंत्र रूप से सत्यापित आंकड़ों के रूप में।