न्याय की चौखट पर भरोसे की दरार और न्यायाधीशों पर आरोपों से जुड़ी अहम बातें

न्याय की चौखट पर भरोसे की दरार!
महोदय,
न्यायपालिका लोकतंत्र का वह दरवाजा है, जिस पर आम आदमी तब दस्तक देता है, जब बाकी सारे दरवाजे बंद हो चुके होते हैं। इसलिए अदालत का फैसला केवल किसी मुकदमे का अंत नहीं होता, वह न्याय व्यवस्था पर नागरिक के विश्वास की परीक्षा भी होता है। यही कारण है कि जब न्यायपालिका के भीतर से ही किसी न्यायाधीश पर आरोप सामने आते हैं तो मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, उसकी आंच पूरी व्यवस्था की प्रतिष्ठा तक पहुंचती है। इन दिनों राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप मेहता के पत्रों से उठे विवाद ने इसी सवाल को फिर सामने ला दिया है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत का यह कहना कि आरोपों को अंतिम सत्य मानने से पहले संबंधित न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए, न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के अनुरूप है। आरोप गंभीर हों तो जांच भी गंभीर होनी चाहिए, लेकिन आरोप और दोषसिद्धि के बीच की दूरी मिटा देना न्याय का रास्ता नहीं हो सकता।
समस्या यह है कि आम आदमी के मन में अब एक और सवाल पैदा हो रहा है—यदि न्यायपालिका की अपनी निगरानी व्यवस्था इतनी संवेदनशील है तो उसकी जवाबदेही कितनी प्रभावी है? न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों के लिए ‘इन-हाउस’ व्यवस्था मौजूद है और सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल के फैसलों में इस आंतरिक तंत्र को न्यायिक अनुशासन और तथ्य-पड़ताल का वैध माध्यम माना है। मगर आम नागरिक के लिए सवाल केवल व्यवस्था के अस्तित्व का नहीं, उसकी पारदर्शिता और परिणाम का है। बंद दरवाजों के पीछे होने वाली जांच पर भरोसा तभी मजबूत होगा, जब उसकी निष्पक्षता पर सार्वजनिक विश्वास भी कायम रहे।
यहां यह कहना भी जरूरी है कि न्यायपालिका के सभी न्यायाधीश या वकील भ्रष्ट हैं, ऐसा निष्कर्ष न तो तथ्यों से निकाला जा सकता है और न न्याय के हित में उचित है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भ्रष्टाचार की शिकायतों को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि संस्था न्यायपालिका है। जिस तरह पुलिस, प्रशासन और दूसरे सरकारी विभागों में जवाबदेही जरूरी है, उसी तरह न्यायिक व्यवस्था में भी पारदर्शिता और नैतिक जवाबदेही जरूरी है। आखिर न्याय देने वाली संस्था को संदेह से ऊपर रखने का सबसे अच्छा तरीका संदेह को दबाना नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्ष जांच करना है।
आम आदमी का अदालत से सबसे बड़ा दुख अक्सर फैसला नहीं, फैसले तक पहुंचने में लगने वाला समय और खर्च होता है। 1 जून 2026 की सरकारी जानकारी के अनुसार देश के हाई कोर्टों में स्वीकृत 1,122 पदों में से 789 पर ही न्यायाधीश कार्यरत थे और 333 पद खाली थे। यानी न्याय की गाड़ी को जितने पहिए चाहिए, उनमें से कई पहले ही गायब हैं। फिर तारीख पर तारीख आए तो आश्चर्य कैसा? सरकार स्वयं मानती है कि मुकदमों की लंबी लंबित सूची के पीछे जटिल तथ्य, सबूत, गवाह, जांच एजेंसियां, वकील, पक्षकार, बुनियादी ढांचा और अदालतों में उपलब्ध मानव संसाधन जैसे अनेक कारण हैं।
फिर पुलिस और न्यायालय के बीच आम आदमी की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है। आपराधिक मामले में प्राथमिकी से लेकर जांच, धाराओं के निर्धारण, गिरफ्तारी, जमानत, आरोपपत्र और सुनवाई तक नागरिक व्यवस्था के कई पड़ावों से गुजरता है। यहां किसी भी स्तर पर विवेकाधिकार का दुरुपयोग हो तो कमजोर व्यक्ति के लिए न्याय महंगा और कठिन हो सकता है। यही वह जगह है जहां भ्रष्टाचार की संभावना जन्म लेती है। इसलिए पुलिस सुधार और न्यायिक सुधार को अलग-अलग खानों में रखकर नहीं देखा जा सकता।
विडंबना देखिए—सरकार और न्यायपालिका डिजिटल अदालतों, ई-कोर्ट, ऑनलाइन केस स्टेटस और तकनीक के माध्यम से न्याय को तेज और सुलभ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी न्याय प्रक्रिया के डिजिटल रूपांतरण और पुनर्रचना को न्याय तक समयबद्ध पहुंच का महत्वपूर्ण माध्यम बताया है। हाल ही में मोबाइल ई-सेवा वैन के जरिए अदालत और कानूनी सहायता को लोगों के दरवाजे तक ले जाने की पहल भी शुरू हुई है। लेकिन तकनीक तभी सफल होगी, जब उसके पीछे बैठा इंसान भी ईमानदार और जवाबदेह हो।
आज स्थिति यह है कि लोग मजाक में नहीं, अनुभव से कहते हैं—‘हे भगवान, कोर्ट-कचहरी और पुलिस थाने से बचाए रखना।’ यह वाक्य लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। न्यायालय ऐसा स्थान होना चाहिए जहां जाने से डर नहीं, भरोसा पैदा हो। अच्छे न्यायाधीश और अच्छे वकील आज भी व्यवस्था की रीढ़ हैं; उनके कारण ही करोड़ों लोगों का विश्वास बचा हुआ है। लेकिन कुछ कंकड़ों के कारण पूरी दाल को संदिग्ध होने से बचाने के लिए अब व्यवस्था को अपनी छननी और मजबूत करनी होगी।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति भी नहीं हो सकता। न्यायाधीशों को बाहरी दबाव से बचाना जितना जरूरी है, उन्हें आंतरिक भ्रष्टाचार और दुराचार के आरोपों से निष्पक्ष जांच के जरिए मुक्त करना भी उतना ही जरूरी है। न्याय की चौखट पर खड़ा गरीब आदमी बस इतना चाहता है कि वहां पहुंचने के बाद उसकी जेब नहीं, उसका सच देखा जाए। जिस दिन अदालत के दरवाजे पर खड़ा नागरिक यह भरोसा करने लगेगा कि यहां तारीख नहीं, न्याय मिलेगा, उसी दिन न्यायपालिका की प्रतिष्ठा वास्तव में मजबूत होगी।-सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र.