ओलंपिक पदक का सपना, मैदान कहां है?

ओलंपिक पदक का सपना और मैदानों की कमी: जानिए क्या है भारत की खेल व्यवस्था की असल सच्चाई
महोदय,
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही है—भारत को उन खेलों में भी उतरना होगा, जिनमें वह अब तक हिस्सा ही नहीं लेता रहा है। यह बात सुनने में जितनी सामान्य लगती है, उतनी ही गहरी है। पेरिस ओलंपिक-2024 में भारत ने 32 खेलों में से केवल 16 खेलों में भाग लिया। यानी दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच पर हम आधे खेलों में भी अपनी चुनौती पेश नहीं कर पाए। ऐसे में केवल यह सवाल पूछना कि भारत ने कितने पदक जीते, अधूरा सवाल है। असली सवाल यह है कि जिन पदकों के लिए हम मैदान में उतरे ही नहीं, उन्हें जीतेंगे कैसे?
भारत में खेल प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। कमी है तो उसे खोजने की, तराशने की और सही समय पर सही संसाधन उपलब्ध कराने की। विडंबना देखिए कि 140 करोड़ से अधिक आबादी वाला देश ओलंपिक में कई ऐसे खेलों में दिखाई ही नहीं देता, जिनमें दुनिया के छोटे-छोटे देश भी पदक जीतते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि भारतीयों में प्रतिभा नहीं है, बल्कि हमारी खेल व्यवस्था अभी तक प्रतिभा को गांव की गलियों, कस्बों और तहसीलों से उठाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में पूरी तरह सफल नहीं हुई है।
यहां क्रिकेट का उल्लेख जरूरी है। क्रिकेट भारत में लोकप्रिय है, इसमें कोई बुराई नहीं। क्रिकेटरों की सफलता पर देश को गर्व भी होना चाहिए। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब खेल का पूरा बाजार, मीडिया, प्रायोजन और दर्शकों का ध्यान कुछ चुनिंदा खेलों के इर्द-गिर्द सिमट जाता है। दूसरी ओर तैराकी, जिम्नास्टिक, साइकिलिंग, रोइंग, तलवारबाजी, घुड़सवारी, शूटिंग के कई वर्ग, एथलेटिक्स की अनेक स्पर्धाएं और दूसरे ओलंपिक खेल पर्याप्त लोकप्रियता और निवेश के लिए संघर्ष करते रह जाते हैं। क्रिकेट की चमक को कम करने की जरूरत नहीं, दूसरे खेलों के अंधेरे को दूर करने की जरूरत है।
सरकार ने खेलो इंडिया जैसी योजनाएं शुरू की हैं और खेल बजट में भी वृद्धि हुई है, लेकिन सवाल यह है कि खेलों के लिए खर्च होने वाला पैसा आखिर पहुंच कहां रहा है? देश में खेल मंत्रालय है, राष्ट्रीय योजनाएं हैं, राज्य खेल विभाग हैं, खेल प्राधिकरण हैं, स्टेडियम हैं और योजनाओं की लंबी सूची है, लेकिन जब किसी छोटे शहर या तहसील का प्रतिभाशाली बच्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बनने निकलता है तो उसके सामने सबसे पहला सवाल होता है—प्रशिक्षण कहां मिलेगा? प्रशिक्षक कौन देगा? उपकरण कौन देगा? यात्रा और प्रतियोगिता का खर्च कौन उठाएगा?
इसका सबसे व्यावहारिक समाधान स्कूल से शुरू होना चाहिए। माध्यमिक स्तर से ही प्रत्येक स्कूल में खेल को पढ़ाई का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। बच्चों को केवल वार्षिक खेल दिवस पर दौड़ा देने से खेल प्रतिभा नहीं बनती। वर्षभर प्रशिक्षण चाहिए, प्रतियोगिताएं चाहिए और प्रतिभा की वैज्ञानिक पहचान चाहिए। पांच से पंद्रह वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए देशव्यापी प्रतिभा खोज अभियान की प्रधानमंत्री की घोषणा इसी दिशा में बड़ा कदम बन सकती है, बशर्ते यह अभियान कागजों और उद्घाटन समारोहों तक सीमित न रहे।
हर स्कूल में बच्चों की खेल क्षमता का परीक्षण होना चाहिए। किस बच्चे की दौड़ तेज है, किसमें असाधारण सहनशक्ति है, किसका संतुलन बेहतर है, किसकी प्रतिक्रिया क्षमता तेज है, किसकी ऊंचाई और शारीरिक बनावट किसी विशेष खेल के अनुकूल है—इन सबका वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है। प्रतिभा पहचानने के बाद बच्चे को उसकी रुचि और क्षमता के अनुसार खेल चुनने की स्वतंत्रता मिले। फिर स्कूल से ब्लॉक, ब्लॉक से तहसील, तहसील से जिला, जिला से राज्य और राज्य से राष्ट्रीय स्तर तक उसकी प्रगति का स्पष्ट रास्ता बनाया जाए।
सबसे बड़ी जरूरत तहसील स्तर पर खेल क्रांति की है। देश की प्रत्येक तहसील में पर्याप्त खेल मैदान और बहुउद्देश्यीय खेल परिसर होने चाहिए। वहां एथलेटिक्स, फुटबॉल, हॉकी, कबड्डी, कुश्ती, मुक्केबाजी, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल, बैडमिंटन, टेबल टेनिस और स्थानीय स्तर पर लोकप्रिय खेलों की सुविधाएं उपलब्ध हों। जिन खेलों के लिए महंगी और विशेष सुविधाओं की आवश्यकता है, उनके लिए जिला स्तर पर अत्याधुनिक केंद्र बनाए जाएं। केवल मैदान बना देना पर्याप्त नहीं होगा। वहां प्रशिक्षित और पूर्णकालिक कोच, फिजियोथेरेपिस्ट, पोषण विशेषज्ञ और खेल मनोवैज्ञानिक भी होने चाहिए।
और सबसे महत्वपूर्ण बात—खिलाड़ी को आर्थिक सुरक्षा मिले। गरीब परिवार का बच्चा प्रतिभाशाली होने के बावजूद केवल इसलिए पीछे न छूटे कि उसके माता-पिता महंगे जूते, किट, यात्रा या प्रशिक्षण का खर्च नहीं उठा सकते। प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को छात्रवृत्ति, उपकरण, पोषण, यात्रा और प्रतियोगिताओं की पूरी सहायता मिले। खेल और पढ़ाई को भी आमने-सामने खड़ा करना बंद करना होगा। खिलाड़ी पढ़े भी और खेले भी। खेल को करियर मानने वाले बच्चे के सामने यह विकल्प नहीं होना चाहिए कि वह खिलाड़ी बने या पढ़ाई करे।
ओलंपिक पदक चार साल की तैयारी से नहीं मिलता। इसके पीछे आठ-दस वर्ष की लगातार मेहनत होती है। इसलिए भारत को सरकार बदलने के साथ बदलने वाली खेल नीति नहीं, बल्कि कम से कम एक-दो दशक की दीर्घकालीन राष्ट्रीय खेल रणनीति चाहिए। प्रतिभा की पहचान से लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण तक पूरा सिस्टम खिलाड़ी के साथ खड़ा होना चाहिए।
प्रधानमंत्री का यह कहना कि खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का हिस्सा है, इसलिए महत्वपूर्ण है। खेल अनुशासन सिखाता है, हार स्वीकार करना सिखाता है, टीम भावना पैदा करता है और युवाओं को स्वस्थ दिशा देता है। लेकिन राष्ट्र निर्माण के इस अभियान की शुरुआत वातानुकूलित कार्यालयों से नहीं, मैदानों से होगी।
भारत को ओलंपिक में महाशक्ति बनाना है तो पहले खेलों को क्रिकेट की लोकप्रियता के पीछे खड़े दर्शक से निकालकर देश के हर बच्चे के जीवन का हिस्सा बनाना होगा। जिस दिन किसी गांव के बच्चे को अंतरराष्ट्रीय स्तर का सपना देखने के लिए महानगर जाने की मजबूरी नहीं होगी, जिस दिन तहसील का मैदान प्रतिभा की पहली प्रयोगशाला बनेगा और जिस दिन सरकार की खेल नीति का मूल्यांकन स्टेडियमों की संख्या से नहीं बल्कि खिलाड़ियों की गुणवत्ता से होगा, उस दिन ओलंपिक पदक अपने आप बढ़ने लगेंगे।
क्योंकि पदक ओलंपिक के मंच पर जीता जाता है, लेकिन उसकी असली लड़ाई बहुत पहले किसी छोटे से मैदान में शुरू हो चुकी होती है। भारत को अगर दुनिया के खेल मानचित्र पर शीर्ष पर पहुंचना है तो पहले उसे हर बच्चे तक मैदान पहुंचाना होगा। केवल पदक मांगने से पदक नहीं मिलेंगे—प्रतिभा को मैदान, मैदान को प्रशिक्षक और प्रशिक्षक को संसाधन देने होंगे। यही ओलंपिक विजय का असली रास्ता है!-सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र