80 वें स्वतंत्रता दिवस पर ओआरसी बोहड़ाकला में राष्ट्रभक्ति और आध्यात्मिकता का संगम,

स्वतंत्रता तब तक अधूरी जब तक हम आंतरिक बुराइयों और व्यसनों के गुलाम-बीके पुष्पा
अपनी कर्मेंद्रियों पर शासन करना सीख, मनुष्य 'स्वराज्य' का अधिकारी बनता
ओआरसी में राष्ट्रभक्ति और आध्यात्मिकता का अभूतपूर्व संगम देखने को मिला
80 वें स्वतंत्रता दिवस पर ‘स्वराज्य से विश्व राज्य’ और सनातन संस्कृति का जयघोष
बोहड़ाकला/फतह सिंह उजाला /गुड़गांव /16 अगस्त 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
मातृभूमि के अमर गौरव और स्वाधीनता के पावन पर्व 80 वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भोरा कलां स्थित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के ‘ओम शांति रिट्रीट सेंटर’ (ओआरसी) में राष्ट्रभक्ति और आध्यात्मिकता का अभूतपूर्व संगम देखने को मिला। संस्थान के प्रांगण में जब राष्ट्रीय गौरव तिरंगा फहराया गया, तो संपूर्ण वातावरण 'भारत माता की जय' और राष्ट्रीय स्वाभिमान की चेतना से प्रज्वलित हो उठा। कार्यक्रम में संस्थान के वरिष्ठ पदाधिकारियों सहित सैकड़ों साधकों और नागरिकों ने हिस्सा लेकर एक-दूसरे को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं दीं।
दिल्ली करोल बाग से पधारीं राजयोगिनी बीके पुष्पा दीदी ने देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई देते हुए एक सशक्त सांस्कृतिक व सामाजिक आह्वान किया। उन्होंने कहा, "सच्ची स्वतंत्रता तब तक अधूरी है जब तक हम आंतरिक बुराइयों और व्यसनों के गुलाम हैं। जब मनुष्य अपनी कर्मेंद्रियों पर शासन करना सीखता है और 'स्वराज्य' का अधिकारी बनता है, तभी वह 'विश्व-राज्य' के गौरवशाली पद को प्राप्त करने योग्य बनता है।"
विश्व संस्कृति की मूल जननी है भारत की पावन धरा
राजयोगिनी बीके विजय दीदी ने भारत के महान इतिहास और सांस्कृतिक सर्वोच्चता को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत कोई साधारण भू-भाग नहीं, बल्कि एक अनादि और अविनाशी खंड है। उन्होंने भावुक और ओजस्वी स्वर में कहा, "दुनिया की समस्त संस्कृतियों का मूल आधार हमारी भारतीय संस्कृति ही है। यह वह परम पवित्र धरा है जहाँ स्वयं परमात्मा का अवतरण होता है। इस पुण्य भूमि पर जन्म लेना हमारे पूर्व जन्मों का परम सौभाग्य है और इसकी गरिमा, संप्रभुता तथा अक्षुण्णता की रक्षा करना हम प्रत्येक भारतवंशी का सर्वोच्च धर्म है।"
भारत माता का करुणामयी इतिहास
ओआरसी के प्रबंधक राजयोगी बीके भीम ने भारत के महान इतिहास और युद्ध-नीति के उच्च आदर्शों पर प्रकाश डालते हुए एक ऐतिहासिक सत्य रेखांकित किया। उन्होंने कहा, "इतिहास गवाह है कि युगों-युगों से भारत पर अनगिनत आक्रांताओं ने आक्रमण किए, लेकिन भारत ने कभी भी अपनी सीमाओं से बाहर जाकर किसी अन्य राष्ट्र पर पहला हमला नहीं किया। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि की 'मातृभूमि' है—और एक माँ कभी किसी पर आक्रमण नहीं करती, वह केवल पोषण और संरक्षण देती है।" स्वतंत्रता दिवस का यह समारोह न केवल राष्ट्रीय ध्वज के प्रति समर्पण का प्रतीक बना, बल्कि इसने यह संदेश भी दिया कि भारत की असली ताकत उसकी नैतिक, आध्यात्मिक और सनातनी जड़ें हैं, जो इसे पुनः 'विश्वगुरु' के पद पर आसीन करने के लिए तत्पर हैं।