पुलिस की लाठी नहीं, कानून का राज चाहिए

पुलिसिया बर्बरता और संविधान का चीरहरण: क्या देश में अब कानून का राज खत्म हो चुका है?
पुलिसिया जुल्म और संविधान: कानून का राज या बर्बरता?
राजकुमार अग्रवाल/नई दिल्ली /05 सितंबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
भारत एक ऐसा लोकतांत्रिक देश है जहां हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान और कानून की एक मजबूत व्यवस्था बनाई गई है। किसी भी व्यक्ति पर यदि कोई गंभीर अपराध का आरोप लगता भी है, तो उसे सजा देने का अधिकार केवल देश की न्यायपालिका यानी अदालतों को है।
संविधान के तहत जब तक अदालत किसी आरोपी को दोषी साबित नहीं कर देती, तब तक कानून की नजर में हर व्यक्ति निर्दोष माना जाता है। लेकिन वर्तमान समय में देश के विभिन्न हिस्सों से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे इस मूल सिद्धांत को तार-तार कर रही हैं।
आज स्थिति यह हो गई है कि पुलिस खुद ही जांचकर्ता, वकील और जज की भूमिका निभाने लगी है। सड़क पर सरेआम किसी को भी पकड़कर लाठियों से पीटना, खंभों या जीप से बांधकर बेरहमी से प्रताड़ित करना आम बात बनती जा रही है।






गुजरात के भावनगर से हाल ही में एक ऐसी ही झकझोर देने वाली घटना सामने आई है जहाँ हत्या के आरोपी फैजल को पुलिस क्राइम सीन रिक्रिएशन के नाम पर लाई थी। आरोप है कि पुलिस ने महज कुछ ही मिनटों में उसे सरेआम सड़क पर सौ से ज्यादा डंडे मारे।
न्यायपालिका की अनदेखी और पुलिस की तानाशाही
इस प्रकार की घटनाएं इस बात का स्पष्ट संकेत देती हैं कि देश में अब खाकी वर्दी का खौफ इस हद तक बढ़ चुका है कि कानून और संविधान की धज्जियां सरेआम उड़ाई जा रही हैं। यदि पुलिस ही तय करने लगे कि किसे और क्या सजा मिलनी चाहिए, तो फिर अदालतों का वजूद ही खतरे में पड़ जाएगा।
लोकतंत्र में पुलिस का काम समाज में शांति व्यवस्था कायम करना और अपराधियों को कानून के कटघरे में खड़ा करना है। लेकिन जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और खुद कानून को अपने हाथ में ले लें, तो आम जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे ही रह जाती है।
सिर्फ गुजरात ही नहीं बल्कि देश की राजधानी दिल्ली से भी पुलिसिया बर्बरता और क्रूरता के कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने मानवता को शर्मसार कर दिया है। दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर भी अब गंभीर और तीखे सवाल उठने लगे हैं।
राजधानी के थानों में महिलाओं और पत्रकारों के साथ जिस प्रकार का अमानवीय बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया है, उसने देश की कानून व्यवस्था पर एक बड़ा दाग लगा दिया है। पत्रकार नफीसा ने मीडिया के सामने आकर अपनी आपबीती सुनाई और पुलिस की हैवानियत का पर्दाफाश किया।
पीड़ितों का दर्द और थाने में होने वाला टॉर्चर
पत्रकार नफीसा ने रोते हुए मीडिया को बताया कि किस तरह पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर प्रताड़ित किया और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। उनके अनुसार पुलिसकर्मियों ने उन्हें डराने के लिए तरह-तरह की धमकियां दीं और अभद्रता की।


जब देश के चौथे स्तंभ यानी पत्रकारों और आम नागरिकों के साथ इस स्तर की हिंसा और मानसिक उत्पीड़न होने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए एक बेहद खतरनाक संकेत है। क्या कानून सिर्फ कमजोरों और आम आदमी को कुचलने के लिए ही बना रह गया है?
सोशल मीडिया पर इन दिनों पुलिस उत्पीड़न के कई वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिन्हें देखकर हर संवेदनशील इंसान का कलेजा कांप उठता है। जंतर-मंतर पर हुए आंदोलनों और प्रदर्शनों के दौरान भी तानाशाही रवैया और हिंसा की खबरें लगातार सामने आती रही हैं।
इन तमाम घटनाओं से यह सवाल बड़ा हो जाता है कि क्या भारत में अब संविधान का राज खत्म हो चुका है और अघोषित रूप से जंगल राज की शुरुआत हो चुकी है? जनता अब यह पूछने लगी है कि क्या न्याय पाने का हक सिर्फ ताकतवरों के पास ही बचा है।
व्यवस्था सुधारने की सख्त जरूरत
यह देश किसी एक व्यक्ति या विभाग की मर्जी से नहीं बल्कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर द्वारा रचित संविधान के नियमों से चलता है। पुलिसिया अत्याचार और बर्बरता की इन घटनाओं पर यदि समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो देश का लोकतांत्रिक ढांचा पूरी तरह चरमरा जाएगा।
सरकार और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों को चाहिए कि वे ऐसे मामलों में संज्ञान लें और कानून की मर्यादा तोड़ने वाले दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करें। अदालतों की गरिमा और संविधान की सर्वोच्चता को बचाना ही देश के हर जिम्मेदार नागरिक और तंत्र का मुख्य कर्तव्य होना चाहिए।
जब तक पुलिस प्रशासन को उसके संवैधानिक दायरे में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, तब तक देश में न्याय की उम्मीद करना बेमानी होगा। वक्त आ गया है कि देश की जनता और न्यायप्रिय लोग इस तानाशाही के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करें।
क्या आपको लगता है कि पुलिस सुधारों के बिना देश में मानवाधिकारों की रक्षा करना असंभव हो गया है?