हांसी में तिरंगा विवाद: क्या इसे देशद्रोह कहना सही है?

Atal Hind Team Online16 August 20267 min read51 viewsहिसार
हांसी में तिरंगा विवाद: क्या इसे देशद्रोह कहना सही है?

हांसी तिरंगा विवाद में देशद्रोह के बयान पर सवाल। जानिए BNS धारा 152, तिरंगा कानून, पुलिस कार्रवाई और नागरिकों के संवैधानिक अधिकार क्या कहते हैं

भारत में तिरंगा न फहराने देने या स्वतंत्रता दिवस समारोह बाधित करने की कॉल क्या देशद्रोह है? संविधान, कानून और विशेषज्ञ क्या कहते हैं

राजकुमार अग्रवाल /नई दिल्ली/16 अगस्त 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

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भारत में 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस का दिन राष्ट्रीय पर्व माना जाता है। तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज है और इसका सम्मान हर नागरिक का कर्तव्य है। हाल ही में हांसी की घटना के बाद एसपी विनोद कुमार के बयान में कहा गया कि तिरंगा न फहराने देने और स्वतंत्रता दिवस समारोह को बाधित करने की कॉल देना देशद्रोह और राष्ट्रद्रोह जैसा काम है। इस बयान के बाद कई लोगों के मन में सवाल उठे हैं। क्या भारतीय संविधान में ऐसा लिखा है? क्या पुलिस को इस आधार पर लोगों को गिरफ्तार करने का अधिकार है? कानून के जानकार, सरकारी प्रावधान और अदालती व्याख्याएं इस पर क्या कहती हैं? आइए आसान भाषा में समझते हैं।

सबसे पहले संविधान की बात। भारतीय संविधान में कहीं भी स्पष्ट रूप से नहीं लिखा है कि तिरंगा न फहराने देना या स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम बाधित करने की कॉल देना “देशद्रोह” है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में हर नागरिक को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है। इसमें विरोध जताना, प्रदर्शन करना और अपनी बात कहना शामिल है। लेकिन अनुच्छेद 19(2) में कुछ पाबंदियां भी हैं। इनमें भारत की संप्रभुता और अखंडता, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और अपराध के लिए उकसाना शामिल है। यानी स्वतंत्रता असीमित नहीं है। अगर कोई काम सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ता है या हिंसा को बढ़ावा देता है तो उस पर पाबंदी लग सकती है।

पुराने कानून में भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए राजद्रोह (सेडिशन) की थी। इसमें सरकार के खिलाफ नफरत या असंतोष फैलाने को अपराध माना जाता था। लेकिन 1 जुलाई 2024 से नए आपराधिक कानून लागू हो गए। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में धारा 124ए हटा दी गई। उसकी जगह धारा 152 आई है। यह धारा भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कामों को अपराध मानती है। इसमें अलगाववाद, सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसक गतिविधियां या अलगाववादी भावनाएं भड़काने की बात है। सजा आजीवन कारावास या सात साल तक की कैद और जुर्माना हो सकती है।

कानून के जानकारों के मुताबिक धारा 152 में “देशद्रोह” शब्द नहीं है। सरकार ने कहा था कि अब राजद्रोह की जगह देशद्रोह की अवधारणा है, लेकिन यह केवल उन कामों पर लागू होती है जो देश की एकता को सीधे खतरा पहुंचाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी धारा 124ए पर 2022 में रोक लगाई थी और कहा था कि हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था भड़काने का इरादा होना जरूरी है। नई धारा 152 पर भी कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में चल रही हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे पुराने कानून का नया रूप बताते हैं तो कुछ कहते हैं कि इसमें आलोचना की छूट दी गई है। स्पष्टीकरण में लिखा है कि सरकार की नीतियों की वैध तरीके से आलोचना करना अपराध नहीं है।

तिरंगे से जुड़ा एक खास कानून है—राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971। इसमें राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के अपमान को अपराध माना गया है। धारा 2 के तहत अगर कोई सार्वजनिक जगह पर तिरंगे को जलाता है, विकृत करता है, अपवित्र करता है, रौंदता है या शब्दों या कामों से अनादर दिखाता है तो तीन साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। धारा 3 में राष्ट्रगान गाने से जानबूझकर रोकना या उसमें व्यवधान डालना भी अपराध है। लेकिन इस कानून में भी स्पष्ट किया गया है कि संविधान या ध्वज की वैध आलोचना या बदलाव की मांग करना अपराध नहीं है।

अब सवाल यह है कि तिरंगा न फहराने देने की कॉल या समारोह बाधित करने की कोशिश को इन कानूनों के तहत कैसे देखा जाता है। अगर कोई सिर्फ मांग करता है या शांतिपूर्ण विरोध जताता है तो वह आमतौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है। लेकिन अगर वह कॉल हिंसा, पथराव, बैरिकेड तोड़ने, पुलिस पर हमला या सार्वजनिक संपत्ति नुकसान पहुंचाने के साथ जुड़ जाती है तो स्थिति बदल जाती है। पुलिस को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत संज्ञेय अपराध होने पर एफआईआर दर्ज करने और कार्रवाई करने का अधिकार है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का संवैधानिक कर्तव्य है।

पुलिस की कार्रवाई का आधार क्या है? पुलिस को कोई भी नया कानून बनाने का अधिकार नहीं है। वे मौजूदा कानूनों के तहत काम करते हैं। अगर किसी घटना में बीएनएस की धाराएं, राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम, सार्वजनिक संपत्ति नुकसान रोकथाम अधिनियम या दंगा-मारपीट की धाराएं लागू होती दिखें तो वे केस दर्ज कर सकती हैं। हांसी की घटना में पुलिस ने इन्हीं प्रावधानों का इस्तेमाल किया। लेकिन अदालत अंतिम फैसला करती है। गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है। जमानत, सबूत और मंशा की जांच अदालत करती है।

कानून के जानकारों की राय अलग-अलग है। कुछ वकील कहते हैं कि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम को हिंसक तरीके से बाधित करना सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ है और उस पर कार्रवाई जायज है। कुछ कहते हैं कि सिर्फ “कॉल” देने को देशद्रोह बताना अतिशयोक्ति है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में साफ है कि शांतिपूर्ण विरोध या सरकार की आलोचना राजद्रोह या देशद्रोह नहीं है। केदारनाथ सिंह मामले (1962) में अदालत ने कहा था कि हिंसा या अव्यवस्था का इरादा होना चाहिए। नई धारा 152 में भी यही भावना बरकरार रखने की कोशिश की गई है, लेकिन इसकी भाषा व्यापक होने की वजह से आलोचना हो रही है।

जनता के हक में क्या कानून हैं? संविधान हर नागरिक को शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है (अनुच्छेद 19)। प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन हिंसा, सड़क जाम जिससे आम लोगों को तकलीफ हो, या सरकारी काम में बाधा डालना अवैध हो सकता है। पुलिस को न्यूनतम बल का इस्तेमाल करना चाहिए। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुके हैं कि विरोध प्रदर्शन पर अत्यधिक बल या मनमानी गिरफ्तारी गलत है। अगर निर्दोष लोगों को जेल में डाला जाता है तो वे जमानत, हाईकोर्ट में याचिका या मुआवजे की मांग कर सकते हैं।

सरकारी कानूनों की बात करें तो फ्लैग कोड ऑफ इंडिया भी तिरंगे के सम्मान के नियम बताता है। लेकिन यह मुख्य रूप से प्रशासनिक निर्देश है। अपराध के लिए 1971 का अधिनियम और बीएनएस की धाराएं काम आती हैं। पुलिस की कार्यशैली पर अक्सर सवाल उठते हैं। कई मामलों में वीडियो वायरल होने के बाद जांच होती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि पुलिस को तथ्यों के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए, भावनाओं के आधार पर नहीं। अगर कोई प्रदर्शन हिंसक हो जाता है तो नियंत्रण जरूरी है। लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को देशद्रोही बताना संविधान की भावना के खिलाफ है।

व्यावहारिक रूप में देखा जाए तो तिरंगे का अपमान या जानबूझकर राष्ट्रीय समारोह में व्यवधान अगर हिंसा के साथ हो तो कानूनी कार्रवाई हो सकती है। लेकिन “कॉल” मात्र को देशद्रोह करार देना अदालत में साबित करना पड़ता है। मंशा, शब्दों का असर और वास्तविक घटनाक्रम महत्वपूर्ण होते हैं। कई मामलों में अदालतें एफआईआर रद्द कर देती हैं अगर सबूत कमजोर हों।

इस पूरे विषय पर संतुलित नजरिया जरूरी है। तिरंगा और स्वतंत्रता दिवस देश की एकता के प्रतीक हैं। उनका सम्मान हर नागरिक का कर्तव्य है (अनुच्छेद 51ए)। साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी लोकतंत्र की आत्मा है। कानून दोनों को संतुलित करने की कोशिश करता है। पुलिस को कानून का पालन करना है, न कि अपनी व्याख्या थोपना। अगर कोई निर्दोष है तो अदालत उसे राहत दे सकती है। जनता को भी कानून का सम्मान करना चाहिए और हिंसा से बचना चाहिए।

अंत में, संविधान में सीधे “तिरंगा न फहराने देना देशद्रोह” नहीं लिखा है। लेकिन अगर वह काम संप्रभुता, एकता या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा पहुंचाता है तो मौजूदा कानूनों के तहत कार्रवाई हो सकती है। पुलिस का अधिकार इन्हीं कानूनों से आता है। अंतिम फैसला अदालत का होता है। इस मुद्दे पर कानून के जानकार लगातार चर्चा कर रहे हैं कि धारा 152 का इस्तेमाल कितना संतुलित रहे। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार और राष्ट्रीय सम्मान दोनों महत्वपूर्ण हैं। दोनों का सम्मान ही सही रास्ता है।

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