आरक्षण की मलाई कितनी पीढ़ियों तक: क्या क्रीमी लेयर और लाभ के समान वितरण पर होनी चाहिए नई बहस?

आरक्षण की मलाई कितनी पीढ़ियों तक?
===मधु सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र. ==
आरक्षण का उद्देश्य उन लोगों को आगे लाना था जो सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के कारण वर्षों से अवसरों की दौड़ में पीछे छूट गए थे। लेकिन सवाल यह है कि दौड़ में आगे आ चुके परिवारों को ही बार-बार दौड़ में सबसे आगे खड़ा करना कितना न्यायपूर्ण है? बिहार में क्रीमी लेयर को लेकर सामान्य प्रशासन विभाग के नए निर्देश ने इसी पुराने सवाल को फिर से सामने ला दिया है। निर्देश के मुताबिक अधिकारी OBC आवेदक के माता-पिता की क्रीमी लेयर स्थिति तय करते समय उनकी नौकरी की तनख्वाह और खेती से होने वाली आय को आय सीमा में नहीं जोड़ेंगे।
सरकारी नियमों और न्यायिक व्याख्याओं के अपने तर्क हैं, लेकिन आम आदमी के मन में एक सीधा सवाल है। आय आखिर आय होती है, चाहे वह वेतन से आए, खेती से आए, व्यापार से आए या किसी दूसरे स्रोत से। मसलन, यदि किसी परिवार के माता-पिता करोड़पति हैं, आलीशान मकान में रहते हैं, महंगी गाड़ी चलाते हैं, बच्चों को देश-विदेश के महंगे संस्थानों में पढ़ाते हैं और आर्थिक रूप से किसी भी तरह से कमजोर नहीं हैं, तो केवल इसलिए उनकी संतान को गरीब या जरूरतमंद मान लेना कि माता-पिता की कोई खास आय क्रीमी लेयर की गणना में शामिल नहीं होती, सामान्य समझ से परे दिखाई देता है। आरक्षण सामाजिक न्याय का माध्यम है, आय छिपाने का गणित नहीं।
आरक्षण और आर्थिक स्थिति की वास्तविकता
यहां एक और विडंबना है। देश में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए जब आय की सीमा तय होती है तो परिवार की आर्थिक स्थिति का व्यापक आकलन किया जाता है। फिर सामाजिक आरक्षण में आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों की वास्तविक स्थिति को देखने में इतनी झिझक क्यों? यदि कोई परिवार अपनी आर्थिक हैसियत से समाज के सामान्य मध्यवर्ग से कहीं ऊपर पहुंच चुका है तो केवल जातिगत पहचान के आधार पर उसकी अगली पीढ़ी को भी वही प्राथमिकता लगातार मिलती रहे, इस पर बहस तो होनी ही चाहिए। हालांकि यह भी समझना होगा कि OBC आरक्षण और EWS एक जैसी व्यवस्थाएं नहीं हैं।
OBC में क्रीमी लेयर का सिद्धांत केवल गरीबी मापने के लिए नहीं है, बल्कि यह पहचानने के लिए है कि सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग में कौन लोग उस पिछड़ेपन से पर्याप्त रूप से बाहर निकल चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की आय देखकर नहीं किया जा सकता। माता-पिता का पद, सामाजिक स्थिति और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियां भी देखी जानी चाहिए। यानी असली बहस ‘आय जोड़ें या न जोड़ें’ से कहीं बड़ी है। बहस यह है कि किसी परिवार की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति को कैसे मापा जाए।
आरक्षण व्यवस्था में सुधार और लाभ का समान वितरण
यहीं आरक्षण व्यवस्था में एक और सुधार की जरूरत दिखाई देती है, जो है लाभ का समान वितरण। मान लीजिए किसी परिवार की पहली पीढ़ी को आरक्षण से सरकारी नौकरी मिली। दूसरी पीढ़ी को उसी आरक्षण से प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश मिला और तीसरी पीढ़ी तक परिवार आर्थिक तथा सामाजिक रूप से काफी मजबूत हो गया। दूसरी ओर उसी जाति का कोई परिवार आज भी कच्चे मकान, कमजोर शिक्षा और सीमित आय के साथ जीवन गुजार रहा है और उसे आरक्षण का एक भी लाभ नहीं मिला। यदि दोनों को हमेशा एक ही कतार में खड़ा किया जाएगा तो सामाजिक न्याय की अवधारणा अधूरी नहीं रह जाएगी?
क्यों न सरकार के पास ऐसा राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय डेटाबेस हो जिसमें यह दर्ज हो कि किन परिवारों को आरक्षण के माध्यम से शिक्षा, छात्रवृत्ति, सरकारी नौकरी अथवा अन्य अवसर मिल चुके हैं? इससे आरक्षण समाप्त नहीं होगा, बल्कि ‘जिसे अब तक नहीं मिला, उसे पहले मिले’ की नीति बनाई जा सकती है। जिसने आरक्षण के माध्यम से पर्याप्त सामाजिक-आर्थिक उन्नति कर ली है, उसे हमेशा के लिए वंचित करना जरूरी नहीं, लेकिन उसके बाद उसी समुदाय के किसी दूसरे जरूरतमंद परिवार को प्राथमिकता देना निश्चित रूप से विचारणीय हो सकता है। यह व्यवस्था जाति को समाप्त करने का दावा नहीं करती, बल्कि आरक्षण के भीतर ही अधिक न्याय पैदा करती है।
आरक्षण की मलाई और सामाजिक न्याय का असली अर्थ
आखिर आरक्षण किसी परिवार की पुश्तैनी जागीर तो नहीं है। संविधान ने अवसर की असमानता दूर करने के लिए विशेष प्रावधान दिए हैं, किसी परिवार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सरकारी अवसरों पर स्थायी प्राथमिकता देने के लिए नहीं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि आरक्षण पर बहस होते ही दो खेमे बन जाते हैं। एक आरक्षण का विरोध करता है और दूसरा आरक्षण की हर व्यवस्था का बचाव करता है। जबकि वास्तविक बहस इन दोनों अतियों के बीच होनी चाहिए। आरक्षण रहे, लेकिन उसका लाभ वास्तव में वंचित तक पहुंचे।
जातिगत पिछड़ेपन को नजरअंदाज न किया जाए, लेकिन परिवार की वास्तविक प्रगति को भी आंखों से ओझल न किया जाए। क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल कागज पर आय के कॉलम से नहीं, बल्कि वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति से हो। बिहार का यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें उस असहज सवाल के सामने खड़ा करता है जिसे राजनीतिक सुविधा के कारण अक्सर टाल दिया जाता है। आरक्षण की मलाई आखिर कितनी पीढ़ियों तक एक ही परिवार खाता रहेगा और उस कतार में खड़े बाकी लोगों की बारी कब आएगी?
सामाजिक न्याय का अर्थ यह नहीं कि एक ही व्यक्ति को बार-बार बैसाखी दी जाए। सामाजिक न्याय का असली अर्थ तो यह है कि जिसे बैसाखी की जरूरत है, उसे वह मिले और जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाए तो उसी कतार में खड़े दूसरे जरूरतमंद को आगे आने का अवसर मिले। आरक्षण की सफलता इसी में होगी कि एक दिन उसके लाभार्थियों की संख्या नहीं, बल्कि उसके कारण पीछे छूटे लोगों की संख्या कम हो। वरना व्यवस्था बदलती रहेगी, नियमों की व्याख्या बदलती रहेगी, आय की परिभाषाएं बदलती रहेंगी, लेकिन आरक्षण की मलाई उन्हीं बर्तनों में घूमती रहेगी।