राजीव गांधी महाविद्यालय उचाना में हुआ सांग समारोह का आयोजन, पिंगला भरथरी और राजा नल दमयंती की कथाओं ने मोहा मन

राजीव गांधी महाविद्यालय उचाना में हुआ सांग समारोह का आयोजन, पिंगला भरथरी और राजा नल दमयंती की कथाओं ने मोहा मन

सांग पिंगला भरथरी की कथा इस राजा भर्तृहरि और रानी पिंगला की कहानी मोह, धोखे और वैराग्य की एक प्रसिद्ध लोककथा है।

नरेंद्र जेठी/नरवाना  /12 सितंबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से शैडो चिल्ड्रेन रिसर्च सेंटर फॉर थिएटर एंड टीवी द्वारा सांग पिंगला भरथरी और ऑन थिएटर Group द्वारा राजा नल दमयंती सांगों से एक दिवसीय सांग समारोह का आयोजन राजीव गांधी महाविद्यालय उचाना में किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्य जगतवीर सिंह सहरावत जी ने की। उन्होंने कहा कि हमें वर्तमान पीढ़ी के लिए ऐसे आयोजन करते रहना चाहिए जिससे हमारी परंपराएं धूमिल न हों। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्री पवन कुमार निदेशक आकाशवाणी हिसार उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि सांग हमारी विरासत हैं हमें इसको सहेज कर रखना चाहिए और यह आने वाली पीढ़ी के लिए धरोहर है।

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सांग पिंगला भरथरी की कथा

सांग पिंगला भरथरी की कथा राजा भर्तृहरि और रानी पिंगला की कहानी मोह, धोखे और वैराग्य की एक प्रसिद्ध लोककथा है। उज्जैन के राजा भर्तृहरि अपनी रानी पिंगला से अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार उनके दरबार में गुरु गोरखनाथ आए। राजा की सेवा से प्रसन्न होकर गुरु गोरखनाथ ने उन्हें एक अमर फल दिया। इस फल को खाने वाला व्यक्ति हमेशा के लिए अमर और युवा हो जाता था। राजा भर्तृहरि ने सोचा कि उन्हें जवानी की क्या आवश्यकता है यदि रानी पिंगला अमर और सुंदर बनी रहे तो उत्तम होगा। यह सोचकर राजा ने वह फल पिंगला को दे दिया। रानी पिंगला राजा से सच्चा प्रेम नहीं करती थी, उसका प्रेम दरबार के एक अन्य सेवक यानी कि घुड़साल के दरोगा या अश्वपाल के साथ था। पिंगला ने वह अमर फल उस सेवक को दे दिया। सच का खुलासा तब हुआ जब वह सेवक उस फल को अपनी प्रेमिका यानी एक वैश्या को दे आया। उस वैश्या ने सोचा कि राजा ही इस राज्य के मालिक हैं और वे ही दीर्घजीवी होने चाहिए, इसलिए उसने वह फल राजा भर्तृहरि को उपहार में दे दिया। राजा ने जब उस वैश्या से पूछा कि उसे यह फल कहां से मिला, तो उसने कोतवाल या सेवक का नाम बता दिया।

वैराग्य की उत्पत्ति और राजपाठ त्याग

सख्ती से जांच करने पर सच सामने आ गया कि राजा ने जो फल रानी पिंगला को दिया था, उसने वह किसी और को दे दिया था। इससे राजा भर्तृहरि का मोह भंग हो गया। उन्हें संसार की असारता और धोखे का ज्ञान हुआ। इसके बाद राजा ने अपना राजपाठ अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को सौंप दिया और गुरु गोरखनाथ के शिष्य बनकर वैराग्य धारण कर लिया।

सांग राजा नल दमयंती की कथा

इसी प्रकार आन थिएटर Group द्वारा सांग राजा नल दमयंती प्रस्तुत किया गया जिसकी कथा इस प्रकार है। विदर्भ देश के राजा भीम की सुंदर और गुणवान पुत्री दमयंती एक दिन अपने बाग में बैठी थी। कुछ हंसों ने आपस में बातचीत करते हुए निषध देश के प्रतापी, रूपवान और बलवान राजा नल के गुणों और सुंदरता की प्रशंसा की। इससे दमयंती के मन में राजा नल के प्रति प्रेम जाग गया। दमयंती की दशा देखकर उसके माता-पिता ने स्वयंवर रचाया। इंद्रादि देवता जिनमें इंद्र, वरुण, अग्नि और यम शामिल थे, वे भी दमयंती से विवाह की इच्छा लेकर आए और राजा नल को ही अपना दूत बनाकर दमयंती के पास भेजा। नल ने धर्म और सत्य का पालन करते हुए देवताओं का संदेश दमयंती को दिया, लेकिन दमयंती ने केवल राजा नल को ही अपना पति चुन रखा था।

स्वयंवर और कलयुग का प्रवेश

स्वयंवर में दमयंती ने सभी देवताओं को छोड़कर राजा नल के गले में वरमाला डाल दी। देवताओं ने प्रसन्न होकर नल को विशेष वरदान दिए और वहाँ से विदा हुए। रास्ते में लौटते समय देवताओं की भेंट कलयुग से हुई। कलयुग दमयंती से विवाह करना चाहता था और देवताओं द्वारा नल को वरदान दिए जाने पर वह राजा नल से ईर्ष्या करने लगा तथा उनके जीवन को कष्टमय बनाने की ठान ली। कलयुग ने राजा नल की बुद्धि में प्रवेश करने का बहुत प्रयास किया, लेकिन 12 वर्षों तक नल के अंदर कोई भी अवगुण या पाप नहीं मिला। अंततः जब नल से एक बार पूजा के समय छोटी सी चूक हुई, तो कलयुग ने प्रवेश कर लिया। कलयुग के प्रभाव से नल को जुए की लत लग गई, और उसने जुए में अपना सारा राजपाट अपने भाई पुष्कर से हार दिया।

वनवास और पुनर्मिलन

राजा नल और रानी दमयंती अपना सब कुछ त्यागकर वनों में भटकने लगे। विपत्ति के इस दौर में भी दमयंती ने हर परिस्थिति में नल का साथ निभाया। कलयुग के छल और शनिदेव के प्रकोप के कारण दोनों को करुणिक और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। एक समय राजा नल ने भ्रमित होकर या दमयंती की रक्षा के लिए उसे जंगल में सोते हुए छोड़ दिया। इसके बाद दमयंती अपने पिता के घर पहुँची और नल ने अयोध्या के राजा ऋतुपर्णा के यहाँ एक रसोइया व सारथी के रूप में छद्म वेश में शरण ली। बाद में दमयंती ने नल को ढूंढने के लिए दूसरे स्वयंवर की घोषणा की। नल ऋतुपर्णा के साथ वहाँ पहुँचे, सत्य की पहचान हुई, दोनों का मिलन हुआ, और नल ने पुनः जुए में अपना राज्य जीतकर दमयंती के साथ सुखी जीवन व्यतीत किया। इस अवसर पर कलाकार समुद्र सिंह, लीला राम शास्त्री, राजपाल, दमनदीप, सुरेश कुमार, आनंद, कृष्ण लाल, हारमोनियम पर हबीब और कुलदीप, नचर या नृतक दीपक, पवन, रफीक, संदीप, नगाड़ा रांझा रहे। मंच संचालन डॉ प्रीति द्वारा किया गया। इस दौरान राजेश श्योकंद, वरिष्ठ साहित्यकार ओमप्रकाश चौहान, हिमानी गुप्ता, सुभाष डिगाना राष्ट्रीय युवा अवार्डी, मंजू मानव, रेडियो उद्घोषक और चुटकुला सम्राट श्री आजाद दुहन मौजूद रहे।

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