संस्कारों से खाली होती नई पीढ़ी का सबसे दर्दनाक सच: चिता पर लकड़ियाँ कम, रिश्ते अधिक जल रहे थे

संस्कारों से खाली होती नई पीढ़ी का सबसे दर्दनाक सच: चिता पर लकड़ियाँ कम, रिश्ते अधिक जल रहे थे

समाज की संवेदनहीनता अब कोई छिपी हुई बीमारी नहीं, बल्कि खुले घाव की तरह फैल रही है। जब कोई पिता, जिसने अपनी जवानी के सपने कुचलकर बेटियों को आत्मनिर्भर बनाया, बुढ़ापे में सोनीपत के वृद्धाश्रम की चारदीवारी में अंतिम सांस लेता है और उसकी संतानें अंतिम संस्कार में शरीर से नहीं, केवल पैसों या स्क्रीन से जुड़ती हैं, तब यह घटना एक परिवार की नहीं, पूरे युग की कहानी बन जाती है। शिवचरण गुप्ता जैसे पिता की चिता के सामने खड़े समाजसेवियों के कंधे बताते हैं कि रिश्ते अब खून से नहीं, सुविधा से तय होते हैं। तकनीक ने हाथों को जोड़ दिया, लेकिन हृदय को अलग कर दिया। यह विडंबना नहीं, एक चेतावनी है कि हम इंसानियत की परिभाषा ही बदल रहे हैं।

एक समय था जब पिता की अंतिम यात्रा में बेटियों का कंधा देना सबसे बड़ा धर्म माना जाता था। आज वही धर्म वीडियो कॉल और पाँच हजार एक सौ रुपये में सिमट गया है। तीनों आत्मनिर्भर और सफल बेटियाँ—एक नेपाल, एक मुंबई, एक आजमगढ़ में—बाप की मृत्यु की खबर सुनकर भी शरीर से नहीं पहुँचीं। उल्लेखनीय है कि बीमारी की सूचना लगभग 20 दिन पहले दे दी गई थी, फिर भी कोई बेटी नहीं पहुँची। क्या शिक्षा ने उन्हें केवल डिग्री दी और संवेदना छीन ली? पिता ने करोड़ों का कारोबार खोकर भी बेटियों को पढ़ा-लिखाया, पर बेटियों ने अंतिम क्षण में उपस्थिति का कर्ज नहीं चुकाया। यह लेन-देन नहीं, भावनात्मक दिवालियापन है।

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वृद्धाश्रम और अनाथ होते माता-पिता की सच्चाई

वृद्धाश्रम अब अनाथों के नहीं, उन माता-पिता के घर बन गए हैं जिनके बच्चे सफल हैं। शिवचरण गुप्ता ने मुंबई में कपड़े का साम्राज्य खड़ा किया था, फिर सब कुछ खोया, पत्नी भी चली गईं, फिर भी बेटियों को आत्मनिर्भर बनाया। करीब डेढ़-दो साल पहले पत्नी के साथ वृद्धाश्रम पहुंचे और पत्नी मीना गुप्ता का निधन भी आश्रम में हुआ था तब भी बेटियाँ नहीं आई थीं। अब पिता की चिता पर भी वही दृश्य देखने को मिला जहाँ समाज ने कंधा दिया और आँखें दान हुईं जिससे दो दृष्टिहीनों को रोशनी मिली।

तकनीक की जीत और इंसानियत की हार

आधुनिक जीवन की भागदौड़ ने रिश्तों को समयसारिणी में कैद कर दिया है। करियर, शहर, विदेश सब जरूरी लगते हैं, पर माता-पिता का अंतिम संस्कार फालतू लगने लगा है। वीडियो कॉल के दौरान एक बेटी की यह टिप्पणी भी सामने आई कि कितना समय लगेगा, जो रिश्तों की ठंडक को पूरी तरह उजागर करती है। शिवचरण गुप्ता की आँखें दो अजनबियों को प्रकाश दे गईं, पर अपनी संतानों को भावनात्मक अंधकार दे गईं। यह दृश्य आँसू नहीं, आत्मा को हिला देता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक गहरी चेतावनी है।

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