मनुष्य जीवन का मुख्य लक्ष्य परमात्मा की पहचान करके मुक्ति प्राप्त करना है: संत निरंकारी सत्संग भवन सेक्टर 30 चंडीगढ़ में विशाल सत्संग का आयोजन

Team Atal Hind10 August 20263 min read78 viewsचंडीगढ़
मनुष्य जीवन का मुख्य लक्ष्य परमात्मा की पहचान करके मुक्ति प्राप्त करना है: संत निरंकारी सत्संग भवन सेक्टर 30 चंडीगढ़ में विशाल सत्संग का आयोजन

संत निरंकारी सत्संग भवन, सेक्टर-30, चंडीगढ़ में एक विशाल सत्संग का आयोजन किया गया। इस सत्संग में संत निरंकारी मंडल, दिल्ली के केंद्रीय ज्ञान प्रचारक श्री इन्द्रजीत शर्मा जी ने हजारों श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन का मुख्य लक्ष्य परमात्मा की पहचान करके मुक्ति प्राप्त करना है। सत्संग में आकर केवल आध्यात्मिक विचारों को सुनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनसे प्राप्त भक्ति की पूंजी को अपने जीवन और व्यवहार में उतारना ही वास्तविक आध्यात्मिक उपलब्धि है। उन्होंने बताया कि प्रभु सिमरन, मानव सेवा, सत्संग और विनम्रता के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन को निरंकार परमात्मा के साथ इकमिक कर सकता है।

मानव जीवन का उद्देश्य और आवश्यकता बनाम इच्छा

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मानव जीवन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए श्री शर्मा जी ने कहा कि मनुष्य इस संसार में केवल भौतिक उपलब्धियों के लिए नहीं आया, बल्कि परमात्मा की पहचान और मुक्ति की ओर बढ़ने के लिए आया है। भगवान महावीर के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मुक्ति गुरु की शरण में प्राप्त होती है। उन्होंने आवश्यकता और इच्छा में अंतर समझाते हुए कहा कि आवश्यकता पूरी हो जाने के बाद भी इच्छाएं समाप्त नहीं होतीं। इच्छा एक ऐसी अग्नि है जिसे संसार की सारी संपत्ति भी शांत नहीं कर सकती। इसलिए मनुष्य को अनावश्यक इच्छाओं से मुक्त होकर संतोष और समर्पण का भाव विकसित करना तथा सत्संग, सेवा और सिमरन का मार्ग अपनाना चाहिए।

सत्संग का महत्व और अहंकार का त्याग

सत्संग के महत्व को समझाते हुए उन्होंने बाबा गुरबचन सिंह जी के एक दृष्टांत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कपड़े की मैल निकल जाने के बाद उसमें बचे साबुन को निकालना भी आवश्यक होता है, अन्यथा साबुन कपड़े को खराब कर देता है, उसी प्रकार सत्संग से मन की मैल दूर होने के पश्चात उसके भीतर छिपे अहंकार को भी समाप्त करना आवश्यक है। सत्संग से नम्रता, धैर्य, सहनशीलता, करुणा, स्नेह और प्रेम जैसे दैवी गुण प्राप्त होते हैं, लेकिन इन गुणों का भी कभी अहंकार नहीं होना चाहिए। श्री शर्मा जी ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में ऐसी विनम्रता और सहनशीलता विकसित करनी चाहिए, जैसी रास्ते के रोड़े और धरती में होती है।

सिमरन और गृहस्थ जीवन में आध्यात्मिकता

श्री शर्मा जी ने सिमरन को आध्यात्मिक जीवन का आधार बताते हुए कहा कि सिमरन केवल शब्दों का दोहराव नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास के माध्यम से मन को परमात्मा में टिकाने की प्रक्रिया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार एक छोटा बच्चा बार-बार प्रयास और अभ्यास करके चलना सीखता है और आगे चलकर सहज रूप से दौड़ने लगता है, उसी प्रकार निरंतर सिमरन के अभ्यास से मन भी धीरे-धीरे स्थिर और एकाग्र होने लगता है। उन्होंने समझाया कि गृहस्थ जीवन की सभी जिम्मेदारियां निभाते हुए मनुष्य का ध्यान निरंकार परमात्मा से जुड़ा रह सकता है। संसार में रहते हुए कारोबार, परिवार और सामाजिक दायित्व निभाना आवश्यक है, लेकिन अपने वास्तविक आध्यात्मिक लक्ष्य को कभी नहीं भूलना चाहिए।

युवा पीढ़ी से आह्वान और समापन

श्री शर्मा जी ने युवा पीढ़ी का विशेष रूप से आह्वान करते हुए कहा कि वे सत्संग, सेवा और सिमरन को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएं। उन्होंने कहा कि भौतिक प्रगति के साथ आध्यात्मिक मूल्यों का होना भी आवश्यक है और प्रेम, नम्रता, सहनशीलता तथा मानवता जैसे गुण जीवन को वास्तविक सुंदरता प्रदान करते हैं। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि सत्संग में सुने हुए विचारों को अपने आचरण में उतारें और निरंतर सिमरन, सेवा तथा विनम्रता के माध्यम से अपने जीवन को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाएं। इससे पूर्व संत निरंकारी सत्संग भवन, सेक्टर-30 के संयोजक श्री नवनीत पाठक जी ने समस्त साधसंगत की ओर से श्री इन्द्रजीत शर्मा जी का चंडीगढ़ पधारने पर स्वागत एवं धन्यवाद व्यक्त किया।

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