सरकारों का दोहरा चरित्र: शराब और जाति

हमारे देश में सरकारी नीतियों और उनके क्रियान्वयन के बीच का अंतर हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। एक तरफ जहां सरकारें समाज के कल्याण के लिए कई योजनाएं चलाती हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ नीतियां ऐसी भी होती हैं जो आपस में टकराती हुई प्रतीत होती हैं।
सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि शासन व्यवस्था को चलाने के लिए राजस्व और सामाजिक सुधार दोनों की जरूरत होती है। हालांकि, जब ये दोनों एक-दूसरे के विपरीत दिशा में काम करते हैं, तो आम जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।
नई दिल्ली /24 अगस्त 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
सरकारें कितनी बड़ी कलाकार होती हैं। ये बात सिर्फ कहने की नहीं है। रोजमर्रा की जिंदगी में ये साफ दिखता है। एक तरफ सरकार खुद शराब बेचती है। दूसरी तरफ नशा मुक्ति की रैली भी निकालती है। एक तरफ जाति प्रमाण पत्र खुद जारी करती है। दूसरी तरफ जात-पात मिटाने की बातें भी करती है। ये दोहरा खेल सालों से चल रहा है।
शराब की बात पहले करते हैं। भारत के ज्यादातर राज्यों में शराब की बिक्री सरकार के नियंत्रण में है। कई राज्यों में तो सरकारी ठेके ही शराब बेचते हैं। राजस्व का बड़ा हिस्सा शराब से आता है। बजट में ये आंकड़े साफ दिखते हैं। सरकार कहती है कि शराब से होने वाली आमदनी स्कूल, सड़क और अस्पताल बनाने में लगती है। लेकिन सच्चाई ये भी है कि शराब से घर टूटते हैं। युवा बर्बाद होते हैं। महिलाओं पर हिंसा बढ़ती है।
फिर भी सरकार नशा मुक्ति अभियान चलाती है। रैली निकलती है। पोस्टर लगते हैं। नारे लगते हैं। “नशा छोड़ो, देश जोड़ो” जैसे नारे सुनाई देते हैं। टीवी पर विज्ञापन आते हैं। स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम होते हैं। लेकिन उसी शहर में सरकारी शराब की दुकान खुली रहती है। शाम को लाइन लग जाती है। लोग खरीदते हैं। सरकार का खजाना भरता है। ये विरोधाभास कितना बड़ा है, ये सोचने वाली बात है।
कई राज्यों में शराब बंदी के नाम पर प्रयोग हुए। बिहार में शराबबंदी लागू है। लेकिन अवैध शराब का कारोबार फल-फूल रहा है। मौतें हो रही हैं। पुलिस छापे मारती है। फिर भी सप्लाई नहीं रुकती। कुछ राज्य शराब को पूरी तरह खोल देते हैं। पर्यटन बढ़ाने के नाम पर। राजस्व बढ़ाने के नाम पर। दोनों तरफ सरकार फायदे में रहती है। नशा मुक्ति का काम सिर्फ दिखावे का लगता है।
अब जाति की बात करते हैं। संविधान में छुआछूत और जातिगत भेदभाव खत्म करने की बात लिखी है। डॉ. अंबेडकर ने जाति व्यवस्था को जड़ से उखाड़ने की कोशिश की। लेकिन आज भी जाति प्रमाण पत्र सरकार खुद जारी करती है। नौकरी के लिए चाहिए। कॉलेज एडमिशन के लिए चाहिए। स्कॉलरशिप के लिए चाहिए। आरक्षण के लिए चाहिए। बिना जाति प्रमाण पत्र के कई फायदे नहीं मिलते।सरकार कहती है कि हम जात-पात मिटाना चाहते हैं। समानता लाना चाहते हैं। लेकिन फॉर्म भरते समय सबसे पहले जाति पूछी जाती है। आधार कार्ड से लेकर वोटर लिस्ट तक कई जगह जाति का कॉलम होता है। चुनाव के समय जाति के समीकरण बनाए जाते हैं। वोट बैंक की राजनीति होती है। एक तरफ “सबका साथ, सबका विकास” का नारा। दूसरी तरफ जाति के आधार पर वोट मांगना। ये दोहरा चरित्र साफ दिखता है।
जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए लोग दफ्तरों के चक्कर काटते हैं। तहसीलदार के यहां लाइन लगती है। गलत जाति लिखने के आरोप लगते हैं। कभी-कभी झूठे प्रमाण पत्र भी बन जाते हैं। कोर्ट में मुकदमे चलते हैं। सरकार कहती है कि हम जाति व्यवस्था खत्म कर रहे हैं। लेकिन सिस्टम ऐसा बना रखा है कि जाति के बिना काम नहीं चलता। ये विडंबना है।
शराब और जाति दोनों मामलों में एक बात समान है। सरकार एक तरफ समस्या पैदा करती है या बनाए रखती है। दूसरी तरफ समाधान का दिखावा करती है। शराब बेचकर नशा बढ़ाती है। फिर नशा मुक्ति की बात करती है। जाति प्रमाण पत्र देकर जाति को जिंदा रखती है। फिर जात-पात मिटाने की बात करती है। ये कलाकारी किसी बड़े जादूगर से कम नहीं।
लोगों को ये समझना चाहिए कि ये सिर्फ नीति की बात नहीं है। ये सोच की बात है। जब तक राजस्व का लालच रहेगा, शराब बिकती रहेगी। जब तक वोट बैंक का लालच रहेगा, जाति जिंदा रहेगी। नशा मुक्ति रैली और जात-पात मिटाने के भाषण सिर्फ जनसंपर्क के औजार बनकर रह जाते हैं।
कुछ राज्य बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं। शराब की दुकानों की संख्या कम करने की बात होती है। जाति के बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण की चर्चा होती है। लेकिन बड़े पैमाने पर बदलाव नहीं दिखता। पुरानी आदतें जल्दी नहीं जातीं। सरकारें पुरानी राह पर ही चलती रहती हैं।
आम आदमी इन बातों को देखता है। समझता है। लेकिन कुछ नहीं कर पाता। क्योंकि सिस्टम बहुत बड़ा है। एक व्यक्ति या एक समूह आसानी से नहीं बदल सकता। जरूरत है कि लोग सवाल पूछें। पूछें कि शराब बेचकर नशा मुक्ति कैसे होगी। पूछें कि जाति प्रमाण पत्र देकर जात-पात कैसे मिटेगी। ये सवाल जब तक नहीं पूछे जाएंगे, ये दोहरा खेल चलता रहेगा।
मीडिया भी इन मुद्दों को उठाता है। कभी-कभी तीखे सवाल पूछे जाते हैं। लेकिन फिर खबरें दब जाती हैं। नई खबरें आ जाती हैं। पुरानी बातें भूल जाती हैं। सरकारें फिर से वही काम करती रहती हैं। कलाकार की तरह। एक चेहरा दिखाती हैं। दूसरा चेहरा छिपा लेती हैं।
शराब से होने वाले नुकसान के आंकड़े कई रिपोर्ट में आते हैं। परिवार टूटते हैं। बच्चे प्रभावित होते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ बढ़ता है। फिर भी राजस्व का तर्क सबसे ऊपर रहता है। नशा मुक्ति के बजट की तुलना में शराब से होने वाली आय कई गुना ज्यादा होती है। ये आंकड़े खुद बहुत कुछ कह देते हैं।
जाति के मामले में भी आंकड़े हैं। जातिगत हिंसा की घटनाएं कम नहीं हुई हैं। अंतरजातीय शादियों पर अभी भी हमले होते हैं। गांवों में कई जगह छुआछूत बाकी है। शहरों में भी सूक्ष्म रूप में भेदभाव दिखता है। सरकार कहती है कि हम कानून बना रहे हैं। सख्ती कर रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। प्रमाण पत्र का सिस्टम जाति को कानूनी रूप से जिंदा रखता है।
दोनों मुद्दों को साथ रखकर देखें तो साफ पता चलता है। सरकारें समस्या को हल करने के बजाय प्रबंधित करती हैं। शराब को नियंत्रित करके बेचती हैं। जाति को आरक्षण और प्रमाण पत्र के जरिए प्रबंधित करती हैं। समस्या जड़ से नहीं हटती। बस नियंत्रण में रहती है। और नियंत्रण में रहने से राजस्व और वोट दोनों मिलते रहते हैं।
लोगों की जिम्मेदारी भी है। सिर्फ सरकार को दोष देना काफी नहीं। शराब खरीदने वाले भी हैं। जाति के नाम पर वोट देने वाले भी हैं। जब तक समाज खुद नहीं बदलेगा, सरकारें भी नहीं बदलेंगी। जागरूकता जरूरी है। लेकिन जागरूकता सिर्फ रैली और भाषण से नहीं आती। रोजमर्रा के व्यवहार से आती है।
कुछ संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता लगातार काम कर रहे हैं। नशा मुक्ति केंद्र चला रहे हैं। जाति भेद के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। लेकिन उनका दायरा सीमित है। सरकार का तंत्र बहुत बड़ा है। इसलिए प्रभाव भी सीमित रहता है। फिर भी ये प्रयास बंद नहीं होने चाहिए।
अंत में एक बात साफ है। सरकारें कलाकार जरूर हैं। लेकिन ये कलाकारी जनता की कीमत पर हो रही है। शराब बेचकर नशा मुक्ति का नाटक। जाति प्रमाण पत्र देकर जात-पात मिटाने का नाटक। ये नाटक कब तक चलेगा, ये जनता पर निर्भर करता है। जब जनता सवाल करेगी, तब शायद पर्दा हटेगा। तब शायद असली चेहरा दिखेगा। और तब शायद कुछ बदलाव की उम्मीद बनेगी।
ये सिर्फ एक लेख नहीं है। ये एक आईना है। जिसमें सरकारों का दोहरा चरित्र साफ दिखता है। अब इस आईने को कितने लोग देखेंगे और कितने लोग नजरअंदाज करेंगे, ये समय बताएगा। लेकिन सच तो सच ही रहता है। चाहे कितना भी छिपा लो।