बुजुर्गों का भरण-पोषण कानूनन जिम्मेदारी: संतानों की लापरवाही पर अदालतें सख्त, जानिए क्या हैं नियम और अधिकार

बुजुर्गों का भरण-पोषण कानूनन जिम्मेदारी: संतानों की लापरवाही पर अदालतें सख्त, जानिए क्या हैं नियम और अधिकार

बदलते परिवेश में बहुत सी संतानों को बुजुर्गों की सेवा, भरण-पोषण और दवा की जिम्मेदारी बोझ लगने लगी है। यह एक कड़वी और चिंताजनक सच्चाई बन चुकी है। आधुनिकता, एकल परिवार की चाहत और भागदौड़ भरी जिंदगी में कई बच्चे अपने जन्मदाताओं को ही बोझ समझने लगे हैं। ऐसे में बुजुर्गों को न केवल मानसिक रूप से अकेलापन झेलना पड़ता है, बल्कि कई बार वे बुनियादी जरूरतों जैसे भोजन और स्वास्थ्य के लिए भी मोहताज हो जाते हैं। आजकल अनेक संतानें शादी के बाद अपने माता-पिता की ओर से आंखें फेर लेती हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य किसी न किसी तरह उनकी सम्पत्ति पर कब्जा करना ही रह जाता है। जिस कारण अनेक बुजुर्ग अपनी ही संतानों के हाथों अपमान और अत्याचारों का शिकार हो रहे हैं।

भारत सरकार और देश की न्यायपालिका ने बुजुर्गों के संरक्षण के लिए कड़े कदम उठाए हैं। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण अधिनियम, 2007 के तहत यदि संतानें माता-पिता की देखभाल नहीं करती हैं, तो बुजुर्ग अपने क्षेत्र के एसडीएम कार्यालय में शिकायत कर गुजारा भत्ता मांग सकते हैं। संपत्ति वापसी का नियम धारा 23 के तहत, सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न अदालतों के फैसलों के अनुसार, यदि किसी बुजुर्ग ने इस शर्त पर अपनी संपत्ति संतानों के नाम की थी कि वे बुढ़ापे में उनकी सेवा करेंगे और बाद में बच्चे मुकर जाते हैं, तो बुजुर्ग अपनी गिफ्ट डीड या संपत्ति हस्तांतरण को निरस्त करवाकर संपत्ति वापस ले सकते हैं। घर से बेदखली के नियम के अनुसार अगर बच्चे अपने माता-पिता के ही घर में रहकर उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं या सेवा नहीं करते, तो कोर्ट उन्हें घर से बाहर निकालने का आदेश दे सकता है। इसीलिए माता-पिता अपनी सम्पत्ति की वसीयत तो अपने बच्चों के नाम अवश्य कर दें परंतु इसे तुरंत ट्रांसफर न करें। ऐसा करके वे अपने जीवन की संध्या में आने वाली कई परेशानियों से बच सकते हैं।

कानूनी प्रावधान और अदालती फैसले

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भारत में वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण कल्याण अधिनियम, 2007 के अंतर्गत स्पष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इनका इस्तेमाल करके संतानों द्वारा अपने कर्त्तव्य का पालन न करने, प्रताड़ित करने या संपत्ति हड़पने का प्रयास करने पर बुजुर्ग अपनी संतानों को दी हुई सम्पत्ति उनसे वापस लेने के लिए उन्हें कानूनन बाध्य कर सकते हैं। न्यायपालिका द्वारा इस साल कई ऐसे ही फैसले दिए गए जिनमें साफ कहा गया है कि अपने बुजुर्गों की देखभाल और भरण-पोषण सेवा संतानों का फर्ज ही नहीं बल्कि कानूनन बाध्यता भी है। बीती 2 फरवरी को कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस सूरज गोविंदराज ने अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल न करने वाले एक दम्पति को ट्रांसफर की गई संपत्ति का मालिकाना हक उनके बुजुर्गों को वापस दिलवाया।

विभिन्न उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के अहम आदेश

6 फरवरी को झारखंड हाई कोर्ट ने बेटे और बहू द्वारा उत्पीड़ित लखन लाल पोद्दार और उनकी पत्नी उमा रानी पोद्दार की याचिका पर सुनवाई के दौरान एसडीएम द्वारा पारित आदेश को बहाल रखा। अदालत ने पीड़ित दम्पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके बेटे और बहू को तुरंत अपने माता-पिता का जबरन कब्जाया मकान खाली करने का आदेश दिया। 2 मई को दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार ने बुजुर्गों को भरण-पोषण कल्याण अधिनियम के अंतर्गत अपने सास-ससुर को प्रताड़ित करने वाली एक महिला को घर से निकाल बाहर करने का मैंटेनेंस ट्रिब्यूनल का फैसला सही ठहराया। 9 मई को गदरपुर उत्तराखंड में माता-पिता तथा वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिकरण न्यायालय ने बेटे व बहू के अत्याचारों के शिकार बुजुर्ग दम्पति के बेटे और बहू को उनकी संपत्ति से बेदखल करने के आदेश जारी किए। 4 जुलाई को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने 93 वर्षीय बुजुर्ग महिला संतोष खन्ना की शिकायत पर उनके बड़े बेटे देवेंद्र और बहू नीरजा को तुरंत उनका घर खाली करने का आदेश दिया।

वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि

20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराध्य ने लखनऊ की एक 81 वर्षीय बुजुर्ग महिला को वृद्धाश्रम जाने के लिए मजबूर करने वाले उसके पोते और बहू को तुरंत उनके घर से निकाल बाहर करने का आदेश दिया। 28 अगस्त को बॉम्बे हाई कोर्ट ने पुणे के एक फ्लैट से बेटे को तुरंत बेदखल करने के एडिशनल कलेक्टर के आदेश को सही करार दिया। अदालत ने कहा कि बुजुर्ग माता-पिता को अपनी प्रॉपर्टी में पूरी शांति, गरिमा और सुरक्षा के साथ रहने का पहला अधिकार है। यदि बेटा या बहू उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा बनते हैं या खर्चा व दवाइयों की जिम्मेदारी नहीं उठाते, तो उन्हें उनके घर में रहने का कोई अधिकार नहीं है। हाल ही में 11 सितम्बर को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जे. जे. मुनीर तथा जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने श्याम जी शुक्ला नामक बुजुर्ग द्वारा दायर याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी वरिष्ठ नागरिक की जान और सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए जरूरी होने पर उसके बेटे तथा अन्य रिश्तेदार को उसके घर से निकल जाने का आदेश दिया जा सकता है। जाहिर है कि उक्त फैसले स्पष्ट करते हैं कि वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार कानूनी रूप से सुरक्षित हैं।

सामाजिक जागरूकता और हेल्पलाइन नंबर

बच्चों द्वारा अपनी जिम्मेदारी न निभाने पर बुजुर्गों के पास कानूनी विकल्प मौजूद हैं और आवश्यकता केवल उनका इस्तेमाल करने की है। नई पीढ़ी को बचपन से ही माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति आदर और सेवा भाव सिखाना जरूरी है। समाज के पीड़ित बुजुर्गों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। संतानों को यह समझना होगा कि बुढ़ापे में माता-पिता को केवल पैसों की नहीं, बल्कि उनके समय और अपनेपन की जरूरत होती है। माता-पिता की सेवा करना केवल एक नैतिक कर्तव्य नहीं बल्कि हमारा कानूनी दायित्व भी है। संतानों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आज वे जो व्यवहार अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं, कल उनकी अपनी संतानें भी उनके साथ वही दोहरा सकती हैं। यदि आपके आसपास कोई बुजुर्ग इस तरह की प्रताड़ना का शिकार है, तो वे सीधे राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर 14567 पर संपर्क करके मदद पा सकते हैं।

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