सेप्टिक टैंक हादसे: तमिलनाडु के त्रिची में सफाई के दौरान दो युवकों की मौत, व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

सैप्टिक टैंक हादसे:चमचमाते शहरों के नीचे दम तोड़ती जिंदगियां**
कुमार कृष्णन-विभूति फीचर्स
तमिलनाडु के त्रिची जिले में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दो युवकों की मौत महज एक दुखद दुर्घटना नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जिसमें शहरों और गांवों की स्वच्छता का बोझ उठाने वाले श्रमिकों की जिंदगी को आज भी सबसे सस्ता संसाधन समझ लिया जाता है।
2 सितंबर को अन्नई नगर, वडुगरपट्टी के पास लगभग बारह फुट गहरे सेप्टिक टैंक में जहरीली गैस के संपर्क में आने से 25 वर्षीय एम. गणेश और 26 वर्षीय बिहार निवासी मुकेश कुमार की मौत ने फिर वही सवाल खड़ा किया है कि आखिर इस मौत के लिए जिम्मेदार कौन है?
सबसे पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि दोनों युवक टैंक में कैसे गए। पहला सवाल होना चाहिए - उन्हें अंदर जाने किसने दिया? मुकेश सफाई के लिए टैंक में उतरे। जहरीली गैस के कारण वे बेहोश हो गए। उन्हें बचाने के लिए गणेश भी अंदर चले गए और दोनों की जान चली गई। यदि वहां सुरक्षा उपकरण नहीं थे, जहरीली गैस की जांच की व्यवस्था नहीं थी, पर्याप्त वायु संचार नहीं था और प्रशिक्षित निगरानी उपलब्ध नहीं थी, तो इसे केवल दुर्घटना कहना वास्तविक जिम्मेदारी से बचना है।
किसी श्रमिक का टैंक में उतरना घटना है,उसे वहां भेजने वाली व्यवस्था कारण है। यही वह बिंदु है जहां जांच को गंभीरता से आगे बढ़ना चाहिए। जांच एजेंसियों को सबसे पहले यह पता लगाना चाहिए कि सेप्टिक टैंक की सफाई का काम किसने दिया था। श्रमिकों को किसने बुलाया? मजदूरी किसने तय की? भुगतान किसने किया? क्या बीच में कोई ठेकेदार या उप-ठेकेदार था? काम की निगरानी कौन कर रहा था? क्या सफाई के लिए मशीन उपलब्ध थी? यदि मशीन उपलब्ध थी तो उसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी कि काम शुरू होने से पहले श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी?
भारत में खतरनाक सीवर और सेप्टिक टैंक सफाई को लेकर कानून और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पहले से मौजूद हैं। 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने सीवर की मानवीय सफाई को चरणबद्ध ढंग से समाप्त करने, मशीनीकृत सफाई को बढ़ावा देने, मृत श्रमिकों के आश्रितों को तीस लाख रुपये मुआवजा देने तथा पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित करने पर जोर दिया था। इसके बावजूद यदि 2026 में भी कोई युवा जहरीली गैस से भरे सेप्टिक टैंक में उतरकर मर रहा है तो समस्या कानून की कमी से ज्यादा कानून के पालन की कमी की है।
यहां जिम्मेदारी को केवल उस व्यक्ति तक सीमित करना आसान होगा जिसने श्रमिक को टैंक में उतरने के लिए कहा। लेकिन असली जवाबदेही उससे आगे जाती है। यदि काम ठेके पर दिया गया था तो ठेकेदार की भूमिका सामने आनी चाहिए। यदि उप-ठेकेदार ने श्रमिक उपलब्ध कराए थे तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। वह हमारा कर्मचारी नहीं था, जवाबदेही से बचने का रास्ता नहीं बन सकता। ठेका व्यवस्था ने श्रम संबंधों को इस तरह बिखेर दिया है कि काम कराने वाला और काम करने वाला अक्सर एक-दूसरे से सीधे जुड़े दिखाई ही नहीं देते। लेकिन जिम्मेदारी को भी उसी अनुपात में बिखराया नहीं जा सकता।
इसलिए त्रिची मामले की जांच का परिणाम केवल प्राथमिकी दर्ज करने या कुछ लोगों को गिरफ्तार करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि निर्णय किसने लिया, काम किसने सौंपा, सुरक्षा क्यों नहीं दी गई और कानून का पालन किस स्तर पर विफल हुआ। यह भी समझना होगा कि गरीब श्रमिक की सहमति को कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी से बचने का बहाना नहीं बनाया जा सकता। जब किसी व्यक्ति के सामने बेरोजगारी, भूख और परिवार की जरूरतें हों तो खतरनाक काम स्वीकार करना हमेशा स्वतंत्र विकल्प नहीं होता। किसी गरीब श्रमिक की मजबूरी को उसकी सहमति मत कहिए।
इस मामले में बिहार के मुकेश कुमार की मौत एक दूसरी गंभीर वास्तविकता की ओर भी ध्यान खींचती है। प्रवासी श्रमिकों की असुरक्षा। दूसरे राज्यों से आने वाले श्रमिक अक्सर स्थानीय व्यवस्था, भाषा, श्रम अधिकारों और शिकायत तंत्र से पूरी तरह परिचित नहीं होते। इसलिए प्रवासी श्रमिकों के लिए काम शुरू होने से पहले उनकी भाषा में सुरक्षा संबंधी जानकारी, आपातकालीन संपर्क, काम की प्रकृति और उनके अधिकारों की स्पष्ट जानकारी देना अनिवार्य होना चाहिए।
इस पूरी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण समाधान मानव प्रवेश को समाप्त करना है। जहां मशीन से सफाई संभव है, वहां मनुष्य को टैंक में उतारना ही नहीं चाहिए। जहरीली गैस की जांच के लिए गैस पहचान यंत्र, वायु संचार की व्यवस्था, यांत्रिक सफाई उपकरण, सुरक्षा पोशाक, श्वसन सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षित दल और आपातकालीन बचाव व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। इसके लिए हर जिले में एक स्वच्छता सुरक्षा प्रकोष्ठ बनाया जा सकता है। उसका काम केवल हादसे के बाद जांच करना नहीं, बल्कि हादसा होने से पहले उसे रोकना हो।
जांच की समयसीमा भी तय होनी चाहिए ताकि घटना के 24 घंटे के भीतर वैज्ञानिक निरीक्षण हो, सात दिनों के भीतर यह स्पष्ट हो कि काम किसने दिया, तीस दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच पूरी हो, साठ दिनों के भीतर अभियोजन पर निर्णय हो और नब्बे दिनों के भीतर मुआवजे और पुनर्वास की स्थिति सार्वजनिक की जाए। मुआवजा भी केवल चेक देने की रस्म नहीं होना चाहिए। तीस लाख रुपये की निर्धारित राशि के साथ परिवार के पुनर्वास, आश्रितों की शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा को एक पैकेज के रूप में लागू करना होगा।
हमें यह तय करना होगा कि स्वच्छ शहर और साफ गांव किस कीमत पर चाहिए। यदि उसकी कीमत किसी श्रमिक की जान है तो वह स्वच्छता नहीं, व्यवस्था की विफलता है। जिम्मेदारी तय किए बिना मुआवजा अधूरा है। मशीनीकरण के बिना सुरक्षा अधूरी है। पुनर्वास के बिना न्याय अधूरा है। और कानून लागू किए बिना सरकार की घोषणाएं अधूरी हैं। साफ शहर की पहचान केवल चमकती सड़कें नहीं हैं। उसकी असली पहचान यह है कि उन सड़कों और नालियों को साफ करने वाला श्रमिक भी सुरक्षित घर लौटता है। *(विभूति फीचर्स)