लाडवा के प्राचीन हनुमान मंदिर में श्री राम कथा के दूसरे दिन उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

लाडवा के प्राचीन हनुमान मंदिर में श्री राम कथा के दूसरे दिन उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

श्री राम के आदर्शों को जीवन में उतारना ही कथा सुनने की सार्थकता: संत देवी सुदीक्षा

प्राचीन हनुमान मंदिर में श्री राम कथा के दूसरे दिन श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा

लाडवा/मानव गर्ग /19 अगस्त 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

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लाडवा के प्राचीन हनुमान मंदिर में श्री सरस्वती सत्संग सभा की ओर से आयोजित श्री राम कथा के दूसरे दिन भी श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा।
संत देवी सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि मानव जीवन के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने अपने जीवन में सत्य, मर्यादा, धैर्य, त्याग और कर्तव्य को सर्वोच्च स्थान दिया।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में आने वाली परिस्थितियों से घबराने की बजाय धैर्य और विश्वास के साथ उनका सामना करना चाहिए। भगवान श्रीराम का जीवन हमें यही सीख देता है कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोडऩा चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के समय में मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने की दौड़ में मानसिक शांति से दूर होता जा रहा है। ऐसे में भगवान का नाम और सत्संग मनुष्य को आत्मिक शांति प्रदान करने का माध्यम बन सकते हैं।

राम नाम का स्मरण मन को स्थिर करता है और व्यक्ति को बुरे विचारों से दूर रखते हुए अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करता है। उन्होंने कहा कि श्रीराम कथा केवल सुनने का विषय नहीं है, बल्कि इसके प्रत्येक प्रसंग में जीवन जीने की सीख छिपी हुई है। यदि मनुष्य कथा में बताए गए आदर्शों को अपने व्यवहार में उतार ले तो परिवार में प्रेम, बड़ों के प्रति सम्मान और समाज में आपसी भाईचारा मजबूत हो सकता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने बच्चों को भी धार्मिक एवं संस्कारवान वातावरण दें तथा उन्हें भगवान श्रीराम के आदर्शों और भारतीय संस्कृति से परिचित करवाएं। उन्होंने कहा कि परिवार ही संस्कारों की पहली पाठशाला है। माता-पिता का व्यवहार बच्चों के जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। इसलिए परिवार के प्रत्येक सदस्य को प्रेम, संयम, सेवा और सद्भाव की भावना के साथ जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरों की सेवा करना, जरूरतमंद की सहायता करना और किसी के प्रति मन में द्वेष न रखना भी प्रभु भक्ति का ही एक रूप है।

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