शुभ मुहूर्त में जन्म या सुरक्षित प्रसव? जानिए ज्योतिष और चिकित्सा विज्ञान की राय

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार के अस्पतालों में कई माता-पिताओं ने अपनी संतान का जन्म श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन दिन होने की इच्छा व्यक्त की है। इसके लिए कुछ परिवारों ने प्राकृतिक प्रसव की प्रतीक्षा करने के स्थान पर निर्धारित समय पर प्रसव या सिजेरियन कराने के विषय में चिकित्सकों से चर्चा की है। इसके पीछे उनकी धार्मिक आस्था है कि जन्माष्टमी के दिन जन्म लेने वाली संतान को भगवान श्रीकृष्ण का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होगा। भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का अत्याधिक महत्व है। मान्यता है कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। कंस ने जब यशोदा की नवजात कन्या को मारने का प्रयास किया, तब वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में प्रकट हुईं और उन्होंने कंस के विनाश की भविष्यवाणी की। इसलिए जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि अन्याय पर न्याय तथा अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या किसी धार्मिक तिथि अथवा मनचाहे मुहूर्त के लिए प्राकृतिक प्रसव को प्रभावित करना भारतीय ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से उचित है?
जन्म का समय निर्धारित कौन करता है?
भारतीय ज्योतिष में जन्म को केवल तिथि, नक्षत्र या घड़ी की घटना नहीं माना गया है। यह जीव के पूर्वकर्म, माता-पिता के संयोग, गर्भकाल और प्रकृति की व्यवस्था से जुड़ी एक व्यापक प्रक्रिया मानी जाती है। शास्त्रीय दृष्टि से गर्भस्थ शिशु जब स्वाभाविक रूप से जन्म लेने के लिए तैयार होता है, तब उसका जन्मकाल प्रकृति द्वारा निर्धारित माना जाता है। अतः केवल शुभ तिथि प्राप्त करने के उद्देश्य से प्राकृतिक प्रसव की प्रक्रिया में अनावश्यक हस्तक्षेप करना ज्योतिष की मूल भावना के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। ज्योतिष मनुष्य को समय का ज्ञान कराता है, लेकिन प्रकृति और जीवन पर मनमाना नियंत्रण स्थापित करने की शिक्षा नहीं देता। हाँ, यदि चिकित्सकीय कारणों से सिजेरियन प्रसव आवश्यक हो और डॉक्टर कुछ सुरक्षित तिथियों तथा समयों में विकल्प दें, तब परिवार उनमें से ज्योतिषीय दृष्टि से अपेक्षाकृत अनुकूल समय चुन सकता है। लेकिन मुहूर्त का चयन हमेशा माता और शिशु की सुरक्षा के अधीन होना चाहिए।
क्या ऑपरेशन से जन्म लेने वाले बच्चे की कुंडली सही बनती है?
सिजेरियन अथवा चिकित्सकीय सहायता से जन्म लेने वाले शिशु की जन्मकुंडली भी उसी वास्तविक समय के आधार पर बनाई जाती है, जिस समय उसका जन्म हुआ हो। तकनीकी रूप से कुंडली गलत नहीं होती, क्योंकि ग्रह-नक्षत्र उस क्षण आकाश में जिस स्थिति में होते हैं, कुंडली में वही स्थिति अंकित की जाती है। लेकिन किसी मनचाहे लग्न या नक्षत्र के लिए प्रसव का समय बदल देना यह सुनिश्चित नहीं करता कि संतान का पूरा जीवन मनुष्य की इच्छानुसार ही चलेगा। जन्मकुंडली केवल लग्न से नहीं बनती। उसमें सूर्य, चंद्रमा, नौ ग्रहों की स्थिति, भाव, भावेश, दृष्टि, युति, नवांश, योग, दशा और गोचर सहित अनेक पक्षों का विचार किया जाता है। कुछ मिनटों का चयन करके प्रत्येक ग्रह और जीवन के प्रत्येक पक्ष को पूर्णतः अनुकूल बनाना संभव नहीं है। यदि कोई व्यक्ति केवल एक शुभ लग्न देखकर प्रसव का समय तय करता है, लेकिन उस समय चंद्रमा, अष्टम भाव, लग्नेश अथवा अन्य महत्वपूर्ण ग्रह कमजोर हों, तो चयनित मुहूर्त अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकता। इसलिए शुभ समय में जन्म करा देने से संतान का जीवन पूर्णतः बाधारहित हो जाएगा,ऐसा मानना ज्योतिष का अतिसरलीकरण है।
क्या जन्माष्टमी पर जन्म लेना अपने-आप में अत्यंत शुभ है?
किसी महान धार्मिक पर्व पर जन्म लेना परिवार के लिए भावनात्मक और आध्यात्मिक प्रसन्नता का विषय हो सकता है। किंतु केवल जन्माष्टमी, रामनवमी, अक्षय तृतीया अथवा किसी अन्य पर्व पर जन्म लेने से प्रत्येक शिशु की कुंडली समान रूप से शुभ नहीं हो जाती। एक ही दिन अलग-अलग समय और स्थानों पर जन्म लेने वाले बच्चों के लग्न, भाव और ग्रहस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए केवल तिथि के आधार पर भविष्यवाणी करना शास्त्रसम्मत नहीं है। शुभ पर्व आध्यात्मिक संस्कार और पारिवारिक आस्था प्रदान कर सकता है, परंतु बच्चे का व्यक्तित्व उसके कर्म, संस्कार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पारिवारिक वातावरण और पुरुषार्थ से भी निर्मित होता है।
मूल नक्षत्र से भय कितना उचित?
समाज में मूल नक्षत्र को लेकर भी अनेक प्रकार की आशंकाएं प्रचलित हैं। कई माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान का जन्म मूल नक्षत्र में न हो। किंतु ज्योतिष की गंभीर व्याख्या के अनुसार किसी एक नक्षत्र को पूर्णतः अशुभ घोषित करना उचित नहीं है। मूल नक्षत्र के अधिष्ठाता निरृति और स्वामी केतु माने गए हैं। यह नक्षत्र व्यक्ति को किसी विषय की जड़ तक पहुंचने, अनुसंधान करने, पुराने बंधनों को तोड़ने तथा जीवन में गहरा परिवर्तन लाने की क्षमता भी दे सकता है। इसके परिणाम कुंडली में चंद्रमा की स्थिति, लग्न, ग्रहदृष्टि, चरण और अन्य योगों पर निर्भर करते हैं। मूल सहित कुछ नक्षत्रों को परंपरा में गण्डमूल कहा जाता है। ऐसे नक्षत्र में जन्म होने पर प्रायः 27वें दिन, उसी नक्षत्र की पुनरावृत्ति पर गण्डमूल शांति कराने की परंपरा है। यह एक धार्मिक संस्कार और मानसिक शांति का माध्यम है। इसका अर्थ यह नहीं कि मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाला प्रत्येक शिशु अनिष्टकारी होता है। किसी नवजात को उसके नक्षत्र के कारण अशुभ मानना न तो उचित है और न मानवीय।
चिकित्सा विज्ञान को सर्वोच्च प्राथमिकता
प्रसव माता और शिशु,दोनों के जीवन तथा स्वास्थ्य से जुड़ी अत्यंत संवेदनशील प्रक्रिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन अनावश्यक सिजेरियन प्रसव कम करने पर बल देता है। सिजेरियन ऑपरेशन आवश्यकता पड़ने पर जीवनरक्षक होता है, लेकिन इसे केवल किसी विशेष तिथि के लिए कराने का निर्णय जोखिमों को समझे बिना नहीं लिया जाना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट्स के अनुसार केवल माता के अनुरोध पर किए जाने वाले सिजेरियन को सामान्यतः गर्भावस्था के 39 सप्ताह पूरे होने से पहले नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कोई चिकित्सकीय आवश्यकता न हो।
ACOG का चिकित्सकीय मार्गदर्शन
गर्भावस्था की वास्तविक अवधि, शिशु के फेफड़ों का विकास, गर्भनाल की स्थिति, माता का रक्तचाप, मधुमेह, पहले हुए ऑपरेशन तथा भ्रूण की स्थिति जैसे विषयों का निर्णय केवल योग्य स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ कर सकते हैं। पंचांग देखकर चिकित्सा संबंधी खतरे को नजरअंदाज करना ज्योतिषसम्मत भी नहीं है, क्योंकि भारतीय परंपरा में जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा को सर्वोच्च धर्म माना गया है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र की संतुलित दृष्टि यही है कि प्राकृतिक और सुरक्षित प्रसव को प्राथमिकता दी जाए। यदि चिकित्सकीय कारणों से प्रसव की तिथि निर्धारित करनी ही पड़े और डॉक्टर सुरक्षित समयावधि के कुछ विकल्प दें, तभी उनमें से अनुकूल मुहूर्त चुना जा सकता है। ज्योतिष को चिकित्सक के निर्णय का विकल्प नहीं, बल्कि सुरक्षित चिकित्सकीय सीमाओं के भीतर एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक समझना चाहिए। संतान का जन्म जिस वास्तविक क्षण होता है, उसी समय के आधार पर उसकी जन्मकुंडली बनेगी,चाहे प्रसव प्राकृतिक हो या सिजेरियन। लेकिन केवल मनचाहा लग्न, तिथि अथवा नक्षत्र चुन लेने से संतान का भाग्य पूर्णतः नियंत्रित नहीं किया जा सकता। सबसे शुभ मुहूर्त वही है, जिसमें माता सुरक्षित रहे, शिशु स्वस्थ जन्म ले और दोनों का जीवन किसी अनावश्यक जोखिम में न डाला जाए। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का वास्तविक संदेश भी धर्म, विवेक और जीवन की रक्षा है,केवल कैलेंडर की एक तिथि प्राप्त करना नहीं।