नया दौर और आधुनिकता हमारी जीवनशैली को तो बदल रही है, लेकिन इसके साथ ही रिश्तों की गर्माहट और मानवीय संवेदनाएं भी लगातार कम होती जा रही हैं। समाज की यह संवेदनहीनता अब एक खुले घाव की तरह फैलती जा रही है, जहां रिश्तों की परिभाषा खून से नहीं बल्कि सुविधा और पैसों से तय होने लगी है। इस खबर के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- सोनीपत के वृद्धाश्रम में शिवचरण गुप्ता ने अंतिम सांस ली, जिनकी बेटियों ने शरीर से पहुंचने के बजाय केवल पैसों और स्क्रीन का सहारा लिया।
- लगभग 20 दिन पहले बीमारी की सूचना मिलने के बावजूद नेपाल, मुंबई और आजमगढ़ में रहने वाली तीनों आत्मनिर्भर बेटियां पिता के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचीं।
- पिता की अंतिम यात्रा में कंधे देने के बजाय वीडियो कॉल और पांच हजार एक सौ रुपये भेजने की औपचारिकता निभाई गई।
- मृतक पिता की आंखें दान की गईं जिससे दो दृष्टिहीनों को रोशनी मिली, जबकि समाजसेवियों ने उनका अंतिम संस्कार किया।
पिता शिवचरण गुप्ता ने कभी अपनी जवानी के सपने कुचलकर बेटियों को आत्मनिर्भर बनाया था और मुंबई में कपड़े का बड़ा कारोबार खड़ा किया था। सब कुछ खोने और पत्नी मीना गुप्ता के निधन के बाद वे पिछले डेढ़-दो साल से सोनीपत के वृद्धाश्रम में रह रहे थे।
जब बुढ़ापे में उस पिता ने वृद्धाश्रम की चारदीवारी में अंतिम सांस ली, तब उनकी संतानें अंतिम संस्कार में शरीर से नहीं जुड़ पाईं। करीब 20 दिन पहले बीमारी की सूचना देने के बावजूद नेपाल, मुंबई और आजमगढ़ में रहने वाली तीनों सफल और आत्मनिर्भर बेटियां पिता के पास नहीं पहुंचीं। एक बेटी ने पैसा भेजा, दूसरी ने स्क्रीन पर चिता देखी और तीसरी ने शायद यह भी जरूरी नहीं समझा।
आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली और भागदौड़ भरी जिंदगी ने इंसानों को केवल डिग्रियां दी हैं लेकिन उनके भीतर से संवेदनाएं पूरी तरह छीन ली हैं। तीनों आत्मनिर्भर बेटियों में से दो बेटियां शिक्षिका हैं जो समाज को नैतिकता सिखाती होंगी, लेकिन वे अपने ही पिता की चिता के पास खड़े होने के लिए समय नहीं निकाल सकीं।
वीडियो कॉल के दौरान एक बेटी की यह टिप्पणी सामने आई कि 'कितना समय लगेगा?', जो रिश्तों की ठंडक और गहरी संवेदनहीनता को पूरी तरह उजागर करती है। पिता ने जीवनभर अपना पेट काटकर और भूख छिपाकर बेटियों की नींव रखी थी, लेकिन अंतिम यात्रा में उन्हें पूरी तरह अकेला छोड़ दिया गया।
आज के समाज में संबंधों को भावुकता से नहीं बल्कि सौदेबाजी से तौला जाने लगा है, जहां धन भेजना सरल हो गया है और शारीरिक उपस्थिति बेहद कठिन हो गई है। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इस बात का साफ सबूत है कि हमारे समाज में गरीबी नहीं बल्कि भावनात्मक दरिद्रता तेजी से बढ़ रही है।
शिवचरण गुप्ता की आंखें दो अजनबियों को प्रकाश दे गईं, लेकिन अपनी संतानों की गैर-मौजूदगी के कारण वे समाज के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ गईं। माता-पिता को जीवनभर पैसों की नहीं बल्कि बच्चों की उपस्थिति और प्रेम की जरूरत होती है, जिसे किसी भी ऑनलाइन भुगतान या वीडियो कॉल से कभी नहीं चुकाया जा सकता है।