थाली में कॉकरोच का स्वाद?स्वच्छता बाद में देखेंगे!

Atal Hind Team Online4 September 20265 min read24 viewsहेल्थ
थाली में कॉकरोच का स्वाद?स्वच्छता बाद में देखेंगे!

थाली में कॉकरोच का स्वाद?स्वच्छता बाद में देखेंगे!

स्ट्रीट फूड हो या रेस्टोरेंट, खाद्य सुरक्षा में भेद क्यों?

भारत में भोजन बड़ा लोकतांत्रिक है। अमीर पांच हजार रुपये की प्लेट में खाता है और गरीब बीस रुपये की प्लेट में। फर्क सिर्फ इतना है कि अमीर के खाने के साथ बिल आता है और गरीब के खाने के साथ अक्सर पाचन-तंत्र की परीक्षा। मगर दोनों की थाली में अगर गंदगी पहुंच जाए तो बीमारी दोनों को एक ही कतार में खड़ा कर देती है।

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अब खाद्य सुरक्षा को लेकर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आई है। सड़क किनारे बिकने वाला भारतीय स्ट्रीट फूड पौष्टिकता के मामले में इतना सक्षम पाया गया है कि बीस रुपये में एक हजार कैलोरी तक हासिल की जा सकती है। यानी हमारी कचौरी, पोहा, समोसा, चाट और दूसरे देसी व्यंजन उस दौर में भी गरीब की मदद कर रहे हैं जब महंगाई जेब से नोट निकालने के लिए नहीं, जेब टटोलने के लिए मजबूर कर रही है। देश में करोड़ों लोग इन्हीं छोटे-छोटे ठेलों से भोजन और करोड़ों परिवार इन्हीं ठेलों से रोजगार पाते हैं।

लेकिन अब असली सवाल कैलोरी का नहीं, कैलोरी के साथ आने वाले ‘अतिरिक्त पैकेज’ का है।

क्योंकि सड़क किनारे ठेले वाले से पूछा जाता है,पानी कहां का है? हाथ धोए? खाना ढका है? दस्ताने क्यों नहीं पहने? बर्तन साफ क्यों नहीं हैं? मक्खियां क्यों बैठ रही हैं? और अगर वह बेचारा इन सवालों का जवाब देने लगे तो शायद अगला सवाल होगा,‘लाइसेंस कहां है?’

ठीक है, उससे स्वच्छता पूछिए। जरूर पूछिए। लेकिन कभी उन बड़े रेस्तरां की रसोई का दरवाजा भी खोलिए जिनके बाहर इतनी चमक होती है कि ग्राहक को लगता है अंदर देवताओं का भोजन बन रहा होगा।

हाल ही में कुछ नामी रेस्तरां की रसोई में भारी गंदगी और कॉकरोच पाए गए और कार्रवाई करते हुए उनके लाइसेंस तक रद्द कर दिए गए। यह कार्रवाई जरूरी थी और स्वागतयोग्य भी। लेकिन इससे एक सवाल और पैदा होता है,अगर कॉकरोच लाइसेंस रद्द करवाने की क्षमता रखते हैं तो वे इतने वर्षों तक रसोई में प्रवेश कैसे पा रहे थे?

ग्राहक बाहर बैठकर महंगे भोजन की प्लेट का फोटो खींच रहा था और अंदर कॉकरोच शायद भोजन की गुणवत्ता का अपना निरीक्षण कर रहे थे। फर्क सिर्फ इतना था कि ग्राहक ने बिल चुकाया और कॉकरोच ने नहीं।

हमारे यहां रेस्टोरेंट की सजावट देखकर खाद्य सुरक्षा का अनुमान लगाने की अजीब आदत है। कांच के दरवाजे, मुलायम रोशनी, महंगी कुर्सियां और अंग्रेजी में लिखा मेन्यू देखकर हम मान लेते हैं कि खाना भी स्वर्ग से आया होगा। हमें यह देखने की फुर्सत नहीं कि स्वर्ग की उस प्लेट तक पहुंचने से पहले रसोई में कौन-कौन विचरण कर रहा है।

सड़क किनारे का ठेला देखकर हम तुरंत नाक सिकोड़ते हैं। वहां धूल दिखती है, मक्खी दिखती है, खुले बर्तन दिखते हैं तो हम कहते हैं ‘यहां कैसे खा लेते हैं लोग?’

और वही लोग शाम को किसी बड़े रेस्तरां में बैठकर हजारों रुपये का खाना खाते हुए यह मान लेते हैं कि वहां सब कुछ स्वच्छ ही होगा।

भाई साहब, बीमारी को मेन्यू कार्ड पढ़ना नहीं आता।

उसे न पता है कि समोसा ठेले से आया है या शेफ की टोपी के नीचे से। उसे सिर्फ इतना पता है कि गंदगी मिली तो काम शुरू!

इसलिए खाद्य सुरक्षा के नियम भी बड़े मजेदार हैं। गरीब के ठेले पर स्वच्छता का निरीक्षण ऐसे होता है जैसे देश की सुरक्षा का सबसे बड़ा संकट वही समोसा हो। लेकिन बड़े प्रतिष्ठान में जांच का सवाल आए तो कागज, अनुमति, प्रमाणपत्र और निरीक्षण की पूरी बारात निकल आती है। नियम दोनों के लिए बराबर होने चाहिए। कॉकरोच को भी यह पता नहीं होना चाहिए कि वह गरीब की कचौरी में घूम रहा है या महंगे रेस्तरां की ग्रेवी में।

असल जरूरत स्ट्रीट वेंडर को अपराधी मानने की नहीं, उसे प्रशिक्षित करने की है। उसे साफ पानी चाहिए, कचरा रखने की व्यवस्था चाहिए, भोजन ढकने की सुविधा चाहिए, स्वच्छता किट चाहिए और सबसे बढ़कर यह ज्ञान चाहिए कि सुरक्षित भोजन कैसे तैयार और परोसा जाए। केवल चालान काटकर स्वच्छता पैदा नहीं होती।

और बड़े रेस्तरां? उनके लिए नियम और भी कड़े होने चाहिए। क्योंकि जिसने ग्राहक से पांच सौ, हजार या पांच हजार रुपये लिए हैं, उससे यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि उसकी रसोई में खाना बने, जीव-जंतुओं की पंचायत नहीं।

गुजरात में अहमदाबाद और गांधीनगर में स्वच्छता आधारित वेंडिंग मॉडल की पहल हुई है। ऐसे प्रयोगों को विस्तार देने की जरूरत है। अगर सरकार सचमुच स्ट्रीट फूड को सुरक्षित बनाना चाहती है तो उसे ठेले वाले को केवल ‘हटाने योग्य अतिक्रमण’ नहीं, बल्कि ‘खाद्य अर्थव्यवस्था का श्रमिक’ समझना होगा।

क्योंकि यह ठेला ही है जो मजदूर को सस्ता भोजन देता है, विद्यार्थी को जल्दी नाश्ता देता है, कर्मचारी को शाम की चाय देता है और छोटे कारोबारी को रोजगार देता है। लेकिन इसके साथ यह भी तय होना चाहिए कि गरीबी स्वच्छता से समझौता करने का लाइसेंस नहीं है।

और अमीरी स्वच्छता की गारंटी भी नहीं है।अब समय आ गया है कि खाद्य सुरक्षा की जांच में एक ही तराजू हो। ठेला हो या वातानुकूलित रेस्तरां, ढाबा हो या मॉल का फूड कोर्ट,जहां खाना बनता है, वहां स्वच्छता अनिवार्य होनी चाहिए।

क्योंकि जनता को यह अधिकार है कि उसकी थाली में स्वाद मिले, पोषण मिले और संतोष मिले।

लेकिन अगर भोजन के साथ कॉकरोच भी परोसा जाए तो उसे ‘प्रोटीन का अतिरिक्त स्रोत’ बताकर बच निकलने की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

आखिर ग्राहक खाने के पैसे देता है।

रसोई के किरदारों के नहीं!-सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र.

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