लाठी से नहीं बल्कि पारदर्शिता से सुलझेगा छात्रों का आक्रोश, भर्ती परीक्षाओं की व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल

समस्या जब छोटी होती है, तब संवाद से सुलझ जाती है लेकिन जब शिकायतों को लगातार नजरअंदाज किया जाता है तो वही समस्या आंदोलन बन जाती है। दिल्ली में संसद मार्च के बाद अब रांची में छात्रों के विधानसभा मार्च ने सरकारों को कड़ा सबक दिया है। इस लेख में भर्ती परीक्षाओं की अनियमितताओं और छात्रों के आक्रोश पर गंभीर चर्चा की गई है।
रांची में छात्रों का विधानसभा मार्च और पुलिस कार्रवाई
रांची में 10 अगस्त को JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों ने विधानसभा की ओर मार्च किया। बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश के बाद पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। इस घटना में कई सुरक्षाकर्मियों के घायल होने की भी सूचना सामने आई है। किसी भी निषिद्ध क्षेत्र में जबरन प्रवेश कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा करता है और पुलिस को भीड़ नियंत्रित करने का अधिकार है, लेकिन यह सवाल भी अहम है कि छात्रों को विधानसभा की ओर मार्च करने की नौबत आई क्यों।
झारखंड में भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्रों का असंतोष
झारखंड में भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्रों का असंतोष अचानक पैदा नहीं हुआ था। 14वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा को लेकर जुलाई से ही लगातार सवाल उठ रहे थे। कथित अनियमितताओं की जांच के दौरान JPSC के तत्कालीन अध्यक्ष एल. खियांग्ते ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। CID ने आयोग के कार्यालय और उनके आवास पर तलाशी ली, जिसके बाद कई लोगों की गिरफ्तारी हुई और अंत में खियांग्ते को भी गिरफ्तार कर लिया गया। छात्रों के सवालों को केवल राजनीतिक विरोध या भीड़ का दबाव मानकर खारिज नहीं किया जा सकता है।
परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और डिजिटल सुरक्षा की जरूरत
सरकारी नौकरी की परीक्षा किसी भी विद्यार्थी के लिए महज एक परीक्षा नहीं होती है बल्कि इसके पीछे वर्षों की मेहनत और भविष्य की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। समाधान लाठी नहीं है, बल्कि परीक्षा व्यवस्था में ऐसी पारदर्शिता होना है जिसमें गड़बड़ी की गुंजाइश न्यूनतम हो। प्रश्नपत्र तैयार होने से लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया डिजिटल रूप से सुरक्षित और निगरानी योग्य होनी चाहिए। परिणाम घोषित करने की समय-सीमा भी पहले से तय होनी चाहिए और उत्तर कुंजी तथा आपत्तियों की समय-सारिणी सार्वजनिक होनी चाहिए।
भर्ती आयोगों की जवाबदेही और सुशासन
भर्ती आयोगों की जवाबदेही पूरी तरह से तय होनी चाहिए ताकि युवाओं का विश्वास बना रहे। यदि किसी अधिकारी या एजेंसी की लापरवाही से परीक्षा प्रक्रिया प्रभावित होती है तो केवल परीक्षा रद्द करके बात खत्म नहीं होनी चाहिए। सरकारों को यह समझना होगा कि छात्रों की आवाज को समय रहते सुनना कमजोरी नहीं बल्कि सुशासन की निशानी है। युवाओं के हाथ में किताब और प्रश्नपत्र होना चाहिए, बैरिकेड और पत्थर नहीं। परीक्षा में धांधली केवल एक विद्यार्थी का भविष्य नहीं बिगाड़ती, बल्कि पूरी व्यवस्था से युवाओं का विश्वास छीन लेती है।