जीतने की संस्कृति में जीने की जगह बची है क्या? आत्महत्या निवारण दिवस पर विशेष आलेख

आत्महत्या निवारण दिवस केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह हमारी संवेदना की एक बड़ी परीक्षा है। हर वर्ष हम कई प्रकार के संकल्प लेते हैं और संदेश दोहराते हैं कि दृष्टिकोण बदलो। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम उस मौन को सुनते हैं जो संकट में घिरे किसी व्यक्ति के मन के भीतर उठता रहता है। त्रासदी किसी अकेले पड़े व्यक्ति में नहीं है, बल्कि उस भीड़ में है जो पास होकर भी उसका दर्द नहीं देखती है।
जब अंक ही किसी विद्यार्थी की असली पहचान बन जाएं, तो शिक्षा के बीच से मनुष्य गायब होने लगता है। आईआईटी जैसे संस्थानों की हाल की घटनाओं को केवल परीक्षा का तनाव कह देना बहुत आसान है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हमारी श्रेष्ठ शिक्षा-व्यवस्था वास्तव में श्रेष्ठ मनुष्य गढ़ रही है या फिर केवल बेहतर प्रदर्शनकर्ता तैयार कर रही है।
वर्दी देश की रक्षा करती है, मगर उसके भीतर धड़कता हुआ मन भी थकता है। सीआरपीएफ जैसे बलों में दर्ज आत्महत्या की घटनाएं यह बताती हैं कि रक्षक भी मानसिक दबाव से अछूते नहीं हैं। लंबी ड्यूटी, निरंतर तनाव और मनोवैज्ञानिक सहारे का अभाव ऐसा भारी बोझ बन जाते हैं जिसे केवल अनुशासन के सहारे नहीं उठाया जा सकता है।
मोबाइल ने पूरी दुनिया को हमारी हथेली पर ला दिया है, लेकिन मनुष्य को कई बार उसके अपने ही भीतर से दूर कर दिया है। सोशल मीडिया के चमकीले दर्पण में लोगों को केवल दूसरों की सफलता दिखती है, अपनी जद्दोजहद नहीं दिखती है। यही अंतर युवा मन को लगातार एक अंधी तुलना में धकेलता है जिससे अकेलापन भावना न रहकर एक बड़ा सामाजिक संकट बन जाता है।
सबसे खतरनाक दीवार ईंटों की नहीं बल्कि उदासीनता की होती है जहां लोग यह मान लेते हैं कि मैंने तो कुछ देखा ही नहीं। मीडिया की जिम्मेदारी भी यहीं से शुरू होती है कि किसी भी त्रासदी को सनसनी बनाना संवेदना का सौदा है। घरों में भी लगातार संवाद सूख रहा है और हम यह तो पूछते हैं कि कितने अंक आए, लेकिन यह बहुत कम पूछते हैं कि मन कैसा है।
किसी भी एक व्यक्ति का संकट अक्सर पूरे समाज के बिगड़ते हुए स्वास्थ्य का एक बड़ा संकेत होता है। इसे केवल एक निजी बीमारी मान लेना ठीक वैसा ही है जैसे बुखार देखकर उसके असली कारण को ही भूल जाना। ये सभी घटनाएं हमें यह बता रही हैं कि हमें प्रतिस्पर्धा से सहयोग की ओर और मौन से संवाद की ओर वापस लौटना होगा।
संकट अक्सर कभी भी दस्तक देकर नहीं आता है, बल्कि वह व्यवहार की एक महीन दरार बनकर दिखाई देता है। किसी मित्र का अचानक अलग-थलग पड़ना या किसी सहकर्मी का असामान्य रूप से चुप हो जाना कोई साधारण बात नहीं है। बिना कोई निर्णय सुनाए किसी की बात को चुपचाप सुनना भी बहुत बड़ा सहारा होता है और मदद मांगना कोई कमजोरी नहीं है।
दस सितंबर की असली परीक्षा ठीक ग्यारह सितंबर की सुबह होती है जब सभी पोस्टर उतर जाते हैं और भाषण थम जाते हैं। तब क्या हमारे घरों में संवाद और विद्यालयों में संवेदना सचमुच बची रहेगी। दृष्टिकोण किसी शब्द को बदलने से नहीं बदलता है, बल्कि मनुष्य को उसकी उपलब्धियों से पहले एक सच्चा मनुष्य मानने से बदलता है।