सबूत बचाइए, गाड़ियां नहीं सड़ाइए

सुप्रीम कोर्ट: थानों में कबाड़ बन रहे जब्त वाहन
थाने में कानून का राज होता है या कबाड़खाने का, यह सवाल उस व्यक्ति से पूछिए जिसकी मोटरसाइकिल, कार या ट्रक किसी मुकदमे में जब्त होकर थाने के बाहर खड़ा-खड़ा अपनी जवानी खो चुका है। पुलिस ने वाहन जब्त किया था अपराध की जांच के लिए, लेकिन मुकदमा पूरा होते-होते वाहन खुद एक ‘ऐतिहासिक अवशेष’ बन गया। टायर जवाब दे चुके हैं, बैटरी दम तोड़ चुकी है, इंजन जाम है और बॉडी पर जंग का ऐसा साम्राज्य कायम है कि वाहन पहचानने के लिए आरसी नहीं, पुरातत्व विभाग की जरूरत पड़े। अब सुप्रीम कोर्ट ने इसी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि थानों में जब्त वाहनों को लंबे समय तक खड़ा रखने का कोई फायदा नहीं है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र और जस्टिस चंद्रशेखर की पीठ ने अवैध शराब कारोबार में इस्तेमाल ट्रक की अंतरिम कस्टडी से जुड़े मामले में कहा कि वाहन को थाने के बाहर पड़े रहने देने से किसी का भला नहीं होता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वाहन मुकदमे का सबूत है तो उसकी फोटो और वीडियो सहित जरूरी विवरण सुरक्षित रखे जा सकते हैं और शर्तों के साथ वाहन उसके मालिक को अंतरिम कस्टडी में दिया जा सकता है।
सवाल बिल्कुल सीधा है,जब कैमरा वाहन की पूरी पहचान और हालत को कैद कर सकता है तो फिर वाहन को वर्षों तक खुले आसमान के नीचे कैद रखने की जरूरत क्या है? आज के डिजिटल दौर में किसी वाहन की फोटो, वीडियो, इंजन नंबर, चेसिस नंबर, नंबर प्लेट और उसकी पूरी स्थिति का रिकॉर्ड कुछ मिनटों में तैयार किया जा सकता है। जरूरत पड़े तो अदालत में वही वाहन प्रस्तुत करने की शर्त भी लगाई जा सकती है। फिर थाने के बाहर खड़ी गाड़ियों को मौसम, जंग और कथित ‘कल-पुर्जा प्रेमियों’ के भरोसे छोड़ देना किस कानून की किताब में लिखा है?
सुप्रीम कोर्ट इससे पहले भी Sunderbhai अंबालाल देसाई मामले में कह चुका है कि जब्त वाहनों को लंबे समय तक थाने में रखना उचित नहीं है। अदालत ने अंतरिम कस्टडी और उचित शर्तों के साथ वाहनों को उनके हकदार व्यक्ति को सौंपने की व्यवस्था पर जोर दिया था। नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में भी जब्त संपत्ति की अंतरिम कस्टडी और उसके निस्तारण का कानूनी रास्ता मौजूद है। यानी समस्या कानून की कमी से ज्यादा उसके इस्तेमाल और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की है।
विडंबना देखिए, जिस वाहन को जब्त करते समय पुलिस उसकी एक-एक पहचान दर्ज करती है, वही वाहन वर्षों बाद इतना बदल जाता है कि मालिक को उसे पहचानने के लिए शायद भावनात्मक स्मृतियों का सहारा लेना पड़े। वाहन जब्त हुआ था अपराध की जांच के लिए, लेकिन वह धीरे-धीरे कबाड़ में बदल गया तो इसका नुकसान किसका हुआ? मालिक का, बैंक का, बीमा कंपनी का और अंततः देश की अर्थव्यवस्था का। ट्रक किसी व्यापारी की पूंजी ही नहीं, चालक और उसके परिवार की रोजी-रोटी भी है। टैक्सी किसी व्यक्ति की नौकरी है और दोपहिया वाहन किसी परिवार के लिए आवागमन का सबसे सस्ता साधन।
और सबसे बड़ा सवाल,जब्त वाहन की देखभाल की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? थानों की सीमित जगह पहले ही पुलिस के लिए चुनौती है। उस पर वर्षों से खड़े वाहन जगह घेरते हैं और कई बार स्वयं सुरक्षा तथा यातायात की समस्या पैदा करते हैं। जिन वाहनों का मामला समाप्त हो चुका है, उनका समयबद्ध निस्तारण होना चाहिए और जिनके मामले विचाराधीन हैं, उन्हें कानूनन संभव होने पर अंतरिम कस्टडी में देने की प्रक्रिया तेज होनी चाहिए।
बेशक हर जब्त वाहन तुरंत मालिक को नहीं सौंपा जा सकता। चोरी, गंभीर अपराध, शराब या मादक पदार्थों की तस्करी अथवा ऐसे मामलों में जहां वाहन स्वयं अपराध का महत्वपूर्ण हिस्सा हो, अदालत आवश्यक शर्तें लगा सकती है। लेकिन ‘सबूत सुरक्षित रखने’ के नाम पर हर वाहन को सालों तक थाने में सड़ाना भी न्याय नहीं है। वाहन की स्थिति दर्ज कीजिए, फोटो-वीडियो बनाइए, पंचनामा तैयार कीजिए, मालिक से बॉन्ड और जरूरत पड़ने पर वाहन प्रस्तुत करने की गारंटी लीजिए और फिर वाहन को उपयोग में आने दीजिए।
दरअसल, न्याय व्यवस्था का उद्देश्य किसी की संपत्ति को नष्ट करना नहीं, अपराध की सच्चाई तक पहुंचना है। यदि किसी व्यक्ति की गाड़ी अदालत के आदेश से वर्षों तक खड़ी रही और अंततः अदालत ने वाहन लौटाने को कहा, लेकिन तब तक वह कबाड़ बन चुकी हो तो यह न्याय की कैसी तस्वीर होगी? अपराधी को सजा मिले, इसमें किसी को आपत्ति नहीं; मगर मुकदमे की प्रतीक्षा में निर्दोष की संपत्ति को सजा क्यों मिले?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ गाड़ियों की बात नहीं करती, बल्कि हमारी पूरी न्यायिक और प्रशासनिक सोच पर सवाल उठाती है। सबूत को सुरक्षित रखना जरूरी है, लेकिन सबूत के नाम पर संपत्ति को बर्बाद करना जरूरी नहीं। कैमरा सबूत बचा सकता है, डिजिटल रिकॉर्ड पहचान बचा सकता है और अदालत की शर्तें वाहन की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकती हैं। फिर क्यों न थानों को धीरे-धीरे ‘जब्त वाहन पार्किंग’ से मुक्त किया जाए?
अब वक्त आ गया है कि जिस तेजी से पुलिस वाहन जब्त करती है, उसी गंभीरता से उसके अंतरिम निस्तारण की प्रक्रिया भी चले। आखिर थाने अपराधियों को पकड़ने के लिए हैं, गाड़ियों को कबाड़ बनाने के लिए नहीं!-

लेखक -मधु सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र